भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

पञ्चदशोऽध्यायः ७७

यदोदरं ज्योतिरतिग्मकं स्थितं यदप्सु तेजो यदपीह चक्षुषि।
अग्नौ यदुष्णं भगणे यदाहितं तथैव तद्रूपमनेकधा स्थितम् ॥१३॥
जठर का जो तेज है, जल का जो तेज है, चक्षु का जो तेज है, अग्नि की जो उष्णता है और नक्षत्रों में जो तेज आहित है, वह आपका ही रूप है और आप ही अनेक रूप में अवस्थान करते हैं॥१३॥

सुरद्विषः सागरतोयवासिनः प्रचण्डपाशासिपरश्वधायुधाः।
समुत्थिता ये भुवि पापचेतसः प्रयान्ति नाशं तव देवदर्शनात् ॥१४॥
हे देव! सागर जलनिवासी, प्रचण्ड पाश, परशु तथा विविध अस्त्रधारी असुरगण एवं पृथ्वी में पापचेता जो असुर उत्थित होते हैं, वे तुम्हारे दर्शनमात्र से ही नाश प्राप्त हो जाते हैं॥१४॥

स्तुतः स भगवानेवं प्रजापतिमुखैः सुरैः।
मत्वा तेषामभिप्रायमुवाच भगवानिदम् ॥१५॥
इस प्रकार से प्रजापति-प्रमुख देवगण द्वारा स्तुत होकर सूर्यदेव उनके अभिप्राय को जानकर इस प्रकार बोले॥१५॥

हितं चोपहितं नित्यं गायत्र्यं यद्वचः परम्।
तद्वै ब्रूत सुरा क्षिप्रं किं मया क्रियतां स्वयम् ॥१६॥
आपके गायत्री-मूलक जो वाक्य हैं, वे सदा हितकारी हैं। हे देवगण! शीघ्र कहिये, मुझे क्या करना है?॥१६॥

लब्धानुज्ञास्ततस्ते तु सुराः संहृष्टमानसाः।
त्वष्टारं पूजयामासुर्मनोवाक्कायकर्मभिः ॥१७॥
आदेश पाकर देवगण हृष्टचित्त से मानसिक-वाचिक तथा कायिक कर्म से त्वष्टा (सूर्य) की पूजा करने लगे॥१७॥

ततस्तं तेजसो राशिं सर्वलोकविधानवित्।
भ्रमिमारोपयामास विश्वकर्मा विभावसुम् ॥१८॥
तदनन्तर सकल लोकों के विधानकारी विश्वकर्मा ने तेजोराशि विभावसु (सूर्य) को भ्रमि (घूर्णिचक्र) पर स्थापित किया॥१८॥

अमृतेनाभिषिक्तस्य स्तूयमानस्य चारणैः।
तेजसः शातनं चक्रे विश्वकर्मा शनैः शनैः ॥१९॥
विश्वकर्मा धीरे-धीरे अमृत से अभिषिक्त एवं चारणों द्वारा स्तूयमान सूर्यदेव के तेज का छेदन करने लगे (उनकी काट-छाँट करके मसृणता सम्पादन करने लगे)॥१९॥