भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः १९५

अर्कसंपुटं संयोज्य मुदकप्रसृतिं पिवेत् ॥२४॥
क्रमवृद्ध्या चतुर्विंशदेकैकं जपयेत् पुनः।
द्वाभ्यां संवत्सराभ्यां तु समाप्तनियमो भवेत् ॥२५॥
सर्वकामप्रदा ह्येषा प्रसिद्धार्कस्य सप्तमी।

जो अर्क सम्पुट करके जल पीते हैं तथा एक-एक करके क्रमशः बढ़ाते हुये २४ बार तक पान करते हैं, उनकी सभी कामना सूर्यसप्तमी को पूर्ण हो जाती है॥२४-२५॥

माघशुक्लस्य सप्तम्यां सदाऽऽदित्यदिनं भवेत् ॥२६॥
सप्तमी विजया नाम तत्र दत्तं महत् फलम्।
स्नानं दानं जपो होम उपवासस्तथैव च ॥२७॥
सर्व-विजय-सप्तम्यां महापातकनाशनम् ॥२८॥

माघ मास की शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को सूर्य का दिन कहा जाता है। इसका नाम है—विजया। इस दिन स्नान, दान, जप, होम तथा उपासना का महान् फल मिलता है। यह सप्तमी सभी पापों का नाश करने वाली होती है॥२६-२८॥

ये त्वादित्यदिने प्राप्ते श्राद्धं कुर्वन्ति मानवाः।
जपन्ति च महाश्वेतां ते लभन्ते यथेप्सितम् ॥२९॥
येषां धर्मक्रियाः सर्वाः सदैवोद्दिश्य भास्करम्।
न कुले जायते तेषां दरिद्रो व्याधितोऽपि वा ॥३०॥

आदित्य के दिन (रविवार को) जो मानव श्राद्ध करता है तथा महाश्वेता का जप करता है, वह अभिलषित वस्तु का लाभ करता है। सूर्य के उद्देश्य से (सूर्य के लिये) जो सर्वदा धर्मक्रिया करता है, उसके वंश में कोई दरिद्र अथवा रोगी होकर जन्म नहीं लेता॥२९-३०॥

श्वेतया रक्तया वापि पिबन्ति मृत्तिकयापि वा।
उपलेपनकर्त्ता च चिन्तितं लभते फलम् ॥३१॥

श्वेत-रक्त अथवा पीली मिट्टी का शरीर में लेप करते हैं, वे वांछित फल प्राप्त करते हैं॥३१॥

चित्रभानुर्विचित्रैश्च कुसुमैस्तु सुगन्धिभिः।
पूजयेत् सोपवासो यः स कामानीप्सितांल्लभेतू ॥३२॥

उपवास रखकर विचित्र सुगन्धि पुष्प द्वारा जो सूर्य का पूजन करते हैं, वे ईप्सित कामना प्राप्त करते हैं॥३२॥

घृतेन दीपं प्रज्वाल्य तिलतैलेन वा पुनः।
दीर्घायुर्वपुषा युक्तश्चक्षुषा न च हीयते।