साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः १९५
अर्कसंपुटं संयोज्य मुदकप्रसृतिं पिवेत् ॥२४॥
क्रमवृद्ध्या चतुर्विंशदेकैकं जपयेत् पुनः।
द्वाभ्यां संवत्सराभ्यां तु समाप्तनियमो भवेत् ॥२५॥
सर्वकामप्रदा ह्येषा प्रसिद्धार्कस्य सप्तमी।
जो अर्क सम्पुट करके जल पीते हैं तथा एक-एक करके क्रमशः बढ़ाते हुये २४ बार तक पान करते हैं, उनकी सभी कामना सूर्यसप्तमी को पूर्ण हो जाती है॥२४-२५॥
माघशुक्लस्य सप्तम्यां सदाऽऽदित्यदिनं भवेत् ॥२६॥
सप्तमी विजया नाम तत्र दत्तं महत् फलम्।
स्नानं दानं जपो होम उपवासस्तथैव च ॥२७॥
सर्व-विजय-सप्तम्यां महापातकनाशनम् ॥२८॥
माघ मास की शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को सूर्य का दिन कहा जाता है। इसका नाम है—विजया। इस दिन स्नान, दान, जप, होम तथा उपासना का महान् फल मिलता है। यह सप्तमी सभी पापों का नाश करने वाली होती है॥२६-२८॥
ये त्वादित्यदिने प्राप्ते श्राद्धं कुर्वन्ति मानवाः।
जपन्ति च महाश्वेतां ते लभन्ते यथेप्सितम् ॥२९॥
येषां धर्मक्रियाः सर्वाः सदैवोद्दिश्य भास्करम्।
न कुले जायते तेषां दरिद्रो व्याधितोऽपि वा ॥३०॥
आदित्य के दिन (रविवार को) जो मानव श्राद्ध करता है तथा महाश्वेता का जप करता है, वह अभिलषित वस्तु का लाभ करता है। सूर्य के उद्देश्य से (सूर्य के लिये) जो सर्वदा धर्मक्रिया करता है, उसके वंश में कोई दरिद्र अथवा रोगी होकर जन्म नहीं लेता॥२९-३०॥
श्वेतया रक्तया वापि पिबन्ति मृत्तिकयापि वा।
उपलेपनकर्त्ता च चिन्तितं लभते फलम् ॥३१॥
श्वेत-रक्त अथवा पीली मिट्टी का शरीर में लेप करते हैं, वे वांछित फल प्राप्त करते हैं॥३१॥
चित्रभानुर्विचित्रैश्च कुसुमैस्तु सुगन्धिभिः।
पूजयेत् सोपवासो यः स कामानीप्सितांल्लभेतू ॥३२॥
उपवास रखकर विचित्र सुगन्धि पुष्प द्वारा जो सूर्य का पूजन करते हैं, वे ईप्सित कामना प्राप्त करते हैं॥३२॥
घृतेन दीपं प्रज्वाल्य तिलतैलेन वा पुनः।
दीर्घायुर्वपुषा युक्तश्चक्षुषा न च हीयते।
१९६ श्रीसाम्बपुराणम्
दीपदानान्नरो नित्यं ज्ञानदीपेन दीप्यते। स च बुद्धीन्द्रियैश्चापि न कदाचिद्विमुह्यति ॥३३॥
जो घृत द्वारा अथवा तिलतैल से प्रदीप (सूर्य हेतु) जलाते हैं, वे दीर्घायु होते हैं। एवं सुन्दर शरीर तथा चक्षु प्राप्त करते हैं। इस दीपदान के फलस्वरूप वे इस लोक में ज्ञानालोक से दीप्त हो जाते हैं। वे कभी भी बुद्धि इन्द्रिय से वियुक्त नहीं होते ॥३३॥
तिलाः पवित्रं परमं तिलदानमनुत्तमम् ॥३४॥ अग्निकार्ये च दीपे च महापातकनाशनम्। दीपं ददाति यो नित्यं देवस्यायतनेषु च ॥३५॥ चतुष्पथेषु रथ्यासु रूपवान् सुभगो भवेत्।
तिल पवित्र वस्तु है। तिलदान उत्तम दान है। अग्नि कार्य तथा दीपदान से महापातक नष्ट हो जाता है। जो नित्य देवालय में दीप प्रदान करते है अथवा चतुष्पथ या चत्वर पर दीपदान करते हैं, वे रूपयुक्त तथा सौभाग्य-युक्त होते हैं॥३४-३५॥
