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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

द्वाविंशोऽध्यायः

(सोमवृद्धिक्षयः)

साम्ब उवाच

सूर्यलोके त्वया दृष्टः सूर्यसोमसमागमः।
स कथं क्षीयते सोमः क्षीणश्चाप्यायते कथम् ॥१॥
यथा सोमं पिबन्तिस्म कृष्णपक्षेऽमृताशिनः।
देवताः पितरश्चैव तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ॥२॥

साम्ब कहते हैं—आपने सूर्यलोक में सूर्य तथा चन्द्र का समागम देखा है। चन्द्र का क्यों क्षय होता है और क्षय के उपरान्त वे कैसे वृद्धि प्राप्त होते हैं?

हे सुव्रत! कृष्णपक्ष में अमृत-भक्षणकारी देवगण तथा पितृगण जैसे सोमपान करते हैं, वह मुझसे बताईये ॥१-२॥

नारद उवाच

राका चानुगती चैव पौर्णमासी द्विधा स्मृता।
सिनीवाली कुहूश्चैव अमावास्या द्विधैव तु ॥३॥

नारद कहते हैं—पूर्णिमा राका तथा अनुगतिभेद से दो प्रकार की कही गयी है। अमावास्या भी सिनीवाली तथा कुहू—दो तरह की होती है ॥३॥

अमा नाम रवे रश्मिश्चन्द्रलोके प्रतिष्ठितः।
तस्यां सोमो वसेद् यस्मादमावस्या ततः स्मृता ॥४॥
पूर्वोदिते कलाहीने पौर्णमास्यां निशाकरे।
पूर्णिमानुमतीर्ज्ञेया पश्चाद् गच्छति भास्करः ॥५॥

सूर्य की अमा नामक रश्मि चन्द्रलोक में वास करती है, उसे ही अमावस्या कहा जाता है। पूर्णिमा तिथि में चन्द्र कलाहीन होकर पूर्व में उदित होते हैं। उस पूर्णिमा तिथि को अनुमति जानना चाहिये। तब सूर्य पीछे जाते हैं ॥४-५॥

यस्मात्तामनुमन्यन्ते पितरो दैवतैः सह।
तस्मादनुमतिर्नाम पूर्णिमा प्रथमा स्मृता ॥६॥
यदा ह्यास्तमियात् सूर्यः पूर्णचन्द्रस्य चोदयः।
युगपत् सा तु वै राका तदा भवति पूर्णिमा ॥७॥

द्वाविंशोऽध्यायः ११३

चूँकि पितृगण देवताओं के साथ अनुगमन करते हैं, इसलिये अनुमति नामक पूर्णिमा को पहले कहा गया है। जब सूर्य अस्तगामी होते हैं एवं युगपत् पूर्ण चन्द्र का उदय होता है, तब उस पूर्णिमा तिथि को राका कहते हैं॥६-७॥

राका तामनुमन्यन्ते देवताः पितृभिः सह।
रक्षणाच्चैव सूर्यस्य राकेति कवयोऽब्रुवन् ॥८॥
सिनीवाली प्रमाणन्तु क्षीणशेषो निशाकरः।
अमावास्यां विशत्यर्कः सिनीवाली ततः स्मृता ॥९॥

देवगण पितृगण के साथ राका के शेष भाग का अनुमान करके सूर्य का रक्षण करने के कारण विद्वान् लोग इसे राका कहते हैं। सिनीवाली चन्द्र के क्षीणशेष का प्रमाण करके अमावस्या में सूर्य प्रवेश करते हैं, अतः उसे सिनीवाली कहा गया है॥८-९॥

कुहेति कोकिलस्योक्तिर्यावत् कालं समाप्यते।
तत्कालतुल्या चैषा वै ह्यमावास्या कुहूः स्मृता ॥१०॥

कोकिल के मुख से निर्गत वाणी जितने समय में समाप्त होती है, उस कालतुल्य अमावस्या को कुहू कहे हैं॥१०॥

अनुमत्यां सराकायां सिनीवाल्यां कुहूं विना।
एतासां पुरतः कालः कुहूमात्रं कुहूः स्मृता ॥११॥

राका के अनुमति के अंश तथा कुहू के अतिरिक्त सिनीवाली के अंश के पूर्वकाल को कुहू कहते हैं॥११॥

कलाः षोडश सोमस्य शुक्ले वर्धयते रविः।
अमृतानामतः कृष्णे पीयन्ते दैवतैः क्रमात् ॥१२॥

रवि शुक्ल पक्ष में चन्द्र के सोलह भाग को बढ़ाता है। उस अमृत को कृष्णपक्ष के देवता क्रमशः पान करते हैं॥१२॥

प्रथमां पिबते वह्निर्द्वितीयां तु रविः कलाम्।
विश्वेदेवास्तृतीयां तु चतुर्थीं तु प्रजापतिः ॥१३॥

प्रथम कला का अग्नि पान करते हैं, सूर्य द्वितीय कला का पान करता है, विश्वेदेवगण तृतीय कला का तथा प्रजापति चतुर्थ कला का पान करते हैं॥१३॥

पञ्चमीं वरुणश्चापि षष्ठीं पिबति वासवः।
सप्तमीमृषयो दिव्या वसवोऽष्टौ तथाष्टमीम् ॥१४॥

वरुण पञ्चम कला का, वासव षष्ठ कला का, दिव्य ऋषिगण सप्तम कला का एवं अष्टवसुगण अष्टम कला का पान करते हैं॥१४॥

साम्ब०—८

नवमीं कृष्णपक्षस्य पिबतीन्दोः कलां यमः।

११४ श्रीसाम्बपुराणम्

नवमीं कृष्णपक्षस्य पिबतीन्दोः कलां यमः।
दशमीं मरुतश्चापि रुद्रा एकादशीं कलाम्॥१५॥
द्वादशीं तु कलां विष्णुर्धनदश्च त्रयोदशीम्।
चतुर्दशीं पशुपतिः कलां पिबति नित्यशः॥१६॥

कृष्णपक्ष की नवम कला का यम पान करते हैं। मरुद्गण दशम कला का, रुद्रगण एकादश कला का, विष्णु द्वादश कला का, कुबेर त्रयोदश कला का तथा पशुपति नित्य ही चतुर्दश कला का पान करते हैं॥१५-१६॥

ततः पञ्चदशीं चापि पिबन्ति पितरः कलाम्।
कलावशिष्टो निष्पीतः प्रविष्टः सूर्यमण्डलम्।
अमायां विशते तस्मादमावास्या ततः स्मृता॥१७॥

तदनन्तर पञ्चदश कला का पितृगण पान करते हैं। बची हुई कला सूर्य में प्रविष्ट हो जाती है। अमा में प्रवेश करने के कारण ही इसे अमावास्या कहा जाता है॥१७॥

विशेष—अमा—चन्द्र मण्डल में १६ कला है। अमा तो महाकला है। माला का सूत्र जैसे सब दानों में अनुप्रविष्ट है, उसी प्रकार यह कला भी अन्य कलाओं में अनुप्रविष्ट रहती है। यह नित्य है, वृद्धि-क्षयरहित है। यह सभी कलाओं का आश्रय है।

