साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 208, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें१९८ || श्रीसाम्बपुराणम्
अयने ह्युत्तरे सूर्यमथवा दक्षिणायने ।
पूजयित्वा विशेषेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥४८॥
उत्तरायण अथवा दक्षिणायन में सूर्य की विशेष पूजा करने से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है॥४८॥
विषुवेषूपरागेषु षडशीतिमुखेषु च ।
पूजयित्वा रविं भक्त्या नात्मानं शोचयेत् पुनः ॥४९॥
एवं वेलासु सर्वासु त्ववेलासु च मानवः ।
भक्त्या पूजयते योऽर्कं सोऽर्कलोके महीयते ॥५०॥
विषुव के समय, सूर्य-चन्द्र ग्रहण में तथा षड़शीतिमुख संक्रान्ति में मिथुन, कन्या, धनु तथा मीन राशि में सूर्य के संक्रमण काल में भक्तियुक्त हो पूजा करने पर आत्मा को शोक नहीं होता। ऐसी सभी वेला में अथवा वेला न होने पर भी जो भक्ति से सूर्यदेव का पूजन करता है, वह सूर्यलोक में पूजित होता है॥४९-५०॥
कृसरैः पायसापूपैः पललोन्मिश्रितौदनैः ।
बलिं दत्वा तु सूर्याय सर्वकाममवाप्नुयात् ॥५१॥
कृसर (तिलमिश्रित अन्न अथवा द्विदलान्न, खिचड़ी), पायस, अपूप, मांसमिश्रित अन्न सूर्य को प्रदान करने से सभी कामनायें सिद्ध हो जाती हैं॥५१॥
घृतेन तर्पणं कृत्वा कार्यसिद्धिं लभेन्नरः ।
क्षीरेण तर्पणं कृत्वा मनस्तापैर्न युज्यते ॥५२॥
सूर्य को घृतदान देने पर लोक में कार्यसिद्धि होती है। क्षीर से तर्पण करने पर व्यक्ति मनःसंताप से पीड़ित नहीं होता॥५२॥
दध्ना तु तर्पणं कृत्वा कार्यसिद्धिं लभेन्नरः ।
मधुना तर्पणं कृत्वा सिद्धिं संवत्सराल्लभेत ॥५३॥
दही से तर्पण करने पर कार्यसिद्धि होती है। मधु से तर्पण द्वारा एक वत्सर में सिद्धि प्राप्त होती है॥५३॥
स्नानार्थमाहरेद्यस्तु जलं भानोः समाहितः ।
तीर्थाद्वा शुचि वार्यन्यत् स याति परमां गतिम् ॥५४॥
सूर्य के स्नानार्थ जो समाहित चित्त से तीर्थ से अथवा अन्य स्थान से पवित्र जल लाता है, वह परम गति प्राप्त करता है॥५४॥
छत्रं ध्वजां वितानं च पताकां चाम्बराणि च ।
श्रद्धया भानवे दत्वा गतिमिष्टामवाप्नुयात् ॥५५॥