हविषा प्रथमो कल्पो द्वितीयस्त्वौषधीरसः ॥३६॥ वसामेदोऽस्थिनिर्यासैर्न तु देयः कथञ्चन। भवत्यूर्ध्वगतिर्दीपो न कदाचिदधोगतिः ॥३७॥
घृत द्वारा दीप प्रदान करना उत्तम कल्प है। दूसरा है—तिल-तैलादि से दीप प्रदान करना। लेकिन कभी भी वसा-मेद तथा अस्थि का प्रदीप नहीं जलाना चाहिये। दीप की ज्वाला ऊर्ध्व होनी चाहिये, कभी भी अधोमुखी नहीं होनी चाहिये ॥३६-३७॥
दानं दीपस्य चाप्येवं न तिर्यग्गतिमाप्नुयात्। ज्वलन्तं तु सदा दीपं न हरेन्नापि नाशयेत् ॥३८॥
ऐसे दीपदान से कभी भी तिर्यक् गति का लाभ नहीं होता। कभी भी प्रज्वलित दीप का हरण नहीं करना चाहिये, न ही उसे बुझाना चाहिये ॥३८॥
दीपहर्त्ता भवेदन्धस्तमोगतिरसुप्रभः। दीपदाता स्वर्गलोके दीपमालेव राजते ॥३९॥
दीपहरणकर्त्ता अन्धा होता है और तमोगति प्राप्त करके अनुज्ज्वल हो जाता है। दीप-दाता स्वर्गलोक में दीपमाला के समान विराजित हो जाता है॥३९॥
यः सदाऽर्चयते सूर्यं चन्दनागुरुकुङ्कुमैः। स पूज्यते नरो नित्यं धनेन यशसा श्रिया ॥४०॥
चन्दन, अगुरु एवं कुमकुम से जो सदा सूर्य का पूजन करता है, वह पुरुष प्रतिदिन धन, यश एवं लक्ष्मी से पूजित होता है॥४०॥
अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः १९७
रक्तचन्दनमिश्रैस्तु रक्तपुष्पैः शुचिर्नरः।
उदयेऽर्घ्यं सदा दत्त्वा सिद्धिं संवत्सराल्लभेत् ॥४१॥
जो नर पवित्र होकर रक्त-चन्दन मिले रक्तपुष्प से सूर्योदय काल में अर्घ्य देते हैं, उन्हें १ वर्ष में सिद्धि मिल जाती है॥४१॥
उदयात् परिवर्त्तस्तु यावदस्तमनस्थितः।
जपन्नभिमुखः किंचिन्मन्त्रं स्तोत्रमथापि वा।
आदित्यस्य व्रतं यत्तन्महापातकनाशनम् ॥४२॥
सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त अथवा पर्यन्त सूर्य की ओर मुख करके जो मन्त्र-जप करते हैं अथवा किसी स्तोत्र का पाठ करते हैं अथवा इसी प्रकार आदित्य व्रत भी करते हैं, उनका महापातक नष्ट हो जाता है॥४२॥
अर्घेण सहितां चैव सवत्सां गां प्रदापयेत्।
उदये श्रद्धया युक्तः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥४३॥
सुवर्णधेन्वनड्वाहं वसुधां वस्त्रसंयुताम्।
अर्घ्यं प्रदाय लभते सदा जन्मानुगं फलम् ॥४४॥
उदयकाल में श्रद्धायुक्त होकर जो अर्घ्य के साथ सवत्सा गौ दान करता है, वह सभी पाप से मुक्त हो जाता है। स्वर्ण, धेनु, वृष, भूमि तथा वस्त्र के साथ अर्घ्य देकर इनका दान करने से व्यक्ति सर्वपापविनिर्मुक्त हो जाता है॥४३-४४॥
अग्नौ तोये चान्तरिक्षे शुचौ भूम्यां तथैव च।
प्रतिमायां तथा पिण्ड्यां दद्यादर्घ्यं प्रयत्नतः ॥४५॥
अग्नि में, जल में, अन्तरिक्ष अथवा पवित्र भूमि में किंवा प्रतिमा तथा पिण्डी में सयत्न अर्घ्यदान दिया जाय॥४५॥
नापसव्यं न वा सव्यं दद्यादभिमुखः सदा।