पूर्वाह्ने प्रविशत्यर्कं मध्याह्ने च वनस्पतिम्।
अपराह्ने विशत्यप्सु स्वां योनिं वारिसम्भवः॥१८॥

पूर्वाह्न में चन्द्र सूर्य में प्रवेश करता है। मध्याह्न में वनस्पति में, अपराह्न में जलोद्भूत सोम (चन्द्र) स्वयोनि (अपने उत्पत्तिस्थान—जल) में प्रवेश करता है॥१८॥

वनस्पतिगते सोमे यश्छिनत्ति वनस्पतिम्।
पातयेदपि वा पर्णं युज्यते ब्रह्महत्यया॥१९॥

सोम मध्याह्न में वनस्पति में गमन करते हैं। जो व्यक्ति इस समय वनस्पति का छेदन करते हैं या उसके पत्तों को गिराते हैं, उन्हें ब्रह्महत्या का पाक लगता है॥१९॥

अपः प्रविश्य सोमस्तु शेषया कलयैकया।
तृणगुल्मलतावृक्षान्प्रीणयति चौषधीम्॥२०॥

सोम शेष एक कला द्वारा जल में प्रविष्ट होकर तृण, गुल्म, लता, वृक्ष तथा औषधि का वर्द्धन करते हैं॥२०॥

तमोषधिगतं गावश्चरन्त्यापः पिबन्ति वै।
तदङ्गानुगतं गोभ्यो क्षीरत्वमुपगच्छति॥२१॥

द्वाविंशोऽध्यायः ११५

गाय जब औषधिस्थित जल का पान करती है, तब उसके अंग-प्रत्यङ्ग में क्षीरत्व प्राप्त होता है॥२१॥

तत्क्षीरममृतं भूत्वा मन्त्रपूतं द्विजातिभिः । स्वाहाकारवषट्कारैर्हुताश्चाहुतयः क्रमात् ॥२२॥ हुतमग्निषु देवार्थे पुनः सोमं विवर्धयेत् । एवं संक्षीयते सोमः क्षीणश्चाप्यायते पुनः ॥२३॥

ब्राह्मणों द्वारा मन्त्रपूत उस अमृतमय क्षीर से स्वाहा तथा वषट् मन्त्रों से क्रमशः अग्नि में आहुति दी जाती है। देवता के उद्देश्य से अग्नि में आहूत होकर वह सोम का वर्धन करती है। इस प्रकार सोम क्षीणता को प्राप्त करके पुनः वर्द्धित होता है॥२२-२३॥

तस्मात् सूर्यः शशाङ्कस्य वृद्धिकर्त्ता स्वरश्मिभिः । एवं सम्पूज्यते देवैः परमात्मा महाद्युतिः ॥२४॥ गत्वा मित्रवनं साम्ब त्वमाराधय भास्करम् । नहि पापकृतः साम्ब भक्तिर्भवति भास्करे । तस्मात्त्वं परया भक्त्या प्रपद्यस्व दिवाकरम् ॥२५॥

इति श्रीसाम्बपुराणे सोमवृद्धिक्षयो नाम द्वाविंशोऽध्यायः

अतएव सूर्य अपनी रश्मियों द्वारा चन्द्र के वृद्धिकर्त्ता हैं। इसलिये देवगण महाकान्ति-युक्त सूर्य की पूजा करते हैं। हे साम्ब! तुम मित्रवन में जाकर सूर्य्याराधना करो। पापीगण कभी भी सूर्य की भक्ति नहीं कर सकते। अतएव हे साम्ब! तुम परम भक्ति के साथ सूर्य की शरण लो॥२४-२५॥

श्रीसाम्बपुराण का चन्द्र की वृद्धि तथा क्षयनामक द्वाविंश अध्याय समाप्त

त्रयोविंशोऽध्यायः

(राहुग्रहणविचारः)

साम्ब उवाच

सूर्यलोके त्वया विप्र गतेन ऋषिसत्तम।
आश्चर्याणि विचित्राणि दृष्टानि सुबहूनि वै॥१॥
जन्मविस्मयकर्तॄणि दुर्विज्ञेयानि मानुषैः।
तदिदं मम सन्देहं चिरकालस्थितं हृदि॥२॥
यदि श्राव्यमिदं वापि मन्यसे कथयस्व मे।
सूर्यस्य ग्रहणं दृष्ट्वा ममासीद्व्याकुलं मनः॥३॥
राहुश्च तमसो राशिस्तेजोराशिर्दिवाकरः।
स कथं ग्रस्यते तेन भानुः स्वर्भानुना मुने॥४॥
यस्य तेजोभिरखिलैः प्रकाशं क्रियते जगत्।
तदत्र परमार्थोऽयं तं समाख्यातुमर्हसि॥५॥

साम्ब कहते हैं—हे ऋषिश्रेष्ठ ब्राह्मण (नारद)! सूर्यलोक में आपने अनेक विचित्र आश्चर्य देखा है। मनुष्य के लिये जन्म की विस्मयता अत्यन्त दुर्विज्ञेय है। मेरे मन में दीर्घकाल से एक सन्देह है। उसे यदि आप सुनने योग्य मानें तब कहिये। सूर्य-ग्रहण देखकर मेरा मन अत्यन्त व्याकुल है। हे महामुने! राहु एक तमोराशि मात्र है; जबकि दिवाकर तेजोराशि हैं। हे महामुने! जिस सूर्य के तेज से निखिल जगत् प्रकाशित होता है, वह सूर्य कैसे राहु से ग्रस्त हो जाते हैं? अतएव इस विषय का यथार्थ तत्त्व मुझसे कहिये॥१-५॥

नारद उवाच

अविज्ञेयमनालक्ष्यं ज्ञानगम्यं महात्मनाम्।
रवेर्ग्रहणसंयोगे कथ्यमानं निबोध मे॥६॥

नारद कहते हैं—जो अविज्ञेय तथा अदृश्य है, केवल महात्मागण द्वारा ज्ञानगम्य है, उस सूर्य के ग्रहण-संयोग के सम्बन्ध में मुझसे सुनो॥६॥

राहुणा ग्रस्यते नार्को व्येतु ते हृदयव्यथा।
कस्य शक्तिर्गृहीतुं वै तेजोराशिं दिवाकरम्॥७॥

त्रयोविंशोऽध्यायः ११७

राहु कभी भी सूर्य का ग्रास नहीं करता। अपने हृदय की व्यथा दूर करो। तेजोराशि दिवाकर को ग्रास करने की शक्ति किसमें है?।।७।।

सर्वस्थोऽयमसंग्राह्यो ह्यबुधस्य जनस्य तु। इदं त्वद्दर्शनं साम्ब शृणु यत्ते वदाम्यहम्॥८॥

यह सूर्य सर्वत्र स्थित तथा अग्राह्य है। अज्ञजन के लिये तो अदृश्य-सा है। हे साम्ब! जो तुमसे कहता हूँ, सुनो।।८।।

