भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 180

१७० श्रीसाम्बपुराणम्

सर्वेषां तु रथानां वै श्रेष्ठः स च रथः स्मृतः।
तं दृष्ट्वा तु ततस्त्वन्ये स्यन्दना विश्वकर्मणा ॥१५॥
कल्पिताः सर्वदेवानां सोमादीनामनेकशः।
वैवस्वतेन च ततो मनुनेक्ष्वाकवे पुनः ॥१६॥
रथो दत्तस्तु तेनापि मानुषेष्ववतारितः।
अतस्तु रथयानेन चालनं तु हितं रवेः ॥१७॥

नारद कहते हैं—महात्मा सूर्यदेव की सांवत्सरिक यात्रा के निमित्त ब्रह्मा ने पूर्व में रथ तैयार किया था। समस्त रथों में उसे श्रेष्ठ रथ कहा गया है। उसे देखकर विश्वकर्मा, चन्द्रमा प्रभृति ने अनेक रथ का निर्माण किया। उसके अनन्तर वैवस्वत मनु ने इक्ष्वाकु को रथ दिया। उससे मनुष्य लोक में रथ का प्रचलन हुआ। अतः रथयान से सूर्यदेव का चालन हितकर है॥१४-१७॥

तस्मान्न दुष्यते तेषां सवितुश्चालनं च यत्।
तस्माद्रथेन पर्येति भास्करः पृथिवीमिमाम् ॥१८॥
गच्छन्न दृश्यते चैव मण्डलं सवितुः सदा।
अदृश्यं चञ्चलं दृष्टं यस्माज्जाम्बवतीसुत ॥१९॥
तदेतां रथयात्रां तु दृष्ट्वा भानोर्मनीषिभिः।
अन्येषां चालनं नास्ति देवानां यदुनन्दन ॥२०॥

हे साम्ब! अतएव सूर्यप्रतिमा को (स्थापित स्थान से हटाकर) रथ पर बैठाकर यात्रा कराना दोषपूर्ण नहीं है। इसीलिये सूर्यदेव भी रथ पर बैठकर पृथ्वी का पर्यटन करते हैं। उनके गमन काल में (आकाश में) सर्वदा सूर्यमण्डल देखा जाता है। हे जाम्बवतीपुत्र साम्ब! जो अदृश्य अथवा चञ्चल है, वह दृष्ट होता है। इसी कारण मनीषीगण सूर्यदेव की रथयात्रा का विधान कहते हैं। हे यदुनन्दन! अन्य देवगण का चालन नहीं होता॥१८-२०॥

ब्रह्मविष्णुशिवादीनां स्थापितानां विधानतः।
तस्माद्रथेन देवस्य रवेर्यात्रा विधीयते ॥२१॥
प्रजानामिह शान्त्यर्थं प्रतिसंवत्सरं तथा।
काञ्चनो वाथ रौप्यो वा दृढदारुमयोऽपि वा ॥२२॥
दृढाक्षरथचक्रश्च रथः कार्यः सुयन्त्रितः।
तस्मिन् रथवरे श्रेष्ठे कल्पिते सुमनोहरे ॥२३॥

विधानपूर्वक स्थापित विष्णु, ब्रह्मा, शिवादि का चालन (यात्रा) विहित नहीं है। अतएव रथ पर सूर्यदेव की यात्रा का ही विधान है। प्रजागण की शान्ति के लिये प्रतिवर्ष स्वर्ण, रौप्य (चाँदी) अथवा मजबूत काष्ठ-निर्मित दृढ़ अक्ष तथा रथचक्रयुक्त रथ का निर्माण उचित है॥२१-२३॥