तत्क्षणात् सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः।
सघृतं गुग्गुलं दग्ध्वा रवेर्भक्तिसमन्वितः ॥४६॥
बाँयीं ओर अथवा दाँयीं ओर नहीं, अपितु सर्वदा सूर्य के सम्मुख मुख करके घृत के साथ गुग्गुलु जलाये। यह कार्य भक्ति के साथ करना चाहिये। इससे वह सभी पापों से तत्क्षण मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥४६॥
श्रीवासकतुरुष्काणां देवदारोस्तथैव च।
कर्पूरागुरुधूपानां दातारः स्वर्गगामिनः ॥४७॥
बिल्व (वासक) अडूसा, तुरुष्क तथा देवदारु, कपूर, अगरु तथा धूप जो देव को प्रदान करते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं॥४७॥
१९८ || श्रीसाम्बपुराणम्
अयने ह्युत्तरे सूर्यमथवा दक्षिणायने ।
पूजयित्वा विशेषेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥४८॥
उत्तरायण अथवा दक्षिणायन में सूर्य की विशेष पूजा करने से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है॥४८॥
विषुवेषूपरागेषु षडशीतिमुखेषु च ।
पूजयित्वा रविं भक्त्या नात्मानं शोचयेत् पुनः ॥४९॥
एवं वेलासु सर्वासु त्ववेलासु च मानवः ।
भक्त्या पूजयते योऽर्कं सोऽर्कलोके महीयते ॥५०॥
विषुव के समय, सूर्य-चन्द्र ग्रहण में तथा षड़शीतिमुख संक्रान्ति में मिथुन, कन्या, धनु तथा मीन राशि में सूर्य के संक्रमण काल में भक्तियुक्त हो पूजा करने पर आत्मा को शोक नहीं होता। ऐसी सभी वेला में अथवा वेला न होने पर भी जो भक्ति से सूर्यदेव का पूजन करता है, वह सूर्यलोक में पूजित होता है॥४९-५०॥
कृसरैः पायसापूपैः पललोन्मिश्रितौदनैः ।
बलिं दत्वा तु सूर्याय सर्वकाममवाप्नुयात् ॥५१॥
कृसर (तिलमिश्रित अन्न अथवा द्विदलान्न, खिचड़ी), पायस, अपूप, मांसमिश्रित अन्न सूर्य को प्रदान करने से सभी कामनायें सिद्ध हो जाती हैं॥५१॥
घृतेन तर्पणं कृत्वा कार्यसिद्धिं लभेन्नरः ।
क्षीरेण तर्पणं कृत्वा मनस्तापैर्न युज्यते ॥५२॥
सूर्य को घृतदान देने पर लोक में कार्यसिद्धि होती है। क्षीर से तर्पण करने पर व्यक्ति मनःसंताप से पीड़ित नहीं होता॥५२॥
दध्ना तु तर्पणं कृत्वा कार्यसिद्धिं लभेन्नरः ।
मधुना तर्पणं कृत्वा सिद्धिं संवत्सराल्लभेत ॥५३॥
दही से तर्पण करने पर कार्यसिद्धि होती है। मधु से तर्पण द्वारा एक वत्सर में सिद्धि प्राप्त होती है॥५३॥
स्नानार्थमाहरेद्यस्तु जलं भानोः समाहितः ।
तीर्थाद्वा शुचि वार्यन्यत् स याति परमां गतिम् ॥५४॥
सूर्य के स्नानार्थ जो समाहित चित्त से तीर्थ से अथवा अन्य स्थान से पवित्र जल लाता है, वह परम गति प्राप्त करता है॥५४॥
छत्रं ध्वजां वितानं च पताकां चाम्बराणि च ।
श्रद्धया भानवे दत्वा गतिमिष्टामवाप्नुयात् ॥५५॥
अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः १९९
छत्र, ध्वजा, वितान, पताका, चामर सूर्य को श्रद्धापूर्वक प्रदान करने से अभीष्ट गति प्राप्त होती है॥५५॥
