साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २०१
यथानिर्दिष्ट स्थान से मृत्तिका लाकर शोधन करे। यथाक्रमेण याम्य (दक्षिण), माहेन्द्र (पूर्व), वारुण्य (पश्चिम) तथा कौवेर (उत्तर) दिशा की मिट्टी लाई जाती है॥७॥
माहेन्द्रं विजयो नित्यमर्थप्राप्तिश्च निश्चला।
शत्रूणां निधने चैव मित्रलाभश्च दक्षिणे ॥८॥
प्रतिपक्षोन्नतिर्व्याधिर्नियमेन जलाधिपे।
सम्यक् शान्तिः सुतावाप्तिः प्रजा मोदति विज्वरा ॥९॥
पूर्व दिशा की मिट्टी से सर्वदा विजय एवं निश्चल अर्थ मिलता है। दक्षिण की मिट्टी से शत्रु का विनाश तथा मित्रप्राप्ति कही गयी है। पश्चिम की मृत्तिका से प्रतिपक्ष की उन्नति तथा नियत व्याधि होती है। उत्तर की लाई मिट्टी शान्ति एवं पुत्रलाभ प्रदान करती है तथा प्रजा नीरोग होती है॥८-९॥
आग्नेयः शोषकः प्रोक्तो नैर्ऋत्यः पापसंकरः।
मारुतश्चाप्यवस्थानमैशान्यं ज्ञानलम्भकम् ॥१०॥
तेषां निरूपितं स्थानं यथाकामं समाहिताः।
दृष्टदोषपरिक्रान्तां भूमिं कुर्वन्ति साधकाः ॥११॥
आग्नेय (पूर्व-दक्षिण कोण) की मिट्टी को शोषक कहते हैं। नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) की मिट्टी पापयुक्त, मारुन्न (वायुकोण——पश्चिम-उत्तर) की मिट्टी अवस्थिति-कारक तथा ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) की मिट्टी प्राणों का नाश करती है। समाहित साधक इनका दोष जानकर यथाभिलषित स्थान का निरूपण करते हैं॥१०-११॥
रत्निमालमधः खातं समन्तात् पञ्चविंशकम्।
कृत्वा तु सुसमं देशं प्रागुदक्प्लवनं शुभम् ॥१२॥
प्राग्वंशं तत्र कुर्वीत ब्रह्मवृक्षमयं शुभम्।
परितः कारयेद् भूमिं सुसमां शोभनां तथा ॥१३॥
नीचे रत्निमात्र गढ़ा करे। चारो ओर २५ हाथ विस्तृत भूमि को समतल करे। पूर्व की ओर जल की निम्न गति होना अर्थात् पूर्व की ओर कुछ ढाल होना शुभ होता है। वहाँ पर ब्रह्मवृक्ष का शुभ प्राग्वंश-स्थापन करे। चारो ओर से भूमि को शोभन तथा समान बनाये॥१२-१३॥
उदुम्बरमयं कृत्वा लाङ्गलं सुसमाहितः।
सौवर्णमुखसंयुक्तं तेन भूमिं तु वाहयेत् ॥१४॥
ततः समतलां कृत्वा सुधालेपेन लेपयेत्।
सेचयेत् पञ्चगव्येन रक्तचन्दनवारिणा ॥१५॥