साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(दीक्षामण्डलम्)
बृहद्बल उवाच
समासव्यासयोगेन पुराणमिदमव्ययम्।
श्रावितोऽहं त्वया ब्रह्मन् गुरो निःश्रेयसं परम् ॥१॥
तथापि संशयोऽस्माकं नाद्यापि विगतः प्रभो।
साम्बं प्रति महाभाग तन्मे ब्रूहि महात्मनम् ॥२॥
कथं स दीक्षितस्तेन भास्करेण महात्मना।
साम्बः परमधर्मात्मा तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥३॥
महाराज बृहद्व्रज पूछते हैं—हे ब्रह्मन्! गुरुदेव! संक्षेप में तथा विस्तृत रूप से अव्यय, परम निःश्रेयसकर इस पुराण को आपने मुझे सुनाया। हे प्रभो! तब भी अब तक मेरा संशय उच्छिन्न नहीं हो सका है। हे महाभाग्यवान् महामुनि! महात्मा सूर्यदेव ने परम धार्मिक साम्ब को कैसे दीक्षित किया, इसे कृपया कहिये॥१-३॥
वशिष्ठ उवाच
एकाग्रं मानसं कृत्वा वृत्तिं सम्यग् व्यवस्थिताम्।
श्रद्धया परया युक्तः शृणु यत्तु समीहितम् ॥४॥
पुराणस्योत्तरं राजन् यदुक्तं भास्करेण तु।
तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि दीक्षामण्डलमुत्तमम् ॥५॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—एकाग्र मन से चित्तवृत्ति को संयत करके परम श्रद्धायुक्त होकर सुनो, जो युक्तियुक्त है। हे राजन्! सूर्यदेव ने इस पुराण के उत्तर भाग में जो उत्तम दीक्षामण्डल कहा है, वह मैं तुमसे कहता हूँ॥४-५॥
साम्बं प्रति महाबाहो यदुक्तं भास्करेण तु।
तन्महामण्डलं नाम तत्त्वं मन्त्रविभूषितम् ॥६॥
हे महाबाहो! सूर्यदेव ने साम्ब से जिस महामण्डल का वर्णन किया था, वह मन्त्रयुक्त तत्त्वविशेष है॥६॥
यथाव्यवस्थितात् स्थानाद् भूमिं निष्क्रम्य शोधयेत्।
याम्यं माहेन्द्रं वारुण्यं कौबेरं च यथाक्रमम् ॥७॥