यच्च द्रव्यं नरो भक्त्या आदित्याय प्रयच्छति।
तत्तस्माच्छतसाहस्रमुत्पादयति भास्करः॥५६॥
जो व्यक्ति भक्ति के साथ सूर्य के निमित्त दान करता है, सूर्यदेव उसका शत सहस्र गुणा प्रदान करते हैं॥५६॥
मानसं वाचिकं चापि कायिकं यच्च दुष्कृतम्।
सर्वं सूर्यप्रणामेन तत्क्षणादेव नश्यति॥५७॥
मानसिक, वाचिक तथा कायिक जो कुछ दुष्कृत्य है, वह सूर्यकृपा से, सूर्य को प्रणाम करने से तत्क्षण नष्ट हो जाता है॥५७॥
एकाहेनापि यद् भानोः पूजया प्राप्यते फलम्।
यथोक्तदक्षिणैरिष्टैर्न तु क्रतुशतैरपि॥५८॥
इति श्रीसाम्बपुराणे देवपूजादिफलवर्णनं नाम अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः
•
यथोक्त दक्षिणा तथा यज्ञ के साथ एक दिन की ही सूर्यपूजा से जो फल मिलता है, शत-शत यज्ञ से भी वह नहीं मिलता॥५८॥
श्री साम्बपुराणोक्त देवपूजादि-फलवर्णन नामक अष्टत्रिंश अध्याय समाप्त
•
एकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(दीक्षामण्डलम्)
बृहद्बल उवाच
समासव्यासयोगेन पुराणमिदमव्ययम्।
श्रावितोऽहं त्वया ब्रह्मन् गुरो निःश्रेयसं परम् ॥१॥
तथापि संशयोऽस्माकं नाद्यापि विगतः प्रभो।
साम्बं प्रति महाभाग तन्मे ब्रूहि महात्मनम् ॥२॥
कथं स दीक्षितस्तेन भास्करेण महात्मना।
साम्बः परमधर्मात्मा तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥३॥
महाराज बृहद्व्रज पूछते हैं—हे ब्रह्मन्! गुरुदेव! संक्षेप में तथा विस्तृत रूप से अव्यय, परम निःश्रेयसकर इस पुराण को आपने मुझे सुनाया। हे प्रभो! तब भी अब तक मेरा संशय उच्छिन्न नहीं हो सका है। हे महाभाग्यवान् महामुनि! महात्मा सूर्यदेव ने परम धार्मिक साम्ब को कैसे दीक्षित किया, इसे कृपया कहिये॥१-३॥
वशिष्ठ उवाच
एकाग्रं मानसं कृत्वा वृत्तिं सम्यग् व्यवस्थिताम्।
श्रद्धया परया युक्तः शृणु यत्तु समीहितम् ॥४॥
पुराणस्योत्तरं राजन् यदुक्तं भास्करेण तु।
तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि दीक्षामण्डलमुत्तमम् ॥५॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—एकाग्र मन से चित्तवृत्ति को संयत करके परम श्रद्धायुक्त होकर सुनो, जो युक्तियुक्त है। हे राजन्! सूर्यदेव ने इस पुराण के उत्तर भाग में जो उत्तम दीक्षामण्डल कहा है, वह मैं तुमसे कहता हूँ॥४-५॥
साम्बं प्रति महाबाहो यदुक्तं भास्करेण तु।
तन्महामण्डलं नाम तत्त्वं मन्त्रविभूषितम् ॥६॥
हे महाबाहो! सूर्यदेव ने साम्ब से जिस महामण्डल का वर्णन किया था, वह मन्त्रयुक्त तत्त्वविशेष है॥६॥
यथाव्यवस्थितात् स्थानाद् भूमिं निष्क्रम्य शोधयेत्।
याम्यं माहेन्द्रं वारुण्यं कौबेरं च यथाक्रमम् ॥७॥
एकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २०१