यज्ज्ञात्वा तु महाज्ञानं न करिष्यति संशयम्। यदि सत्यमयं ग्रस्तस्तेजोराशिर्दिवाकरः॥९॥ तत् कथं नोदरस्थेन राहुर्भस्मीकृतः क्षणात्। तथापि राहुणाक्रम्य भानुर्वक्त्रप्रवेशितः॥१०॥ तत्कथं दर्शनैस्तीक्ष्णैः शतधा न विखण्डितः। निर्मुक्तश्च पुनर्द्दृष्टस्तथैवाखण्डमण्डलः॥११॥

इस ज्ञान को प्राप्त करके तुम कोई संशय न करो। यदि यह तेजोराशि दिवाकर वास्तव में ग्रस्त होता, तब उदरस्थित सूर्य द्वारा राहु तत्क्षण भस्म क्यों नहीं हो जाता। तथापि यदि राहु सूर्य पर आक्रमण करता है तब मुख में रखकर उनका दाँतों से खण्ड-खण्ड क्यों नहीं कर देता; अपितु राहु द्वारा (ग्रहण से) निर्मुक्त होकर सूर्य पुनः परिपूर्ण रूप ही लक्षित होता है।।९-११।।

न वास्यापहृतं तेजो न स्थानादवरोपितः। यदि चाप्येष निष्पीतः कथं दीप्ततरो भवेत्॥१२॥

इसके अतिरिक्त सूर्य का कोई तेज भी अपहृत नहीं होता। वह स्थान से विच्युत भी नहीं होता। यदि राहू ने सूर्य का निःशेष पान किया होता, तब सूर्य कैसे अधिक प्रकाशमान हो पाता।।१२।।

तस्मान्न तेजसोराशि राहोर्वक्त्रं गमिष्यति। भक्षार्थं सर्वभूतानां सोमः सृष्टः स्वयम्भुवा॥१३॥ तत्रस्थममृतं चापि सम्भृतं सूर्यतेजसा। पिबन्त्यम्बुमयं देवाः पितरश्च स्वधामयम्॥१४॥

अतएव तेजोराशि सूर्य कभी भी राहु के मुख में नहीं जाते। स्वयम्भू ब्रह्मा ने सभी प्राणियों के भक्षणार्थ सोम की सृष्टि की है। चन्द्र (सोम) स्थित अमृत भी सूर्यतेज से वर्द्धित होता है। देवगण उसी का जलमय (अमृत रूप में) तथा पितृगण स्वधामय पान करते हैं।।१३-१४।।

११८ श्रीसाम्बपुराणम्

त्रयस्त्रिंशत्त्रयश्चैव त्रयस्त्रिंशत्तथैव च।
त्रयस्त्रिंशत् सहस्राश्च देवाः सोमं पिबन्ति ते ॥१५॥
तैंतीस हजार देवगण उस सोम का पान करते हैं।।१५।।

राहोर्यदामृताद्भागः पुरा सृष्टः स्वयम्भुवा।
तस्मात्तं राहुरभ्येत्य पातुमिच्छति पर्वसु ॥१६॥
ब्रह्मा ने पूर्व में राहु के लिये अमृत भाग की सृष्टि की थी; इसीलिये राहु पर्वकाल में उसे पीना चाहता है।।१६।।

उद्धृत्य पार्थिवीं छायामल्लाकारस्तमोमयः।
पातुमिच्छंस्ततश्चन्द्रमाच्छादयति छायया ॥१७॥
अमृत-पान की इच्छा करके अन्धकारमय वाष्पाकार राहु पार्थिव छाया उद्धृत करते हैं और उस छाया से चन्द्र को आच्छन्न कर लेते हैं।।१७।।

शुक्ले स चन्द्रमभ्येति कृष्णे पर्वणि भास्करम्।
सूर्यमण्डलसंस्थं तु चन्द्रमेव जिघांसति ॥१८॥
शुक्ल पक्ष में वह चन्द्र की ओर जाता है तथा कृष्ण पक्ष के पर्वकाल में (ग्रहण काल में) सूर्य की ओर जाता है। किन्तु राहु सूर्यमण्डल-स्थित चन्द्र का ही विनाश करना चाहता है।।१८।।

तस्मात् पिबति तं राहुस्तनुमस्य विनाशयन्।
अविहिंसन् यथा पद्मं पिबते भ्रमरो मधु ॥१९॥
चन्द्रस्य वामृतं तद्वद्भैदाद्राहुरश्नुते।
जैसे भ्रमर पद्म का विनाश न करके केवल उसका मधुपान करता है, उसी प्रकार राहु भी चन्द्र का विनाश नहीं करता; अपितु चन्द्रस्थ मधु का पान करता है।।१९।।

चन्द्रकान्तो मणिर्यद्वद्धीनं क्षरति तत्क्षणात् ॥२०॥
तुषारोऽपि न हीयेत तेजसा नैव मुच्यते।
यथा सूर्यमणिश्चापि सूर्यादुत्पाद्य पावकम् ॥२१॥
न भवत्यङ्गहीनो वै तेजसा नैव मुच्यते।
एवं चन्द्रश्च सूर्यश्च छादितावपि राहुणा ॥२२॥
तेजसा न विमुच्येते नाङ्गहीनौ बभूवतुः।
पर्वण्यस्य तु चन्द्रस्य माणिक्यफलसात्कृतिः ॥२३॥
चन्द्रकान्तमणि चन्द्र के तेज को प्राप्त कर लेता है, परन्तु इससे चन्द्र का कोई क्षय नहीं होता, तुषार भी समाप्त नहीं होता तथा चन्द्र अपने तेज से च्युत नहीं होता। जैसे

त्रयोविंशोऽध्यायः ११९

सूर्यकान्त मणि सूर्य से अग्नि उत्पन्न कर लेती है, परन्तु सूर्य अंगहीन नहीं होते, तेज से विच्युत नहीं होते। ऐसे ही सूर्य तथा चन्द्र राहु द्वारा आच्छन्न होने पर भी तेज से च्युत तथा अंगहीन नहीं होते। परन्तु प्रति पर्व में चन्द्र को माणिक्य फल की प्राप्ति होती है॥२०-२३॥

सोमो दैवत्संयोगाच्छायायोगाच्च पार्थिवात्।
राहोश्च वरदानाद्वै प्रस्त्रवत्यमृतं शशी॥२४॥
स्वदोहकाले सम्प्राप्ते वत्सं दृष्ट्वा यथा च गौः।
स्वाङ्गादिव क्षरेत् क्षीरं तथेन्दुः क्षरतेऽमृतम्॥२५॥

दैववशात् पृथ्वी की छाया के योग से एवं राहु को मिले वरदान के कारण चन्द्र अमृत का क्षरण करता है। दोहनकाल में गाय जैसे अपने बछड़े को देखकर अपने अंग से दुग्ध उत्पन्न करती है, वैसे ही चन्द्र भी अमृत क्षरण करता है। सूर्य देवताओं के लिये पिता तथा चन्द्र माता के समान परिगणित होते हैं॥२४-२५॥

मातृस्तनं यथा पीत्वा तृप्यन्ते सर्वजन्तवः।
पीत्वामृतं तथा सोमो तृप्यन्ते पितृदेवताः॥२६॥

जैसे माँ के स्तनपान से सभी प्राणी तृप्त हो जाते हैं, वैसे ही पितृदेवगण चन्द्र का अमृत पीकर तृप्त हो जाते हैं॥२६॥

