साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें७६ श्रीसाम्बपुराणम्
ततस्तमुदयोदग्रं शैलराजावतंसकम्।
सप्रजापतयः सर्वे संस्तौतुमुपचक्रमुः ॥७॥
ऐसा कहने से (उनके इस प्रकार कहने से) भगवान् कमलासन (ब्रह्मा) कहते हैं—
तुम्हारे साथ मैं इन देव की शरण लेता हूँ। तदनन्तर श्रेष्ठ पर्वत के वंशधर उदयाचल के शिखर पर अवस्थित सूर्यदेव के लिये प्रजापति गण के साथ वे सब स्तुति करने लगे।।६-७।।
ब्रह्मोवाच
नमो नमः सुरवरतिग्मतेजसे नमो नमः प्रणतहितानुकम्पिने ।
नमो नमस्त्रिभुवनभूतभाविने क्रतुक्रियाशुभफलसम्प्रदायिने ॥८॥
शुभाशुभप्रविचयकर्मसाक्षिणे सहस्रसंदीधितये नमो नमः ।
प्रशस्तसप्ताश्वयुतान्तपक्षिणे ध्रुवैकरश्मिग्रथितायते नमः ॥९॥
सबालखिल्याप्सरकिन्नरोरगैः ससिद्धगन्धर्वपिशाचगुह्यकैः ।
सयक्षरक्षोगणचारणोत्तमैर्नमो नमः सत्कृतवन्दिताय ते ॥१०॥
ब्रह्मा कहते हैं—हे देवश्रेष्ठ! तीक्ष्ण किरणमालिन्! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप प्रणतजनों के लिये हितानुकम्पी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। त्रिभुवन के प्राणियों के रक्षक, यज्ञक्रिया का शुभ फल देने वाले आपको बार-बार नमस्कार है। बालखिल्य, अप्सरा, किन्नर, सर्पगण, सिंह, गन्धर्व, पिशाच, गुह्यक, यक्ष, राक्षस और चारणश्रेष्ठ द्वारा पूजित तथा स्तुत आपको नमस्कार है।।८-१०।।
यदा रसान् संसृजते शरीरिणां गभस्तिभिर्घर्महिमाम्बुसर्जनैः ।
जगच्च संशोषयसे ससागरं नमः सदाम्नायनुताय भास्वते ॥११॥
जब तेज, हिम तथा जल सृष्टि के द्वारा देहधारी गण में रस की सृष्टि करते हैं, तब आपकी किरणों द्वारा सागर के साथ-साथ समस्त जगत् का भी शोषण किया जाता है, सर्वदा वेदस्तुत तेजप्रकाशक आपको नमस्कार है।।११।।
जड़ान्धमूकान् बधिरान् सकुब्जकान्
सदद्रुकुष्ठान् कृमिभिः स्रवद्व्रणान् ।
करोषि तानेव पुनर्नवान् यदा
तदा महाकारुणिकाय ते नमः ॥१२॥
जड़, अन्ध, मूक, वधिर, कुब्ज, दद्रु, कुष्ठ, कृमि-क्षारित, व्रणयुक्त तथा काश-रोगीगण को आप पुनः नवीन शरीर-सा कर देते हैं। अतः आप महा कारुणिक को नमस्कार है।।१२।।