साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः १९९
छत्र, ध्वजा, वितान, पताका, चामर सूर्य को श्रद्धापूर्वक प्रदान करने से अभीष्ट गति प्राप्त होती है॥५५॥
यच्च द्रव्यं नरो भक्त्या आदित्याय प्रयच्छति।
तत्तस्माच्छतसाहस्रमुत्पादयति भास्करः॥५६॥
जो व्यक्ति भक्ति के साथ सूर्य के निमित्त दान करता है, सूर्यदेव उसका शत सहस्र गुणा प्रदान करते हैं॥५६॥
मानसं वाचिकं चापि कायिकं यच्च दुष्कृतम्।
सर्वं सूर्यप्रणामेन तत्क्षणादेव नश्यति॥५७॥
मानसिक, वाचिक तथा कायिक जो कुछ दुष्कृत्य है, वह सूर्यकृपा से, सूर्य को प्रणाम करने से तत्क्षण नष्ट हो जाता है॥५७॥
एकाहेनापि यद् भानोः पूजया प्राप्यते फलम्।
यथोक्तदक्षिणैरिष्टैर्न तु क्रतुशतैरपि॥५८॥
इति श्रीसाम्बपुराणे देवपूजादिफलवर्णनं नाम अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः
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यथोक्त दक्षिणा तथा यज्ञ के साथ एक दिन की ही सूर्यपूजा से जो फल मिलता है, शत-शत यज्ञ से भी वह नहीं मिलता॥५८॥
श्री साम्बपुराणोक्त देवपूजादि-फलवर्णन नामक अष्टत्रिंश अध्याय समाप्त
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