सम्भृतं पर्वयोगेषु तथायं क्षरते शशी।
तं क्षरन्तं यथाभागमुपयुञ्जन्ति देवताः॥२७॥

चन्द्र पर्वों पर अमृत का क्षरण करते हैं और उसका देवगण अपने भाग के अनुसार भोग करते हैं॥२७॥

तस्मिन् काले समभ्येत्य राहुरप्यपकर्षति।
सर्वमर्द्धं त्रिभागं वा पादं पादार्धमेव वा॥२८॥
आक्रम्य पार्थिवीं छायां यावतीं चन्द्रमण्डलम्।
स्मृतः स भागो राहोस्तु देवभागश्च शेषकः॥२९॥

उस समय राहु आकर (अमृत का) आकर्षण करता है। पूर्ण, आधा, तीन भाग, पाद अथवा पादार्ध पृथ्वी की छाया के अनुसार जितने चन्द्रमण्डल पर आक्रमण करता है, वह भाग राहु का तथा शेष देवगण का हो जाता है॥२८-२९॥

तृप्तिं विधाय देवानां राहोः पर्वगतस्य च।
चन्द्रो न क्षीणतां याति तेजसा नैव मुच्यते॥३०॥

देवताओं की तथा पर्वगत राहु की तृप्ति का विधान करके चन्द्रमा क्षीण नहीं होता, किंवा तेज से विच्युत भी नहीं होता॥३०॥

१२० श्रीसाम्बपुराणम्

तिथिभागस्तु यावन्तं पुनरर्कप्रमाणतः। एवं छायास्थिते काले भगवानेष कीर्त्तितः ॥३१॥

सूर्य प्रमाण में जितनी तिथि का भाग है, उतनी पृथ्वी की छाया द्वारा आच्छन्नता के समय भगवान् सूर्य को राहुग्रस्त कहा जाता है॥३१॥

अधो राहुः परः सोमः सोमादूर्ध्वं दिवाकरः। पर्वकाले स्थितिस्त्वेवं विपरीता गतौ पुनः ॥३२॥ अतश्छादयते राहुरभ्रवच्छशिभास्करौ। राहुरभ्रकसंस्थानं सोममाच्छाद्य तिष्ठति ॥३३॥ उद्धृत्य पार्थिवीं छायां धूमान्मेघ इवोत्थितः।

नीचे राहु, उसके ऊपर चन्द्र, चन्द्र के ऊपर सूर्य—पर्वकाल में इनकी यह स्थिति होती है और विपरीत गति होती है। अतएव जैसे मेघ चन्द्र-सूर्य को आच्छन्न करता है, वैसे ही राहु भी उसे ढक लेता है। राहु मेघमण्डल-पर्यन्त चन्द्र को आच्छन्न करके स्थित रहता है॥३२-३३॥

तेऽभ्रावखण्डितं तस्य केवलं श्यामलीकृतम्। कर्दमेन यथा वस्त्रं शुक्लत्वमपहन्यते ॥३४॥

मेघमण्डल के समान राहु केवल सूर्य को कलङ्कित (काले रंग की छाया से युक्त) करता है। जैसे कीचड़ से वस्त्र की शुक्लता अपगत हो जाती है, वैसे ही एक हिस्से को अथवा पूर्ण चन्द्रमण्डल को राहु आच्छन्न करता है। जैसे पुनः धो देने पर वस्त्र शुभ्र हो जाता है, वैसे ही राहुमुक्त चन्द्रमण्डल भी निर्मल हो जाता है॥३४॥

राहुणाच्छादितावापि दृष्ट्वा चन्द्रदिवाकरौ। विप्राः शान्तिपरा भूत्वा पुनराप्याययन्ति वै ॥३५॥

अथवा चन्द्र-सूर्य को राहु द्वारा आच्छादित देखकर ब्राह्मणगण उसकी शान्ति करने लगते हैं और पुनः उन्हें मुक्त देखकर आनन्दित होते हैं॥३५॥

एवञ्च गृह्यते सूर्य्यश्चन्द्रमास्तत्र गृह्यते ॥३६॥ अबुधास्तत्र पश्यन्ति मनुष्या मांसचक्षुषः। जगत् सम्मोहनं चैव ग्रहणं चन्द्रसूर्ययोः ॥३७॥

इस प्रकार राहु चन्द्र तथा सूर्य को जब ग्रहण करता है तब चर्मचक्षु वाले अबोध मानव उसे चन्द्र-सूर्य का ग्रहण मानते हैं तथा समस्त जगत् उस ग्रहण से सम्मोहित हो जाता है॥३६-३७॥

त्रयोविंशोऽध्यायः १२१

पुण्यं महापवित्रं तु स्नाने दाने तथा जपे।
विदित्वा चास्य माहात्म्यं सर्वदेवसमागमम्।
ध्यात्वा श्रुत्वा पठित्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३८॥

इति श्रीसाम्बपुराणे राहुग्रहणविचारो नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः

स्नान, दान तथा जपविशेष के लिये ग्रहणकाल अत्यन्त महापुण्यमय तथा पवित्र समय होता है। सभी देवता इस समय एकत्र होते हैं और इसका माहात्म्य जानकर ध्यान करते हैं, श्रवण करते हैं तथा पाठ करते हैं और समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं।।३८।।

श्रीसाम्बपुराण में राहुग्रहणविचार नामक त्रयोविंश अध्याय समाप्त

चतुर्विंशोऽध्यायः

वशिष्ठ उवाच

एवं सूर्यस्य माहात्म्यं वर्णितं हर्षवर्द्धनम्।
प्रीतित्वमाप्तवानेव ततः संश्रुत्य नारदात् ॥१॥
विनयादुपसङ्गम्य देवस्य पुरतस्तदा।
निपत्य दीनया वाचा साम्बः पितरमब्रवीत् ॥२॥

वशिष्ठ कहते हैं—देवर्षि नारद से सूर्य के हर्षवर्द्धक माहात्म्य को सुनकर साम्ब ने प्रीतिलाभ किया। तदनन्तर सविनय पूर्वक पिता श्रीकृष्ण के पास जाकर उन्हें प्रणाम करके दीन वाणी से इस प्रकार कहने लगे॥१-२॥

साम्ब उवाच

कश्मलेनाभिभूतोऽस्मि मलेनाङ्गावसेविना।
वैद्यैर्नौषधिभिर्वापि न शान्तिर्विद्यते मम ॥३॥
वनं यास्यामि गोविन्द अनुज्ञां दातुमर्हसि।
शिवेन पुण्डरीकाक्ष ध्यायस्व पुरुषोत्तम ॥४॥

साम्ब कहते हैं—मैं मालिन्य से अभिभूत हो गया हूँ। स्वेदादि मल (कुष्ठरोग-जनित) से मेरी देह अवसन्न है। किसी वैद्य अथवा औषधि से शान्ति नहीं मिल रही है। हे गोविन्द! हे पुण्डरीकाक्ष! आपकी अनुमति लेकर वन में जाना चाहता हूँ॥३-४॥

अनुज्ञातः स कृष्णेन सिन्धोरुत्तरकूलतः।
ज्ञात्वा संतारयामास चन्द्रभागां महानदीम् ॥५॥

