साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 215, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २०५
पद्म के ही तुल्य द्वार होगा। प्रकोष्ठ भी द्वार के तुल्य माप का होगा। पथ (वीथी) भी प्रकोष्ठ के समान होगा। यह स्थिति कही गयी है। मन्त्र जपने वाला साधक शुभ्र, रक्त, पीत तथा हरित कृष्ण वर्ण मण्डल को गायत्री से शोधित करके अंकित करे। यह मण्डल चारो ओर से आठ हाथ होगा। बाहर मण्डलाकृति होगी। उसमें उससे आधे माप की वापी (पुष्करिणी) के समान पुर का अंकन करे।।३७-३९।।
तन्मध्ये तु लिखेत्पद्मं पत्रद्वादशभूषितम्।
मूर्त्तिद्वादशकं तेषु निवेशेत्तु विधानवित् ॥४०॥
चतुरस्रं पुनः कृत्वा बाह्यतो स्रगमालिखेत्।
वज्रं शक्तिं च दण्डं च खड्गं पाशं तथैव च॥
ध्वजं गदां त्रिशूलं च यथारूपं व्यवस्थितम् ॥४१॥
उसमें (मध्य में) द्वादश पत्रभूषित पद्म का अङ्कन करना चाहिये। विज्ञानज्ञ व्यक्ति उसमें (द्वादश पद्म में) द्वादश मूर्त्ति स्थापित करे। अब चतुरस्र बनाकर बाहर स्रक् (माला) का अङ्कन करे। वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वजा, गदा तथा त्रिशूल को यथायथ रूप से स्थापित करे।।४०-४१।।
परो विश्वात्मकः शम्भुर्नमस्कारो वषट्कृतः।
सम्बुद्धो विश्वकर्त्ता च निष्कलो ज्ञानसम्भवः ॥४२॥
मानोन्मानो महासत्त्वो द्वादशैते प्रकीर्तिताः।
आधारभूताः सर्वस्य जगन्नाथो व्यवस्थितः ॥४३॥
पर, विश्वात्मक, शम्भु, नमस्कार, वषट्कृत, सम्बुद्ध, विश्वकर्त्ता, निष्कल, ज्ञानसम्भव, मान, उन्मान, महासत्त्व—ये बारह समस्त जगत् के आधाररूप तथा जगत् के पालकरूप से कीर्त्तित हैं।।४२-४३।।
अभीषवे इदं विष्णुधामच्छन्दोमनोज्योतिश्चत्वारि शृंगास्ते प्राणाय अग्निमीडे ईषे त्वोज्जे॑ अग्न आयाहि शन्नो देवी कृत्तिवासा ब्रह्मयज्ञानामिति यद्देवा द्वादश-मूर्तयः॥४४॥
मध्ये मूर्त्तिर्महाकाली कल्पिका च प्रबोधिनी।
नीलाम्बरा घनान्तस्था अमृता च प्रकीर्तिता ॥४५॥
'अभीषवे इदं विष्णुधाम' इत्यादि (मूल में अङ्कित) मन्त्रात्मक द्वादश मूर्त्ति देवता हैं। मध्य में महाकाली, कल्पिका, प्रबोधिनी!, नीलाम्बरा, घनान्तस्था तथा अमृता का स्थान कहा गया है।।४४-४५।।
शुक्लो जयन्तो विजयो नैकवर्णो हुताशनः।
हुतार्चिर्व्यापकश्चैव अश्वाः सप्त प्रकीर्तिताः ॥४६॥