भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 214

२०४ श्रीसाम्बपुराणम्

धूपमेवं क्रमेणैव बलिं चापि सुसंस्कृतम्।
तिलांस्त्रिमधुरोपेतान् जुहुयात् कर्मसिद्धये ॥३२॥

इसी प्रकार से धूप तथा सुसंस्कृत बलि भी प्रदान करे। तदनन्तर घृत-मधु तथा शर्करायुक्त तिल की कर्मसिद्धि हेतु आहुति प्रदान करे॥३२॥

ॐ इन्द्राय परमात्मने स्वाहा। ॐ अग्नये शुचिष्मते ठः ठः। ॐ यमाय धर्मात्मने ठः ठः। ॐ निर्ऋतये कालात्मने ठः ठः। ॐ वरुणाय सलिलात्मने ठः ठः। ॐ वायवे स्पर्शात्मने ठः ठः। ॐ सोमायामृतात्मने ठः ठः। ॐ ईशानाय ज्ञानात्मने ठः ठः। ॐ पराय विद्महे तेजोरूपाय धीमहि तन्नस्तेजः प्रचोदयात् ॥३३॥

महामन्त्रमिमं पुण्यं महामण्डलसम्भवम्।
स्मरन्ति ये सदा राजंस्ते भवन्ति हितद्विजाः ॥३४॥

आहुति का मन्त्र मूल में दिया गया है। परमात्मा इन्द्र-हेतु, शुचिष्मान अग्नि-हेतु, धर्मरूप यम-हेतु, कालात्मा निर्ऋति-हेतु, जलस्वरूप वरुण-हेतु, स्पर्शात्मक वायु, अमृतात्मा सोम तथा ज्ञानस्वरूप ईशान के हेतु आहुति प्रदान करनी चाहिये। तदनन्तर मन्त्र कहे 'हम परतत्त्व को जानते हैं, तेजोरूप का ध्यान करते हैं, वह परमात्मा तेजस्वरूप सूर्यदेव हमारी शक्ति (तेज) का प्रेरण करे'। राजन्! महामण्डल से उद्भूत एवं अतिशय पवित्र यह महा-मन्त्र सदा स्मरण करना चाहिये। यह ब्राह्मणों के लिये हितकारक होता है॥३३-३४॥

शरीरमण्डलस्येदं महामन्त्रं प्रकीर्तितम्।
तस्मान्महत्त्वमेवोक्तं मण्डलस्य पुरातनैः ॥३५॥
कर्णिकाऽष्टाङ्गुला प्रोक्ता केसरं तत्समं स्मृतम्।
कर्णिका केशरैस्तुल्या यमस्य परिकीर्तिता ॥३६॥

शरीरमण्डल का यह महामन्त्र कहा गया है। इसीलिये प्राचीन लोग इसे मण्डल में महत्तम (सर्व बृहन्मण्डल) कहते हैं। मण्डल का मध्यभाग (कर्णिका) आठ अंगुल का हो। केशर भी उसी के समान हो। पद्म की कर्णिका केशर के माप की ही होगी। ऐसा कहा गया है॥३५-३६॥

पद्मतुल्यः स्मृतो द्वारः प्रकोष्ठो द्वारतुल्यकः।
वीथिः प्रकोष्ठकैस्तुल्या स्थितिरेषा प्रकीर्तिता ॥३७॥
सितं रक्तं तथा पीतं हरितं कृष्णमेव च।
आलिखेन्मण्डलं मन्त्री गायत्र्या परिमन्त्रितम् ॥३८॥
अष्टहस्तं समन्तात्तु बाह्यतो मण्डलाकृतिः।
तदर्द्धेन पुनर्मध्यं वापीतुल्यं पुरं लिखेत् ॥३९॥

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