साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 130, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें१२० श्रीसाम्बपुराणम्
तिथिभागस्तु यावन्तं पुनरर्कप्रमाणतः। एवं छायास्थिते काले भगवानेष कीर्त्तितः ॥३१॥
सूर्य प्रमाण में जितनी तिथि का भाग है, उतनी पृथ्वी की छाया द्वारा आच्छन्नता के समय भगवान् सूर्य को राहुग्रस्त कहा जाता है॥३१॥
अधो राहुः परः सोमः सोमादूर्ध्वं दिवाकरः। पर्वकाले स्थितिस्त्वेवं विपरीता गतौ पुनः ॥३२॥ अतश्छादयते राहुरभ्रवच्छशिभास्करौ। राहुरभ्रकसंस्थानं सोममाच्छाद्य तिष्ठति ॥३३॥ उद्धृत्य पार्थिवीं छायां धूमान्मेघ इवोत्थितः।
नीचे राहु, उसके ऊपर चन्द्र, चन्द्र के ऊपर सूर्य—पर्वकाल में इनकी यह स्थिति होती है और विपरीत गति होती है। अतएव जैसे मेघ चन्द्र-सूर्य को आच्छन्न करता है, वैसे ही राहु भी उसे ढक लेता है। राहु मेघमण्डल-पर्यन्त चन्द्र को आच्छन्न करके स्थित रहता है॥३२-३३॥
तेऽभ्रावखण्डितं तस्य केवलं श्यामलीकृतम्। कर्दमेन यथा वस्त्रं शुक्लत्वमपहन्यते ॥३४॥
मेघमण्डल के समान राहु केवल सूर्य को कलङ्कित (काले रंग की छाया से युक्त) करता है। जैसे कीचड़ से वस्त्र की शुक्लता अपगत हो जाती है, वैसे ही एक हिस्से को अथवा पूर्ण चन्द्रमण्डल को राहु आच्छन्न करता है। जैसे पुनः धो देने पर वस्त्र शुभ्र हो जाता है, वैसे ही राहुमुक्त चन्द्रमण्डल भी निर्मल हो जाता है॥३४॥
राहुणाच्छादितावापि दृष्ट्वा चन्द्रदिवाकरौ। विप्राः शान्तिपरा भूत्वा पुनराप्याययन्ति वै ॥३५॥
अथवा चन्द्र-सूर्य को राहु द्वारा आच्छादित देखकर ब्राह्मणगण उसकी शान्ति करने लगते हैं और पुनः उन्हें मुक्त देखकर आनन्दित होते हैं॥३५॥
एवञ्च गृह्यते सूर्य्यश्चन्द्रमास्तत्र गृह्यते ॥३६॥ अबुधास्तत्र पश्यन्ति मनुष्या मांसचक्षुषः। जगत् सम्मोहनं चैव ग्रहणं चन्द्रसूर्ययोः ॥३७॥
इस प्रकार राहु चन्द्र तथा सूर्य को जब ग्रहण करता है तब चर्मचक्षु वाले अबोध मानव उसे चन्द्र-सूर्य का ग्रहण मानते हैं तथा समस्त जगत् उस ग्रहण से सम्मोहित हो जाता है॥३६-३७॥