साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः
(देवयात्रा)
वसिष्ठ उवाच
अथ संवत्सरे पूर्णे स्थापितस्य दिवस्पतेः।
साम्बः पप्रच्छ भूयोऽपि नारदं चर्षिसत्तमम् ॥१॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—सूर्यदेव के मन्दिर-स्थापना का एक-वर्ष पूर्ण हो जाने पर साम्ब ने ऋषिश्रेष्ठ नारद से कहा॥१॥
साम्ब उवाच
स्थापितस्य सहस्रांशोः पूर्णे संवत्सरे पुनः।
कथं सांवत्सरी पूजा कर्तव्या चर्षिसत्तम! ॥२॥
साम्ब कहते हैं—हे महर्षि! सहस्र किरण सूर्यदेव का वर्ष पूर्ण हो गया। अब किस प्रकार से सांवत्सरी पूजा करनी होगा, कहिये॥२॥
नारद उवाच
यथोक्तेन विधानेन प्रतिमास्थापने कृते।
संवत्सरे ततः पूर्णे स्नानकर्म विधानवित् ॥३॥
तीर्थोदकमुपानीय ह्यन्यच्चापि जलं शुचिः।
पूर्वोक्तेन विधानेन प्रतिमां स्नापयेद् बुधः ॥४॥
नारद कहते हैं—प्रतिमा-स्थापना काल में जैसा विधान कहा गया है, संवत्सर पूर्ण होने पर स्नानकर्म के विधानज्ञ विज्ञ व्यक्ति तीर्थजल तथा अन्य पवित्र जल लाकर पूर्वोक्त विधानानुसार प्रतिमा को स्नान करायें॥३-४॥
जपेच्च तीर्थनामानि मनसा संस्मरेत्ततः।
पुष्करं नैमिषं चैव कुरुक्षेत्रं पृथूदकम् ॥५॥
गंगा सरस्वती सिन्धुश्चंद्रभागा च नर्मदा।
पयोष्णी यमुना ताम्रा क्षिप्रा वेत्रवती तथा ॥६॥
सरितः सागराश्चैव सान्निध्यं कल्पयन्तु वै।
एवं स्नानविधिं कृत्वा ह्यर्चयित्वा प्रणम्य च ॥७॥
धूपमर्घ्यञ्च दत्वा तु प्रतिमामधिवासयेत्।