साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 179, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें| चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः | १६९ |
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तीर्थों के नाम को लेते हुये मन ही मन स्मरण करे। पुष्कर, नैमिष, कुरुक्षेत्र, पृथूदक (कपालमोचन तीर्थ के कुछ दूर पर अवस्थित तीर्थविशेष का नाम), गंगा, सरस्वती, सिन्धु, चन्द्रभागा, नर्मदा, पयोष्णी, यमुना, ताम्रा, क्षिप्रा, वेत्रवती नदियों तथा सागरों का सम्मिलित नाम लेना चाहिये। उस जल से स्नान का विधान करके अर्चना एवं प्रणाम करके धूप एवं अर्घ्य देकर प्रतिमा का अधिवास करना होगा॥५-७॥
त्रिरात्रं सप्तरात्रं वा मासाद्धं मासमेव च॥८॥
अतोऽस्य कारयेद् यात्रां शान्तिहेतोर्जनस्य च।
रथेन दर्शनीयेन किङ्किणी-जालमालिना ॥९॥
जनगण की शान्ति हेतु तीन रात्रि, सात रात्रि अथवा आधा मास अथवा एक मास व्यापिनी किङ्किणी जालसमूह में दर्शनीय रथ से सूर्यदेव की यात्रा कराये॥८-९॥
प्रीणयित्वा द्विजान् सर्वान् दक्षिणाभोजनादिभिः।
रथस्थां प्रतिमां कृत्वा कुर्यात् स्थान-प्रदक्षिणम्॥१०॥
दक्षिणा, भोजन प्रभृति द्वारा ब्राह्मणों का सन्तोष विधान करके प्रतिमा को रथ पर स्थापित करके स्थान-प्रदक्षिणा करानी चाहिये॥१०॥
एवं वै क्रियमाणायां यात्रायां प्रतिवत्सरम्।
प्रजाश्च सुखमेधन्ते राजा जयति चाहितान् ॥११॥
इस प्रकार से प्रत्येक वत्सर में यात्रा करना चाहिये। इससे प्रजा सुखी रहती है और राजा शत्रुजित् हो जाता है॥११॥
नीरुजश्च जनः सर्वो गवां शान्तिर्भवेत्तथा।
कर्त्तारश्चापि यात्रायाः स्वर्गभाजो भवन्ति वै॥१२॥
सभी लोग नीरोगी होते हैं। गौ समूह को शान्ति मिलती है तथा यात्रा का विधान करने वाले भी स्वर्ग प्राप्त करते हैं॥१२॥
साम्ब उवाच
कथं सञ्चालयेद् भूयः स्थापितां प्रतिमां सकृत्।
एतत्तु वद विप्रर्षे सुमहान् संशयो हि मे॥१३॥
साम्ब कहते हैं—एक बार स्थापित की गयी प्रतिमा को कैसे चालित किया जाय? हे विप्रर्षि! यह कहिये। इस सम्बन्ध में मुझे महान् संशय है॥१३॥
नारद उवाच
पूर्वमेव सहस्त्रांशोर्यानहेतोर्महात्मनः।
संवत्सरस्यावयवैर्ब्रह्मणैः कल्पितो रथः॥१४॥