भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः १९७

रक्तचन्दनमिश्रैस्तु रक्तपुष्पैः शुचिर्नरः।
उदयेऽर्घ्यं सदा दत्त्वा सिद्धिं संवत्सराल्लभेत् ॥४१॥

जो नर पवित्र होकर रक्त-चन्दन मिले रक्तपुष्प से सूर्योदय काल में अर्घ्य देते हैं, उन्हें १ वर्ष में सिद्धि मिल जाती है॥४१॥

उदयात् परिवर्त्तस्तु यावदस्तमनस्थितः।
जपन्नभिमुखः किंचिन्मन्त्रं स्तोत्रमथापि वा।
आदित्यस्य व्रतं यत्तन्महापातकनाशनम् ॥४२॥

सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त अथवा पर्यन्त सूर्य की ओर मुख करके जो मन्त्र-जप करते हैं अथवा किसी स्तोत्र का पाठ करते हैं अथवा इसी प्रकार आदित्य व्रत भी करते हैं, उनका महापातक नष्ट हो जाता है॥४२॥

अर्घेण सहितां चैव सवत्सां गां प्रदापयेत्।
उदये श्रद्धया युक्तः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥४३॥
सुवर्णधेन्वनड्वाहं वसुधां वस्त्रसंयुताम्।
अर्घ्यं प्रदाय लभते सदा जन्मानुगं फलम् ॥४४॥

उदयकाल में श्रद्धायुक्त होकर जो अर्घ्य के साथ सवत्सा गौ दान करता है, वह सभी पाप से मुक्त हो जाता है। स्वर्ण, धेनु, वृष, भूमि तथा वस्त्र के साथ अर्घ्य देकर इनका दान करने से व्यक्ति सर्वपापविनिर्मुक्त हो जाता है॥४३-४४॥

अग्नौ तोये चान्तरिक्षे शुचौ भूम्यां तथैव च।
प्रतिमायां तथा पिण्ड्यां दद्यादर्घ्यं प्रयत्नतः ॥४५॥

अग्नि में, जल में, अन्तरिक्ष अथवा पवित्र भूमि में किंवा प्रतिमा तथा पिण्डी में सयत्न अर्घ्यदान दिया जाय॥४५॥

नापसव्यं न वा सव्यं दद्यादभिमुखः सदा।
तत्क्षणात् सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः।
सघृतं गुग्गुलं दग्ध्वा रवेर्भक्तिसमन्वितः ॥४६॥

बाँयीं ओर अथवा दाँयीं ओर नहीं, अपितु सर्वदा सूर्य के सम्मुख मुख करके घृत के साथ गुग्गुलु जलाये। यह कार्य भक्ति के साथ करना चाहिये। इससे वह सभी पापों से तत्क्षण मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥४६॥

श्रीवासकतुरुष्काणां देवदारोस्तथैव च।
कर्पूरागुरुधूपानां दातारः स्वर्गगामिनः ॥४७॥

बिल्व (वासक) अडूसा, तुरुष्क तथा देवदारु, कपूर, अगरु तथा धूप जो देव को प्रदान करते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं॥४७॥