साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 206, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें१९६ श्रीसाम्बपुराणम्
दीपदानान्नरो नित्यं ज्ञानदीपेन दीप्यते। स च बुद्धीन्द्रियैश्चापि न कदाचिद्विमुह्यति ॥३३॥
जो घृत द्वारा अथवा तिलतैल से प्रदीप (सूर्य हेतु) जलाते हैं, वे दीर्घायु होते हैं। एवं सुन्दर शरीर तथा चक्षु प्राप्त करते हैं। इस दीपदान के फलस्वरूप वे इस लोक में ज्ञानालोक से दीप्त हो जाते हैं। वे कभी भी बुद्धि इन्द्रिय से वियुक्त नहीं होते ॥३३॥
तिलाः पवित्रं परमं तिलदानमनुत्तमम् ॥३४॥ अग्निकार्ये च दीपे च महापातकनाशनम्। दीपं ददाति यो नित्यं देवस्यायतनेषु च ॥३५॥ चतुष्पथेषु रथ्यासु रूपवान् सुभगो भवेत्।
तिल पवित्र वस्तु है। तिलदान उत्तम दान है। अग्नि कार्य तथा दीपदान से महापातक नष्ट हो जाता है। जो नित्य देवालय में दीप प्रदान करते है अथवा चतुष्पथ या चत्वर पर दीपदान करते हैं, वे रूपयुक्त तथा सौभाग्य-युक्त होते हैं॥३४-३५॥
हविषा प्रथमो कल्पो द्वितीयस्त्वौषधीरसः ॥३६॥ वसामेदोऽस्थिनिर्यासैर्न तु देयः कथञ्चन। भवत्यूर्ध्वगतिर्दीपो न कदाचिदधोगतिः ॥३७॥
घृत द्वारा दीप प्रदान करना उत्तम कल्प है। दूसरा है—तिल-तैलादि से दीप प्रदान करना। लेकिन कभी भी वसा-मेद तथा अस्थि का प्रदीप नहीं जलाना चाहिये। दीप की ज्वाला ऊर्ध्व होनी चाहिये, कभी भी अधोमुखी नहीं होनी चाहिये ॥३६-३७॥
दानं दीपस्य चाप्येवं न तिर्यग्गतिमाप्नुयात्। ज्वलन्तं तु सदा दीपं न हरेन्नापि नाशयेत् ॥३८॥
ऐसे दीपदान से कभी भी तिर्यक् गति का लाभ नहीं होता। कभी भी प्रज्वलित दीप का हरण नहीं करना चाहिये, न ही उसे बुझाना चाहिये ॥३८॥
दीपहर्त्ता भवेदन्धस्तमोगतिरसुप्रभः। दीपदाता स्वर्गलोके दीपमालेव राजते ॥३९॥
दीपहरणकर्त्ता अन्धा होता है और तमोगति प्राप्त करके अनुज्ज्वल हो जाता है। दीप-दाता स्वर्गलोक में दीपमाला के समान विराजित हो जाता है॥३९॥
यः सदाऽर्चयते सूर्यं चन्दनागुरुकुङ्कुमैः। स पूज्यते नरो नित्यं धनेन यशसा श्रिया ॥४०॥
चन्दन, अगुरु एवं कुमकुम से जो सदा सूर्य का पूजन करता है, वह पुरुष प्रतिदिन धन, यश एवं लक्ष्मी से पूजित होता है॥४०॥