साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १७१
आरोप्य प्रतिमां यत्नाद्यो जयेद्वाजिनः शुभान्।
हरिल्लक्षणसम्पन्नान् सुमुखा वशवर्तिनः ॥२४॥
कुङ्कुमेन समालब्धांश्चामरैश्च विभूषितान्।
सदश्वान् योजयित्वा तु रथाचार्यं प्रदापयेत् ॥२५॥
मनोहर श्रेष्ठ रथ निर्मित हो जाने पर उस पर यत्नपूर्वक (मन्दिर में स्थापित) सूर्य की प्रतिमा रक्खे। शुभ अश्वगण को उसमें जोते। हरित् वर्ण सुलक्षणयुत सुमुख तथा वशवर्ती अश्वों को नियुक्त करे। कुङ्कुम द्वारा लिप्त, चँवर से विभूषित सत् अश्वगण से युक्त रथ को रथचालक चलाये॥२४-२५॥
विधिवत् पूजयित्वा तु धूपमाल्यानुलेपनैः ।
आहारैर्विविधैश्चापि भोजयित्वा द्विजोत्तमान् ॥२६॥
सूर्यक्रतौ तु वितते एवमाहुर्मनीषिणः ।
यच्चिन्तयति भग्नाशः क्षुधया च प्रपीडितः ॥२७॥
अदाता हि पितॄंस्तेन स्वर्गस्थानपि पातयेत्।
यज्ञश्च दक्षिणाहीनः सवितुर्न प्रशस्यते ॥२८॥
उनका पूजन धूप-माला तथा अनुलेपन से यथाविधि करे तथा द्विजश्रेष्ठ गण को धूप-माल्यादि से सन्तुष्ट करके विविध आहार प्रदान करें। सूर्ययज्ञ आरम्भ करने पर मनीषी-गण यह कहते हैं कि यदि (द्विजगण की) आशा भङ्ग हो, यदि क्षुधा से पीड़ित हों, तब इसके दुष्फल से (पूजक के) पितरगण निम्नगामी होते हैं। सूर्य का दक्षिणारहित यज्ञ कभी भी प्रशंसित नहीं है॥२६-२८॥
तस्मान्नानाविधैः कामैर्भक्ष्यभोज्यान्नविस्तरैः ।
प्रीणयित्वा जनं सर्वमममुच्चारयेद्विधिम् ॥२९॥
अतएव नानाविध अभिलषित भक्ष्य, भोज्य तथा प्रचुर अन्न से जनगण का प्रीतिविधान करके निम्नांकित मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये॥२९॥
बलिं गृह्णन्तु मे देवा आदित्या वसवस्तथा।
मरुतश्चाश्विनौ रुद्राः सुपर्णाः पन्नगा ग्रहाः ॥३०॥
असुरा यातुधानाश्च रथस्था देवताश्रयाः ।
दिक्पाला लोकपालाश्च ये च विघ्नविनायकाः ॥३१॥
जगतः स्वस्तिकुर्वाणास्तथा दिव्या महर्षयः ।
मा विघ्नो मा च मे पापं मा च मे परिपन्थिनः ॥३२॥
सौम्या भवन्तु तृप्ताश्च देवा भूतगणास्तथा ॥३३॥