कृष्ण द्वारा सुख से ध्यान करने की अनुज्ञा प्राप्त करके साम्ब सिन्धु के उत्तरी किनारे पर स्थित महानदी चन्द्रभागा को पार कर गये॥५॥

तत्र मित्रवनं गत्वा तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
उपवासकृशः साम्ब शुद्धो धमनितस्ततः ॥६॥
आराधनार्थं सूर्यस्य गुह्यं स्तोत्रमिदं जगौ।
चतुर्भिः सम्मितं वेदैः पुराणाशयबृंहितम् ॥७॥

तदनन्तर त्रिभुवन-विख्यात महातीर्थ मित्रवन में जाकर उपवास द्वारा कृश, शुद्ध धमनी वाले साम्ब ने आराधनार्थ चतुर्वेद-तुल्य पुराण के आशय से युक्त सूर्य के परम रहस्यमय स्तोत्र का पाठ करना प्रारम्भ किया॥६-७॥

चतुर्विंशोऽध्यायः१२३

यदेतन्मण्डलं शुक्लं दिव्यं ह्यजरमव्ययम्।
युक्तं मनोजवैरश्वैर्हरितैर्ब्रह्मवादिभिः ॥१८॥
आदिरेव हि भूतानामादित्य इति संज्ञितः।
त्रैलोक्यश्चक्षुरेषोऽत्र परमात्मा प्रजापतिः ॥१९॥

सूर्यभण्डल शुक्ल, दिव्य, अजर तथा अव्यय है। यह ब्रह्मवादी मन से भी द्रुतगामी हरितवर्ण अश्वों से युक्त है। सभी प्राणियों के आदि होने के कारण इसे आदित्य कहा जाता है। ये त्रैलोक्य के नेत्र (चक्षुस्वरूप) परमात्मा तथा प्रजापति हैं ॥१८-१९॥

य एष मण्डले ह्यस्मिन् पुरुषो दीप्यते महान्।
एष विष्णुरचिन्त्यात्मा ब्रह्मा चैव प्रजापतिः ॥२०॥
रुद्रो महेन्द्रो वरुणः आकाशः पृथिवी जलम्।
वायुः शशाङ्कः पर्जन्यो धनाध्यक्षस्तथैव च ॥२१॥

इस मण्डल में जो महान् पुरुष दीप्त हो रहे हैं, वे अचिन्त्य आत्मस्वरूप विष्णु, ब्रह्मा तथा प्रजापति हैं। यहीं रुद्र, वरुण, आकाश, पृथिवी, जल, वायु, चन्द्र, मेघ तथा धनाध्यक्ष के रूप में कुबेर विराजित हैं ॥२०-२१॥

स एष मण्डले ह्यस्मिन्नग्निवर्चाः प्रकाशते।
सहस्ररश्मिरेषोऽत्र द्वादशात्मा दिवाकरः ॥२२॥
स एष मण्डले ह्यस्मिन् पुरुषो दीप्यते महान्।
एष साक्षान्महादेवो वृत्तकुम्भनिभः शुभः ॥२३॥

इस मण्डल में अग्नितेज से जो प्रकाशित हैं, वे ही हैं—सहस्ररश्मि द्वादशात्मा दिवाकर। इस मण्डल में जो महान् पुरुष दीप्त हैं, वे गोलाकार कुम्भ के समान मंगलदायक साक्षात् महादेव हैं ॥२२-२३॥

कालो ह्येष महायोगी संहारोत्पत्तिलक्षणः।
य एष मण्डले ह्यस्मिंस्तेजोभिः पूरयन्महीम् ॥२४॥
भ्रमते ह्यव्यवच्छिन्नो धातैषोऽमृतलक्षणः।
नातः परतरो देवस्तेजसा विद्यते क्वचित् ॥२५॥

ये कालस्वरूप महायोगी तथा संहार एवं उत्पत्ति के कारण हैं। वे इस मण्डल के तेज द्वारा पृथ्वी को पूर्ण करके निरन्तार भ्रमण करते रहते हैं। ये अमृतस्वरूप धाता हैं। इनकी अपेक्षा कोई भी तेजस्वी देवता कहीं भी नहीं है ॥२४-२५॥

पुष्णाति सर्वभूतानि ह्येष एव स्वधामृतैः।
अन्तःस्थो म्लेच्छजातीयांस्तिर्यग्योनिगतानपि ॥२६॥

१२४श्रीसाम्बपुराणम्

ये स्वधारूप अमृत से सभी प्राणियों का पोषण करते हैं। ये सबके अन्तः में, यहाँ तक कि म्लेच्छ जाति तथा तिर्यक् योनिगत प्राणियों के अन्तः में भी स्थित रहते हैं॥१६॥

कारुण्यात् सर्वभूतानि पासि देव विभावसो।
आपत्सु च विमोक्षार्थं त्वं भक्तानभिरक्षसि॥१७॥
चित्रकुष्ठान्धबधिरान् खञ्जान्पङ्गूञ्जडांस्तथा।
प्रपन्नवत्सलो देव नीरुजः कुरुषे नरान्॥१८॥

हे देव विभावसु! आप कल्पनावशात् सभी प्राणियों का पालन करते हैं। विपत्-समूह में उनके मोचनार्थ आप भक्तों की रक्षा करते हैं। हे प्रपन्नवत्सल देव! चित्रकुष्ठ, अन्ध, वधिर, खञ्ज, पङ्गु तथा जड लोगों को आप ही रोगमुक्त करते हैं॥१७-१८॥

दद्रुगण्डनिमग्नांश्च निर्ब्रणान्यूरुषांस्तथा।
प्रत्यक्षदर्शी त्वं देव समुद्धरसि लीलया॥१९॥

दद्रु, गण्ड (विस्फोटकादि) प्रभृति रोग में निमग्न पुरुषों को आप नीरोग कर देते हैं। हे देव! आप प्रत्यक्षदर्शी देवता हैं और अपनी लीला से (अनायास ही) सबका उद्धार कर देते हैं॥१९॥

का मे शक्तिस्तव स्तोतुमार्त्तोऽहं रोगपीड़ितः।
स्तूयसे त्वं सदा देव ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः॥२०॥

मैं आर्त्त तथा रोगपीड़ित हूँ। आपकी स्तुति करने की शक्ति मुझमें कहाँ है? हे देव! आप सर्वदा ब्रह्मा-विष्णु-शिवादि से स्तुत होते हैं॥२०॥

महेन्द्रसिद्धगन्धर्वैरप्सरोभिः सगुह्यकैः।
स्तुतिभिः किं पवित्रैर्वा तव देव समीरिताः॥२१॥

हे देव! इन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व, गुह्यगण के साथ अप्सरागण पवित्र स्तुति द्वारा आपका स्तवन करते हैं॥२१॥

यस्य ते ऋग्यजुःसाम्नां त्रितयं मण्डले स्थितम्।
ध्यायिनां तु परं धाम मोक्षद्वारं च मोक्षिणाम्॥२२॥

आपके मण्डल में ऋक्-यजुः तथा साम (यह त्रयी) मूर्त्तिमान होकर अवस्थान करते हैं। आप योगीगण के परम धाम तथा मोक्षाभिलाषियों के लिये मोक्षद्वार हैं॥२२॥

