भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 122

द्वाविंशोऽध्यायः

(सोमवृद्धिक्षयः)

साम्ब उवाच

सूर्यलोके त्वया दृष्टः सूर्यसोमसमागमः।
स कथं क्षीयते सोमः क्षीणश्चाप्यायते कथम् ॥१॥
यथा सोमं पिबन्तिस्म कृष्णपक्षेऽमृताशिनः।
देवताः पितरश्चैव तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ॥२॥

साम्ब कहते हैं—आपने सूर्यलोक में सूर्य तथा चन्द्र का समागम देखा है। चन्द्र का क्यों क्षय होता है और क्षय के उपरान्त वे कैसे वृद्धि प्राप्त होते हैं?

हे सुव्रत! कृष्णपक्ष में अमृत-भक्षणकारी देवगण तथा पितृगण जैसे सोमपान करते हैं, वह मुझसे बताईये ॥१-२॥

नारद उवाच

राका चानुगती चैव पौर्णमासी द्विधा स्मृता।
सिनीवाली कुहूश्चैव अमावास्या द्विधैव तु ॥३॥

नारद कहते हैं—पूर्णिमा राका तथा अनुगतिभेद से दो प्रकार की कही गयी है। अमावास्या भी सिनीवाली तथा कुहू—दो तरह की होती है ॥३॥

अमा नाम रवे रश्मिश्चन्द्रलोके प्रतिष्ठितः।
तस्यां सोमो वसेद् यस्मादमावस्या ततः स्मृता ॥४॥
पूर्वोदिते कलाहीने पौर्णमास्यां निशाकरे।
पूर्णिमानुमतीर्ज्ञेया पश्चाद् गच्छति भास्करः ॥५॥

सूर्य की अमा नामक रश्मि चन्द्रलोक में वास करती है, उसे ही अमावस्या कहा जाता है। पूर्णिमा तिथि में चन्द्र कलाहीन होकर पूर्व में उदित होते हैं। उस पूर्णिमा तिथि को अनुमति जानना चाहिये। तब सूर्य पीछे जाते हैं ॥४-५॥

यस्मात्तामनुमन्यन्ते पितरो दैवतैः सह।
तस्मादनुमतिर्नाम पूर्णिमा प्रथमा स्मृता ॥६॥
यदा ह्यास्तमियात् सूर्यः पूर्णचन्द्रस्य चोदयः।
युगपत् सा तु वै राका तदा भवति पूर्णिमा ॥७॥