साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशोऽध्यायः १११
अयं हरिद्विर्हरितैस्तुरङ्गैः हरद्विरापो हरितैश्च रश्मिभिः । विसर्गकाले विसृजंश्च ताः पुनर्विभर्ति शश्वत् सविता चराचरम् ॥५८॥
यह सूर्य हरित वर्ण तुरङ्ग के साथ हरित वर्ण रश्मि द्वारा जल का आहरण करते हैं। पुनः वर्षा काल में उसका वर्षण करते हैं। यह सविता स्वयं निरन्तर चराचर का पालन करते हैं॥५८॥
अहोरात्राद्रथेनासावेकचक्रेण वै भ्रमन्। सप्तद्वीपसमुद्रां गां सप्तभिः सप्तभिर्द्रुतम् ॥५९॥
अहोरात्र एक चक्रयुक्त रथ पर आसीन वह सूर्य सात अश्वों द्वारा द्रुत गति होकर सप्तद्वीप-युक्त समुद्रवेष्टित पृथिवी का परिक्रमण करते हैं॥५९॥
छन्दोभिर्वाजिरूपैस्तैर्यरतश्चक्रं ततः स्थितैः। कामरूपैः सकृद्युक्तैर्बृहद्भिस्तैर्मनोजवैः ॥६०॥ हरितैरथ यैः पिङ्गैरिश्वरैर्ब्रह्मवादिभिः । त्र्यशीतिमण्डलं प्रातरह्नोऽर्धेन विभावसोः ॥६१॥ वहन्ति हरयश्चैव मण्डलं दिवसक्रमात्। कल्पादौ सम्प्रयुक्तास्ते वहन्त्याभूतसम्प्लवम् ॥६२॥ आवृतो बालखिल्यैस्तैर्भ्रमतो रात्र्यहानि तु। ग्रथितैः स्वर्वचोभिश्च स्तूयमानो महर्षिभिः ॥६३॥
अश्वरूप छन्द के द्वारा वहाँ स्थित चक्र परिचालित होता है। वह कामरूप है। मन की अपेक्षा से गमनशील है। वह रथ से युक्त होकर वहन करता है। वे हरित तथा पिंगल वर्ण हैं। ब्रह्मवादी ईश्वर गण के साथ दिन के अर्धभाग में सूर्य के तिरासी मण्डल दिवसक्रम से अश्वगण वहन करते हैं। दिन-रात में भ्रमण करते-करते बालखिल्य द्वारा आवृत होकर (सूर्य) महर्षिगण द्वारा ग्रथित स्वर्गीय वचन द्वारा स्तुत हैं॥६०-६३॥
सेव्यते गीतनृत्यैश्च गन्धर्वैरप्सरोगणैः। पतङ्गपतगैरैश्चैर्भ्रममाणैर्दिवस्पतिः । वीथ्याश्रयाणि चरति नक्षत्रानुगतः शशी ॥६४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे आदित्यरथवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः
गन्धर्व तथा अप्सरागण द्वारा गीत एवं नृत्य तथा भ्राम्यमाण पतङ्ग, पक्षी और अश्वसमूह द्वारा दिवस्पति (सूर्य) सेवित होते हैं। नक्षत्रगण से अनुगत होकर निर्दिष्ट पथ से चन्द्रमा विचरण करते हैं॥६४॥
श्रीसाम्बपुराण में सूर्य के रथवर्णन नामक इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त