अनन्तं तेजसां तेजो ह्यचिन्त्याव्यक्तनिर्मलम्।
यदप्यपाहतं किञ्चिद् स्तोत्रेऽस्मिन् जगतःपते।
आर्त्तभक्तिं च विज्ञाय तत् सर्वं क्षन्तुमर्हसि॥२३॥

चतुर्विंशोऽध्यायः १२५

तेजों में आपका तेज अनन्त, अचिन्त्य, अव्यक्त तथा निर्मल है। हे जगत्पति! यदि मेरे इस स्तव में कुछ वैगुण्य हुआ है, तो उसे आप आर्त्तजनों की भक्ति समझकर क्षमा करने में समर्थ हैं॥२३॥

तमुवाच नरः प्रीतः सूर्यो जाम्बवतीसुतम्।
प्रीतोऽस्मि तपसा वत्स वरं ब्रूहि यमिच्छसि॥२४॥

परमात्मस्वरूप सूर्य प्रसन्न होकर जाम्बवती-नन्दन साम्ब से बोले—हे साम्ब! वत्स! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हो गया। जो इच्छा हो, उस वर की प्रार्थना करो॥२४॥

साम्ब उवाच

यदि प्रसन्नो भगवानेष एव वरो मम।
भक्तिर्भवतु मे नित्यं त्वयि देवे सनातने॥२५॥

साम्ब कहते हैं—हे भगवन्! यदि आप प्रसन्न हैं तब हमें यही वर दीजिये कि आप सनातन देव के प्रति मेरी नित्य भक्ति बनी रहे॥२५॥

सूर्य उवाच

भूयस्तुष्टोऽस्मि भद्रं ते वरं वरय सुव्रत।
स द्वितीयं वरं वव्रे तं देवं वरदं शुभम्॥२६॥
मलं शरीरस्थमिदं त्वत्प्रसादात् प्रणश्यतु।
तथास्त्वित्युक्तमात्रोऽसौ भास्करेण महात्मना॥२७॥
तन्मुमोच मलं साम्बो देहात्त्वचमिवोरगः।
ततो लब्धवरः साम्बो रूपवांश्चाभवत् पुनः॥२८॥

सूर्यदेव कहते हैं—इससे मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ हूँ। तुम्हारा मंगल हो। हे सुव्रत! वर माँगो। साम्ब ने कल्याणप्रद वरद सूर्यदेव से द्वितीय वर इस प्रकार माँगा—मेरे शरीर का यह मल (कुष्ठरोग) आपकी कृपा से नष्ट हो जाय। महात्मा भास्कर के 'तथास्तु' कहते ही साम्ब के देह से वह कुष्ठरोग उसी प्रकार समाप्त हो गया, जैसे कि सर्प अपनी केंचुल त्याग देता है। यह वर पा जाने से साम्ब पुनः रूपवान हो गये॥२६-२८॥

सूर्य उवाच

भूयश्च शृणु मे साम्ब तुष्टोऽहं यद् ब्रवीमि ते।
अद्य प्रभृति त्वन्नाम्ना मम स्थानानि सुव्रत!॥२९॥
क्षितौ ये स्थापयिष्यन्ति तेषां लोकः सनातनः॥३०॥
स्थापयस्व च मामस्मिंश्चन्द्रभागातटे शुभे।
त्वत्समानमिदं चापि पुरं साम्ब भविष्यति॥३१॥

१२६ श्रीसाम्बपुराणम्

सूर्यदेव कहते हैं—हे साम्ब! तुमसे सन्तुष्ट होकर जो कहता हूँ, उसे सुनो! हे सुव्रत! आज से तुम्हारे नाम से पृथ्वी पर जो मेरा स्थान स्थापित करेगा, उसे सनातन लोक की प्राप्ति होगी। हे साम्ब! शुभ चन्द्रभागा के तट पर मुझे स्थापित करो। तुम्हारे नाम से ही यह नगर प्रसिद्ध होगा।।२९-३१।।

कीर्त्तिस्तवाक्षया लोके यावद् भूमिर्भविष्यति।
भूयश्च ते प्रदास्यामि प्रत्यहं स्वप्नदर्शनम्॥३२॥

जब तक पृथ्वी रहेगी, जगत् में तुम्हारी अक्षय कीर्ति बनी रहेगी और प्रतिदिन तुम्हें स्वप्न में मेरा दर्शन प्राप्त होगा।।३२।।

एवं दत्त्वा वरं तस्मै वृष्णिसिंहाय भास्करः।
प्रत्यक्षदर्शनं दत्त्वा तत्रैवान्तरधीयत॥३३॥

सूर्यदेव वृष्णिसिंह साम्ब को इस प्रकार का वर तथा प्रत्यक्ष दर्शन देकर वहाँ से अन्तर्हित हो गये।।३३।।

पठेद् द्विज इदं स्तोत्रं त्रिकालं भक्तिमान्नरः।
नारी वा दुःखशोकार्त्ता मुच्यते शोकसागरात्॥३४॥

हे ब्राह्मण! जो भक्तिमान व्यक्ति अथवा दुःख-शोक से कातर नारी त्रिकाल में इस स्तोत्र का पाठ करेंगे, वे शोकसागर से मुक्त हो जायेंगे।।३४।।

चक्षुःपीडा मनःपीडा ग्रहपीडाभ्य एव च।
बन्धने निगडे घोरे काष्ठागारगृहेषु या॥३५॥

नेत्र की पीड़ा, मन की पीड़ा, ग्रहपीड़ा, घोर शृङ्खला-बन्धन तथा काष्ठागार गृह के बन्धन से वे मुक्त हो जायेंगे।।३५।।

अधस्तादन्तरिक्षे वा क्षमते भक्तिवत्सलः।
त्रिसप्तशतमावर्त्तैर्होमैस्त्वां सप्तरात्रिकम्॥३६॥
राज्यकामो लभेद्राज्यं धनकामो लभेद्धनम्।
रोगार्त्तो मुच्यते रोगाद् यथा साम्बस्तथैव सः॥३७॥

इति श्रीसाम्बपुराणे रोगोपनयनो नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः

अधोलोक में अथवा अन्तरिक्ष में भक्तवत्सल सूर्यदेव सभी को क्षमा करते हैं। सात रात्रि २१०० आवर्त्त होम करने से राज्याभिलाषी राज्य प्राप्त करते हैं, धनकामी धनलाभ करते हैं एवं जैसे साम्ब रोग से मुक्त हो गये थे, वैसे ही रोगार्त्त व्यक्ति रोगमुक्त हो जाते हैं।।३६-३७।।

श्रीसाम्ब पुराण का रोगोपनयन नामक चतुर्विंश अध्याय समाप्त

पञ्चविंशोऽध्यायः

(श्रीसूर्यस्तवराजवर्णनम्)

वशिष्ठ उवाच

स्तुवंस्तत्र ततः साम्बः कृशो धमनिसन्ततः।
राजन्नामसहस्रेण सहस्रांशुं दिवाकरम् ॥१॥
खिद्यमानं तु तं दृष्ट्वा सूर्यः कृष्णात्मजं तदा।
स्वप्ने तु दर्शनं दत्त्वा पुनर्वचनमब्रवीत् ॥२॥

