भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 119

एकविंशोऽध्यायः १०९

स्थानाभिमानिनो होते गणा द्वादशसप्तकाः।
तिलोत्तमा च रम्भा च शुभे चाप्सरसां वरे ॥४३॥
ग्रामणीः ऋतुजिच्चैव सप्तजिच्च महायशाः।
ब्रह्मप्रेतश्च रक्षो वै यक्षप्रेतश्च तावुभौ ॥४४॥
सूर्यमाप्यायन्येते तेजसां तेज उत्तमम्।
प्रथितैः स्वैर्वचोभिश्च स्तुवन्ति ऋषयो रविम् ॥४५॥

स्थानाभिलाषी ये ८४ जन सूर्य के परिकर हैं। मंगलमयी अप्सराश्रेष्ठ तिलोत्तमा तथा रम्भा, ऋतुजित् तथा सप्तजित् महायशस्वी ग्रामणी, ब्रह्मप्रेत तथा यक्षप्रेत—ये राक्षस। तेजस्वी सूर्य को आप्यायित करते हैं। ऋषिगण अपने-अपने प्रसिद्ध वाक्यों से सूर्य की स्तुति करते हैं॥४३-४५॥

गन्धर्वाप्सरसश्चैव गीतनृत्यैरुपासते।
विद्युद् ग्रामणिो यक्षाः कुर्वन्तिस्म प्रदक्षिणम् ॥४६॥

गन्धर्व तथा अप्सरायें गीत-नृत्य से उपासना करते हैं। विद्युत्, ग्रामणीगण तथा यक्षगण प्रदक्षिणा करके स्तुति करते हैं॥४६॥

सर्पाः वहन्ति सूर्यं वै यातुधानानुयान्ति च।
बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद्रविम् ॥४७॥

सर्पगण सूर्य का वहन करते हैं। यातुधान उनका अनुगमन करते हैं। बालखिल्य ऋषिगण उदय के समय सूर्य को परिवृत करके अस्ताचल-पर्यन्त ले जाते हैं॥४७॥

एतेषामेव देवानां यथावीर्यं यथातपः।
यथायोगं यथातत्त्वं यथासत्त्वं यथाबलम् ॥४८॥
तथा तपत्यसौ सूर्यस्तेषामिन्द्रस्तु तेजसाम्।
एते तपन्ति वर्षन्ति यान्ति भान्ति सृजन्ति च ॥४९॥

जिन देवतागण की जैसी शक्ति है, जैसी तपस्या है, जैसा योग है, जैसा तत्त्व है, जैसा सत्व है, जैसा बल है, उसे तेजोसमूह श्रेष्ठ सूर्य उसी प्रकार का ताप प्रदान करते हैं। तब ये देवगण ताप देते हैं, वर्षा कराते हैं, गमन-प्रकाश प्रदान करते हैं तथा सृष्टि करते हैं॥४८-४९॥

भूतानामशुभं कर्म व्यपोहन्ति च कीर्त्तिताः।
एते सहैव सूर्येण भ्रमन्ते सानुगा दिवि ॥५०॥
तपन्तश्च जपन्तश्च ह्लादयन्तश्च वै प्रजाः।
गोपायन्तिस्म भूतानि सर्वाणीहानुकम्पया ॥५१॥