भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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२०६ श्रीसाम्बपुराणम्

शुक्ल, जयन्त, विजय, नैककर्ण, हुताशन, हुतार्चि एवं व्यापक—ये सात अश्व कहे गये हैं।।४६।।

ॐ हारिण्यै स्वाहा इडा। ॐ विहारिण्यै स्वाहा सुषुम्ना। ॐ आनन्दायै स्वाहा विदुः। ॐ भाविन्यै स्वाहा संज्ञा। ॐ मोहिन्यै स्वाहा प्रमर्दिनी। ॐ ज्वालिन्यै स्वाहा प्रकर्षिणी। ॐ तापिन्यै स्वाहा महाकाली। ॐ कल्पायै स्वाहा कल्पिका। ॐ क्रुद्धायै स्वाहा प्रबोधिनी। ॐ मृत्यवे स्वाहा नीलाम्बरा। ॐ हरात्यै स्वाहा घना। ॐ द्रुमाय स्वाहा शुक्ला। ॐ शुद्धाय स्वाहा जयन्तः। ॐ महाघोरणाय स्वाहा विजयः। ॐ चित्राय स्वाहा अनेकवर्णः। ॐ रुद्राय स्वाहा हुताशनः। ॐ संवलिताय स्वाहा हुतार्चिः। ॐ महाशिखाय स्वाहा व्यापकः। ॐ ज्वलित-चण्डलोचनाय स्वाहा अरुणोरथस्थाने।

एवमालिख्य विधिवन्मण्डलं शास्त्रपूर्वकम्।
पूर्वप्रतिष्ठिते वह्नौ संस्कारं कारयेत्पुनः ॥४७॥

शास्त्र के अनुसार विधिपूर्वक मण्डल बनाकर ‘ॐ हारिण्यै स्वाहा’ इत्यादि मन्त्रों से आहुति देकर पूर्व में प्रतिष्ठित की गई अग्नि का पुनः संस्कार करे।।४७।।

परिसमूहनं तत्र गायत्र्या चोपलेपनम्।
शन्नो भवन्तु वनस्पदित्युल्लेखनविन्दुना ॥४८॥
अभ्युक्षणं विन्दुना।
आद्याक्षरसंयुक्तेन अग्नेः स्थापनमुत्तमम्।
तत्त्वमध्ये प्रणवो भवेत्।
कृत्वा वह्निक्रियामेतां यथावदनुपूर्वशः।
सुयजेत् क्षीरसंयुक्तं चरूद्वादशसंज्ञितम्।
संवृत्यार्घ्यं तु गायत्र्या होमयेज्जातवेदसम् ॥४९॥

वहाँ परिसमूहन एवं गायत्री द्वारा उपलेपन करे। ‘शन्नो भवन्तु वनस्पद्’ इत्यादि मन्त्र से बिन्दु-लेखन करना चाहिये। बिन्दु द्वारा अभ्युक्षण करना चाहिये। आद्य अक्षर संयुक्त करके अग्नि का स्थापन करना चाहिये। तत्त्व में प्रणवयुक्त करे। यथायथ आनुपूर्वीक वह्निक्रिया इस प्रकार से करके १२ क्षीर संयुक्त चरु से यज्ञ करना चाहिये। अर्घ्य संस्कृत करके गायत्री द्वारा अग्नि में हवन करना चाहिये।।४८-४९।।

यथोद्दिष्टेन मन्त्रेण सूत्रान्नति जुहुयात्।
होमान्ते प्राशनं कृत्वा गुरुदेवं प्रपूजयेत्।
पूजयित्वा विशेषेण विधानोक्तेन कर्मणा ॥५०॥