वशिष्ठ कहते हैं—महाराज साम्ब सहस्रांशु दिवाकर के सहस्र नाम के द्वारा स्तव करते-करते जब कृश एवं धमनीशिरा-मात्र हो गये तब खिद्यमान कृष्णपुत्र साम्ब को देखकर सूर्य ने उनको स्वप्न में दर्शन देकर इस प्रकार कहा।।१-२।।

सूर्य उवाच

साम्ब साम्ब महाबाहो शृणु जाम्बवतीसुत।
अलं नामसहस्रेण पठस्वेमं स्तवं शुभम् ॥३॥
यानि नामानि गुह्यानि पवित्राणि शुभानि च।
तानि ते कीर्त्तयिष्यामि श्रुत्वा त्वमवधारय ॥४॥

सूर्य कहते हैं—साम्ब-साम्ब! महाबाहो! जाम्बवतीनन्दन! सहस्र नामों का प्रयोजन नहीं है। तुम इस शुभ स्तव का पाठ करो। ये नाम अत्यन्त गुप्त हैं, पवित्र तथा शुभप्रद हैं। उन्हें मैं कहता हूँ। तुम स्थिर होकर धारण करो।।३-४।।

ॐ विकर्त्तनो विवस्वांश्च मार्त्तण्डो भास्करो रविः।
लोकप्रकाशकः श्रीमाँल्लोकचक्षुर्गृहेश्वरः ॥५॥
लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्त्ता हर्त्ता तमिस्रहा।
तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः ॥६॥
गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः।
एकविंशतिरित्थेष स्तव इष्टः सदा मम ॥७॥

ॐ, विकर्तन, विवस्वान्, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, श्रीमान्, लोकचक्षु, ग्रहेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश, कर्त्ता, हर्त्ता, तमिस्रहा, तपन, तापन, शुचि, सप्ताश्ववाहन, गभस्तिहस्त, ब्रह्मा एवं सर्वदेवनमस्कृत—इन इक्कीस नामों से स्तुति मुझे सदा प्रिय है।।५-७।।

१२८ श्रीसाम्बपुराणम्

शरीरारोग्यदश्चैव धनवृद्धियशस्करः।
स्तवराज इति ख्यातस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥ १८॥

यह शरीर के लिये आरोग्यप्रद, धनवर्धक तथा यशप्रद स्तवराज तीनों लोकों में प्रसिद्ध है॥१८॥

य एतेन महाबाहो द्वे सन्ध्येऽस्तमनोदये।
स्तौति मां प्रणतो भूत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१९॥
कायिकं वाचिकं चापि मानसं यच्च दुष्कृतम्।
तत् सर्वमेकजाप्येन प्रणश्यति ममाग्रतः ॥२०॥
एष जाप्यश्च होमश्च सन्ध्योपासनमेव च।
बलिमन्त्रोऽर्घ्यमन्त्रश्च धूपमन्त्रस्तथैव च॥२१॥

हे महाबाहो! जो व्यक्ति दोनों सन्ध्या के समय (सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय) इस स्तव के द्वारा प्रणत होकर मेरी स्तुति करेगा, वह समस्त पापों से मुक्त हो जायेगा। समस्त कायिक, वाचिक तथा मानसिक दुष्कृत मेरे समक्ष इस स्तुति के मात्र एक जप से ही समाप्त हो जाते हैं। यह मन्त्र जाप्य (जपयोग्य) है। इससे होम, सन्ध्या, उपासना, बलि (उपहार प्रदान) किया जा सकता है। यही अर्घ्य का तथा धूप-प्रदान का भी मन्त्र है॥१९-२१॥

अन्नप्रदाने स्नाने च प्रणिपाते प्रदक्षिणे।
पूजितोऽयं महामन्त्रः सर्वव्याधिहरः शुभः॥२२॥

इस मन्त्र से अन्नदान, स्नान, प्रणाम तथा प्रदक्षिणा भी की जा सकती है। यह महामन्त्र पूजित होने पर व्याधिविनाशक तथा शुभप्रद होता है॥२२॥

एवमुक्त्वा तु भगवान् भास्करो जगदीश्वरः।
आमन्त्र्य कृष्णतनयं तत्रैवान्तरधीयत ॥२३॥
साम्बोऽपि स्तवराजेन स्तुत्वा सप्ताश्ववाहनम्।
पूतात्मा नीरुजः श्रीमाँस्तस्माद्रोगाद्विमुक्तवान्॥२४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे रोगापनयने श्रीसूर्यवक्त्रविनिःसृतस्तवराजवर्णनं नाम पञ्चविंशतितमोऽध्यायः


यह कहकर जगत् के नियामक भगवान् भास्कर कृष्णपुत्र साम्ब से विदा लेकर वहाँ से अन्तर्हित हो गये। साम्ब भी इस स्तवराज से सप्त अश्ववाहन सूर्य की स्तुति करके पवित्रात्मा होकर, नीरोग, शोभायुक्त (श्रीमान्) हो कुष्ठ रोग से मुक्त हो गये॥२३-२४॥

श्री साम्बपुराण में सूर्यकृत स्तवराजवर्णन नामक पञ्चविंश अध्याय समाप्त

षड्‌विंशोऽध्यायः

(मगानयनम्)

अथ लब्ध्वरः साम्बः प्राप्तं रूपं पुरातनम्।
मन्यमानस्तदाश्चर्यं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥१॥
पूर्वाभ्यासेन तेनैव सार्धमन्यैस्तपस्विभिः।
स्नानार्थं नातिदूरस्थां चन्द्रभागां नदीं ययौ ॥२॥

तदनन्तर वर-लाभ करके साम्ब ने पुरातन रूप प्राप्त किया। इसे अत्यन्त आश्चर्य मानकर वे मन ही मन आनन्दित हो गये। पुरानी आदत के कारण वे अन्य तपस्वीगण के साथ स्नान के लिये पास की चन्द्रभागा नदी में गये।।१-२।।

स स्नात्वा सहसैवाथ पश्यतिस्म प्रभावतीम्।
ऊह्यमानां जलौघेन प्रतिमामुन्मुखीं रवेः ॥३॥

उन्होंने स्नान करके हठात् देखा कि जल के स्रोत में सूर्य की प्रभा से युक्त एक उज्ज्वल प्रतिमा प्रतिच्छवित हो रही है।।३।।

स तामुत्तीर्य सलिलादानयित्वा स्वमाश्रमम्।
तस्मिन्मित्रवनोद्देशे स्थापयित्वा विधानतः ॥४॥

वे उस प्रतिमा को जल से निकाल कर अपने आश्रम में लाये और मित्रवन के एक स्थान पर उसे विधानपूर्वक स्थापित किया।।४।।

ततस्तामेव पप्रच्छ प्रणम्य प्रतिमां रवेः।
केनेयं निर्मिता नाथ भवतो ह्याकृतिः शुभा ॥५॥

तदनन्तर उस सूर्यप्रतिमा को प्रणाम करके साम्ब ने पूछा—हे नाथ! आपकी इस शुभ आकृति का निर्माण किसने किया है?।।५।।

