साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११० श्रीसाम्बपुराणम्
ये प्राणियों के जो अशुभ कर्म कहे गये हैं, उनका अपनोदन करके सूर्य के साथ द्युलोक में भ्रमण करते हैं। ये प्रजागण को ताप देते हैं, जप करने पर आनन्द देते हैं और जगत् पर कृपा करके प्राणीगण की रक्षा करते हैं।।५०-५१।।
स्थानाभिमानिनामेतत् स्थानं मन्वन्तरेषु वै।
अतीतानागताश्चैव वर्त्तन्ते साम्प्रतं च ये॥५२॥
स्थानाभिमानियों के मन्वन्तर का यही स्थान है। अतीत, अनागत तथा वर्त्तमान में जो हैं, उनके लिये भी यही स्थान है।।५२।।
ग्रैष्मे हिमे च वर्षासु विमुञ्चमानो
घर्मं हिमं च वर्षं च दिवानिशं च।
गच्छत्यसावृतुवशात् परिवर्त्य रश्मीन्
देवान् पितृंश्च मनुजांश्च स तर्पयन् वै॥५३॥
ग्रीष्म, हिम तथा वर्षा में यथाक्रमेण गर्मी, हिम तथा वृष्टि प्रदान करते हैं। सूर्य ऋतु के वशात् रश्मि-निवर्त्तन नहीं करके देवता, पितृ एवं मनुष्यों को तृप्ति प्रदान करते हैं।।५३।।
प्रीणाति देवानमृतेन सूर्यः सोमं सुषुम्नेन विवर्द्धयित्वा।
शुक्ले तु पूर्णं दिवसक्रमेण तं कृष्णपक्षे विबुधाः पिबन्ति ॥५४॥
सूर्य देव अमृत द्वारा देवगण का प्रीतिविधान करते हैं। सोम का वर्षण सुषुम्ना नाड़ी से करते हैं। शुक्लपक्ष के दिवसक्रम में (प्रतिदिन क्रमानुसार) उसे पूर्ण करते हैं। कृष्ण पक्ष में देवता उसका पान करते हैं।।५४।।
पीतं तु सोमं हि कलावशिष्टं कृष्णे च पक्षे रुचिभिः क्षरन्तम्।
स्वधामृतं तं पितरः पिबन्ति सर्पाश्च सौम्याश्च तथैव काव्याः ॥५५॥
पीत कलावशिष्ट कृष्ण पक्ष की कान्ति द्वारा क्षरित उसे पितृगण स्वधामृत रूप से पान करते हैं। वैसे ही सर्प, सौम्य तथा काव्यगण भी पीते हैं।।५५।।
सूर्येण गोभिस्तु समुद्गताभिरद्भिः पुनश्चैव समुज्झिताभिः।
वृष्ट्याभिवृद्ध्यापि तथौषधीभिर्मर्त्याः सुधामन्नरसैर्जयन्ति ॥५६॥
सूर्य की किरणों से समुद्भूत, पुनः परित्यक्त जल द्वारा वृष्टिरूपेण अभिवृद्ध औषधि द्वारा, अन्नरस द्वारा मर्त्यगण (मनुष्य जाति) सुधा प्राप्त करते हैं।।५६।।
मासार्द्धतृप्तिस्त्वमृतात्सुराणां मासं च तृप्तिः स्वधया पितॄणाम्।
अन्नेन शश्वच्च दधाति मर्त्यान् सूर्यः स्वयं तत्र विभाति गोभिः ॥५७॥
अमृत से देवगण की एक पक्ष (आधा मास) तक तृप्ति होती है। स्वधा से देवगण एक मास तृप्त रहते हैं। मृत्युलोक-वासी जीवगण को निरन्तर अन्न से तृप्त करके सूर्य अपनी किरणों से प्रकाश प्रदान करते हैं।।५७।।