भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 212

२०२ || श्रीसाम्बपुराणम्

गूलर की लकड़ी में स्वर्ण का फाल लगाकर उससे भूमि को खोदना एवं समतल बनाना चाहिये। तदनन्तर तलदेश को समान करके भूमि को सुधालेप से लिप्त करे तथा पञ्चगव्य एवं रक्त चन्दन तथा जल से उस स्थान को सिञ्चित करे।।१४-१५।।

चन्दनेन पुनर्लेपो रक्तेन तु विधीयते।
यथा न स्फुटते भूमिस्तथा कुर्यात् प्रयत्नतः ॥१६॥
स्फुटिता दूषिता भूमिः क्वचिन्निम्ना दरिद्रता।
उच्छ्रिता छिद्रिता चैव सर्वापदभिशंसिनी ॥१७॥
एवं समाहितां कृत्वा मनोह्लादकरीं शुभाम्।
आप्तैः शुद्धैश्च शुचिभी रक्षां कुर्वीत यत्नतः ॥१८॥

रक्तचन्दन से पुनः लेपन करना चाहिये, जिससे भूमि स्फुटित न हो अर्थात् मिट्टी दिखलाई न पड़े; क्योंकि भूमि स्फुटित होना दोष है। भूमि का कहीं-कहीं नीची होना दरिद्रता-प्रदायक होता है। ऊँची तथा छिद्रयुक्त होने से अनेक आपत्तियाँ आती हैं। इस प्रकार मन को आनन्दप्रदायक शुभ भूमि का निर्माण करे और शुद्ध-पवित्र आप्त जन उसकी रक्षा करें।।१६-१८।।

तस्याश्चोत्तरपार्श्वेन कुर्याद् गुरुगृहं महत्।
सम्भारसम्भृतः शिष्यो गुरोरात्मानमर्पयेत् ॥१९॥
विशुद्धकुलसम्भूतं वेदवेदाङ्गपारगम्।
आत्मविद्यारतं दान्तं देवद्विजपरायणम् ॥२०॥
अप्रव्रजितधर्माणं त्रयीमार्गव्यवस्थितम्।
मानवं धर्मवेत्तारमग्रजन्मा त्रिकालिकम्।
गुरुमेवंविधं विद्याच्छिष्यं वक्ष्याम्पतः परम् ॥२१॥

तदनन्तर उत्तर की ओर गुरु के लिये बृहद् गृह निर्मित कराये। समस्त सम्भार के साथ गुरु के निकट शिष्य स्वयं को अर्पित करे। विशुद्ध वंश वाले, वेद-वेदाङ्ग में पारङ्गत, आत्मविद्यारत, विजितेन्द्रिय, देव-ब्राह्मण की सेवा में तत्पर, गृहस्थ, वेदविहित पथ से धर्मानुष्ठान करने वाले, धर्मवेत्ता, त्रिकालज्ञ ब्राह्मण को गुरु बनाना चाहिये। अब शिष्य का वर्णन करता हूँ।।१९-२१।।

गुरोर्गुणसमः शिष्यस्तस्य कार्ये व्यवस्थितः।
चोदितो भक्तितत्त्वेन धर्मप्राप्तिफलं प्रति ॥२२॥
वर्जयेद्धीनजातींश्च नास्तिकानशुचीन्नरान्।
देविद्वजं गुरुं वापि यश्च निन्दति सर्वदा ॥२३॥
सगुणा निर्गुणा वापि यस्य भक्तिः प्रतिष्ठिता।
अनुग्राह्यः स गुरुणा नित्यभूतार्थकारिणा ॥२४॥