भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

एकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २०३

महामण्डलवेत्ता तु ह्याचार्यो यत्र तिष्ठति।
तत्र तिष्ठति देवोऽसौ लोकनाथो जगत्पतिः॥२५॥

शिष्य को भी गुरु के समान ही गुणयुक्त होना चाहिये। वह गुरु के कार्य में सर्वदा नियुक्त हो तथा धर्म-प्राप्तिरूप फल-लाभार्थ भक्ति से प्रेरित हो। हीन जाति, नास्तिक, अशुचि व्यक्ति का (गुरु को) त्याग कर देना चाहिये। साथ ही उनका भी त्याग कर देना चाहिये, जो सर्वदा देवता, द्विज एवं गुरुदेव की निन्दा में लगे रहते हैं। जिनकी सगुण अथवा निर्गुण में भक्ति है, जो प्राणियों का हित चाहने वाला है, उसी का ग्रहण गुरु को शिष्यरूप में करना चाहिये। महामण्डलों को जानने वाला आचार्य जहाँ पर रहता है, वहाँ पर संसार के स्वामी भगवान् सूर्य का वास होता है॥२२-२५॥

तत्र पुण्या जनपदाः प्रजाश्च निरुपद्रवाः।
नारायणाधिपस्तत्र कृतकृत्यो महीपतिः॥२६॥

जो पुण्यदेश हो, जहाँ की प्रजा उपद्रवशून्य हो तथा जनगण के पालक शासक (जहाँ के) कृतज्ञ हों, वहाँ स्वयं नारायण का वास होता है॥२६॥

ज्ञात्वा तु परमं ज्ञानं सर्वदीक्षासमन्वितः।
सर्ववेदपवित्रश्च गृह्यशास्त्रात्मकः सदा॥२७॥
अविकल्पं विकल्पं च योगं सर्वार्थसाधकम्।
कन्याकर्तितसूत्रेण अर्कतूलमयेन वा॥२८॥
वर्त्तयेत् त्रिवृतं सूत्रं ग्रन्थिकेशविवर्जितम्।
देवस्य त्वेतिमन्त्रेण त्रिरादित्यं न वा पुनः।
प्रोक्षयेत् त्रिवृतं सूत्रं ततः कर्म समाचरेत्॥२९॥

परमज्ञान लाभ करके, सभी दीक्षा से युक्त होकर गृह्यशास्त्रानुसार (समस्त प्रयोजन-निष्पादक) अविकल्प अथवा विकल्प योगानुष्ठान करे। कन्या द्वारा काते गये सूत्र अथवा मदार की रुई के सूत्र से, गांठ तथा केशरहित त्रिवृत (तीन दण्डी—नौ गुण) सूत्र का यज्ञोपवीत धारण कराये। ‘देवस्य त्वा’ इत्यादि मन्त्र से अथवा ‘त्रिरादित्यं न वा’ इत्यादि मन्त्र से त्रिवृत सूत्र (यज्ञोपवीत) का प्रोक्षण करके तब कर्मारम्भ करे॥२७-२९॥

हेमपात्रं प्रगृह्यादौ रौप्यमौदुम्बरं क्रमात्।
अर्घ्यं दत्वा दिगीशेभ्यो यथापूर्वं क्रमेण तु॥३०॥
मध्ये नारायणाख्याय सूर्याय परमात्मने।
तेजोबुद्बुदरूपाय अर्घ्यपात्रं निवेदयेत्॥३१॥

पहले स्वर्णपात्र ग्रहण करे। तदनन्तर चाँदी तथा गूलर की लकड़ी से निर्मित पात्र लेकर क्रमशः (यथापूर्व क्रमेण) दिग्देवतागण को अर्घ्य देना चाहिये। मध्य में नारायण नामक तेजःप्रकाशरूप सूर्य के लिये अर्घ्यपात्र निवेदित करे॥३०-३१॥