प्रतिमा तमुवाचाथ शृणु साम्ब यतस्त्वियम्।
निर्मिता येन चाप्येषा पुरुषेण ममाकृतिः ॥६॥

प्रतिमा ने उत्तर किया—साम्ब! सुनो, जैसे उस प्रतिमा का निर्माण हुआ है और जिस पुरुष ने उसका निर्माण किया है।।६।।

ममातितेजसाविष्टं रूपमासीत् पुरातनम्।
असह्यं सर्वभूतानां ततोऽहं प्रार्थितः सुरैः ॥७॥

१३० | श्रीसाम्बपुराणम्

सह्यं भवतु ते रूपं सर्वप्राणभृतामिह।
ततो मया समादिष्टो विश्वकर्मा महातपाः ॥८॥

पहले मेरा रूप अत्यन्त तेजयुक्त था, जो समस्त प्राणिगण के लिये असह्य था। इसलिये देवताओं ने मुझसे प्रार्थना किया कि सभी प्राणियों के लिये आपका रूप सह्य हो जाय। इसलिये मैंने महातेजस्वी देवशिल्पी विश्वकर्मा को आदेश दिया॥७-८॥

तेजसः शातनं कुर्वन् रूपं निर्वर्त्तयस्व मे।
ततस्तु मत्समादेशात्तेनैव निपुणं तदा ॥९॥
शाकद्वीपे भ्रमिं कृत्वा रूपं निर्वर्त्तितं मम।
प्रीत्या ते साम्प्रतं चैव समयाकारितं पुनः ॥१०॥

(मैंने आदेश दिया कि) ‘मेरे तेज का खण्डन करके मेरा रूप तैयार करो’। तदनन्तर मेरे आदेश के अनुसार उन्होंने शाकद्वीप में भ्रमि (घूर्णिचक्र यन्त्र) पर (काट-छाँट कर) मेरे रूप का निर्माण किया। यहाँ मैंने तुम्हारी प्रसन्नता के लिये उनको बुलाया है॥९-१०॥

तेनेयं कल्पवृक्षात्तु निर्मिता प्रतिमा मम।
कृत्वा हिमवतः पृष्ठे पुण्यसिद्धनिषेविते ॥११॥
त्वदर्थं चन्द्रभागायां ततस्तेनावतारिता।
भवतस्तारणार्थं हि जातं स्थानमिदं मम ॥१२॥

विश्वकर्मा ने पुण्यशाली सिद्धों की आवासभूमि हिमालय के पृष्ठ पर कल्पवृक्ष से मेरी प्रतिमा का निर्माण किया था और तुम्हारे लिये उसे इस चन्द्रभागा नदी पर रख दिया था। तुम्हारी मुक्ति के लिये ही मेरा यह स्थान प्रकट हुआ है॥११-१२॥

रुचिरं सर्वदा चात्र सान्निध्यं मे भविष्यति ॥१३॥
सान्निध्यं मम पूर्वाह्ने उदिते रञ्जयते जनः।
कालात्यये च मध्याह्ने सायाह्ने चात्र नित्यशः ॥१४॥

इस स्थान पर सर्वदा मेरा मनोहर सान्निध्य रहेगा। पूर्वाह्न में उदित होने पर लोग मेरा सान्निध्य पाकर आनन्दित होंगे। तदनन्तर मध्याह्न तथा सायाह्न में भी नित्य मेरा सान्निध्य प्राप्त करेंगे॥१३-१४॥

वशिष्ठ उवाच

श्रुत्वा देवस्य तद्वाक्यं दृष्ट्वा प्रत्यक्षदर्शिनम्।
कृत्वा देवगृहं साम्बस्ततः प्रोवाच नारदम् ॥१५॥

वशिष्ठदेव कहते हैं—सूर्यदेव की बात सुनकर और प्रत्यक्ष उनका दर्शन पाकर साम्ब ने देवगृह का निर्माण करके नारद से इस प्रकार कहा॥१५॥

षड्विंशोऽध्यायः १३१

साम्ब उवाच त्वत्प्रसादान्मया प्राप्तं रूपमेतत् सनातनम्। प्रत्यक्षदर्शनं चापि भास्करस्य महात्मनः ॥१६॥ सर्वमेतच्च सम्प्राप्य पुनश्चिन्ताकुलं मनः। देवस्य परिचर्यायाः पालनं कः करिष्यति ॥१७॥ गुणयुक्तो द्विजो यो हि समर्थः परिपालने। ममैवानुग्रहाद् ब्रह्मन् विचिन्त्याख्यातुमर्हसि ॥१८॥ एवमुक्तस्तु साम्बेन नारदः प्रत्युवाच तम् ॥१९॥

साम्ब कहते हैं—आपकी कृपा से मैंने यह सनातन दिव्य रूप प्राप्त कर लिया एवं महात्मा भास्कर का प्रत्यक्ष दर्शन भी प्राप्त किया। यह सब पाकर भी मेरा मन चिन्तायुक्त ही है कि सूर्यदेव की (प्रतिमा की) पूजा—परिचर्या कौन करेगा? हे ब्रह्मन्! गुणयुक्त कौन ब्राह्मण है, जो इस कार्य में समर्थ है? मुझ पर अनुग्रह करके यह बतायें। साम्ब से यह सुनकर नारद उनसे कहने लगे॥१६-१९॥

नारद उवाच न द्विजः परिगृह्णन्ति देवस्यात्मीकृतं धनम्। विद्यते च धनं ह्यत्र गुरुश्चायं प्रतिग्रहः ॥२०॥ देवचर्यागतैर्द्रव्यैः क्रिया ब्राह्मी न विद्यते। अविज्ञाय च कुर्वन्ति ये क्रिया लोभमोहिताः ॥२१॥ अपांक्तेया भवन्तीह ते वै देवलका द्विजाः। अविज्ञाय विधानं ये ब्राह्मणा लोभमोहिताः ॥२२॥ देवस्वमुपभोक्ष्यन्ति पतितास्ते भवन्ति हि। गर्हितं मानवं शास्त्रं न प्रशंसन्ति ते द्विजाः ॥२३॥

नारद कहते हैं कि देवता का धन ब्राह्मण नहीं लेते। यह धन तो है; लेकिन उसका प्रतिग्रह अत्यन्त कठिन है। देवता की परिचर्या में प्राप्त द्रव्य द्वारा ब्राह्मण का कोई काम नहीं होता। यह तत्त्व जाने बिना जो लोभ से मुग्ध होकर इसे प्रतिगृहीत करते हैं, ऐसे पुरोहित गण सद् ब्राह्मणों के साथ एक पंक्ति में भोजन ग्रहण करने योग्य नहीं होते। अज्ञानवशात् लोभ से विमुग्ध जो ब्राह्मण देवस्व (देवमूर्त्ति-पूजन से प्राप्त धन) का भोग करते हैं, वे पतित हो जाते हैं। ऐसे निन्दित ब्राह्मणगण की मानवशास्त्र में प्रशंसा नहीं की गई है॥२०-२३॥

देवस्वं ब्राह्मणस्वं च यो लोभादुपजीवति। स पापात्मा परे लोके गृध्रोच्छिष्टेन जीवति ॥२४॥