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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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७८ श्रीसाम्बपुराणम्

आजानुलिखितश्चासौ सुरासुरमनोरगैः।
नाभ्यनन्दत् सलिखनं ततस्तेनावतारितः॥२०॥

देवता, असुर तथा सर्पगण द्वारा सूर्य को जानु-पर्यन्त लिखा गया (छेदन किया गया), उसे उन्होंने अभिनन्दित नहीं किया। तब विश्वकर्मा ने उन्हें घूर्णिचक्र से उतारा॥२०॥

ततः प्रभृति देवस्य चरणौ नित्यसंवृतौ।
तापय हृदयं चैव युक्ततेजोऽभवत्ततः॥२१॥

तब से सूर्य के चरणद्वय नित्य संवृत हैं तथा वे हृदय को तप्त करने वाले तेज से युक्त हैं॥२१॥

शातितञ्चास्य यत्तेजस्तेन चक्रं विनिर्मितम्।
येन विष्णुर्जघानोग्रान् दानवानमितौजसः॥२२॥

इन सूर्य का जो तेज खण्डित किया गया था, उससे चक्र निर्मित हुआ और उस चक्र से विष्णु भगवान् ने अति तेजस्वी असुरों का विनाश किया॥२२॥

शूलशक्तिगदाचक्रं शरासनपरश्वधान्।
दैवतेभ्यो ददौ कृत्वा विश्वकर्मा महामतिः॥२३॥

महामति विश्वकर्मा ने उस तेज से शूल, शक्ति, गदा, चक्र, धनुष, बाण तथा परशु का निर्माण करके देवताओं को प्रदान किया॥२३॥

ब्रह्मवक्त्रोद्भवं स्तोत्रं संध्ययोरुभयोर्जपन्।
कुलं पुनाति पुरुषो व्याधिभिर्न च पीड्यते॥२४॥
प्रजावान् सिद्धकर्मा च जीवेत् साग्रं शरच्छतम्।
पुत्रवान् धनवांश्चैव सर्वत्रैवापराजितः॥२५॥
विभिन्नप्राणसंघाते सावित्र्यं लोकमाप्नुयात्॥२६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ब्रह्मस्तोत्रं नाम पञ्चदशोऽध्यायः

ब्रह्मा के मुख से निर्गत इस स्तोत्र को प्रातः तथा सायं सन्ध्याकाल में जो जपता है, वह पुरुष अपने कुल को पवित्र करता है और उसे व्याधिजनित पीड़ा नहीं होती। वह पुरुष प्रजायुक्त तथा सिद्धकर्मा होकर शताधिक वर्ष तक जीवित रहता है एवं पुत्रवान्, धनवान् होकर सर्वत्र विजयी होता है। विभिन्न जन्मों में क्रमशः उन्नत योनि में जन्म पाता है और पवित्र लोकों में गमन करता है॥२४-२६॥

श्री साम्बपुराण का ब्रह्मास्तव नामक पञ्चदश अध्याय समाप्त

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