यथानिर्दिष्ट स्थान से मृत्तिका लाकर शोधन करे। यथाक्रमेण याम्य (दक्षिण), माहेन्द्र (पूर्व), वारुण्य (पश्चिम) तथा कौवेर (उत्तर) दिशा की मिट्टी लाई जाती है॥७॥
माहेन्द्रं विजयो नित्यमर्थप्राप्तिश्च निश्चला।
शत्रूणां निधने चैव मित्रलाभश्च दक्षिणे ॥८॥
प्रतिपक्षोन्नतिर्व्याधिर्नियमेन जलाधिपे।
सम्यक् शान्तिः सुतावाप्तिः प्रजा मोदति विज्वरा ॥९॥
पूर्व दिशा की मिट्टी से सर्वदा विजय एवं निश्चल अर्थ मिलता है। दक्षिण की मिट्टी से शत्रु का विनाश तथा मित्रप्राप्ति कही गयी है। पश्चिम की मृत्तिका से प्रतिपक्ष की उन्नति तथा नियत व्याधि होती है। उत्तर की लाई मिट्टी शान्ति एवं पुत्रलाभ प्रदान करती है तथा प्रजा नीरोग होती है॥८-९॥
आग्नेयः शोषकः प्रोक्तो नैर्ऋत्यः पापसंकरः।
मारुतश्चाप्यवस्थानमैशान्यं ज्ञानलम्भकम् ॥१०॥
तेषां निरूपितं स्थानं यथाकामं समाहिताः।
दृष्टदोषपरिक्रान्तां भूमिं कुर्वन्ति साधकाः ॥११॥
आग्नेय (पूर्व-दक्षिण कोण) की मिट्टी को शोषक कहते हैं। नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) की मिट्टी पापयुक्त, मारुन्न (वायुकोण——पश्चिम-उत्तर) की मिट्टी अवस्थिति-कारक तथा ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) की मिट्टी प्राणों का नाश करती है। समाहित साधक इनका दोष जानकर यथाभिलषित स्थान का निरूपण करते हैं॥१०-११॥
रत्निमालमधः खातं समन्तात् पञ्चविंशकम्।
कृत्वा तु सुसमं देशं प्रागुदक्प्लवनं शुभम् ॥१२॥
प्राग्वंशं तत्र कुर्वीत ब्रह्मवृक्षमयं शुभम्।
परितः कारयेद् भूमिं सुसमां शोभनां तथा ॥१३॥
नीचे रत्निमात्र गढ़ा करे। चारो ओर २५ हाथ विस्तृत भूमि को समतल करे। पूर्व की ओर जल की निम्न गति होना अर्थात् पूर्व की ओर कुछ ढाल होना शुभ होता है। वहाँ पर ब्रह्मवृक्ष का शुभ प्राग्वंश-स्थापन करे। चारो ओर से भूमि को शोभन तथा समान बनाये॥१२-१३॥
उदुम्बरमयं कृत्वा लाङ्गलं सुसमाहितः।
सौवर्णमुखसंयुक्तं तेन भूमिं तु वाहयेत् ॥१४॥
ततः समतलां कृत्वा सुधालेपेन लेपयेत्।
सेचयेत् पञ्चगव्येन रक्तचन्दनवारिणा ॥१५॥
२०२ || श्रीसाम्बपुराणम्
गूलर की लकड़ी में स्वर्ण का फाल लगाकर उससे भूमि को खोदना एवं समतल बनाना चाहिये। तदनन्तर तलदेश को समान करके भूमि को सुधालेप से लिप्त करे तथा पञ्चगव्य एवं रक्त चन्दन तथा जल से उस स्थान को सिञ्चित करे।।१४-१५।।
चन्दनेन पुनर्लेपो रक्तेन तु विधीयते।
यथा न स्फुटते भूमिस्तथा कुर्यात् प्रयत्नतः ॥१६॥
स्फुटिता दूषिता भूमिः क्वचिन्निम्ना दरिद्रता।
उच्छ्रिता छिद्रिता चैव सर्वापदभिशंसिनी ॥१७॥
एवं समाहितां कृत्वा मनोह्लादकरीं शुभाम्।
आप्तैः शुद्धैश्च शुचिभी रक्षां कुर्वीत यत्नतः ॥१८॥
रक्तचन्दन से पुनः लेपन करना चाहिये, जिससे भूमि स्फुटित न हो अर्थात् मिट्टी दिखलाई न पड़े; क्योंकि भूमि स्फुटित होना दोष है। भूमि का कहीं-कहीं नीची होना दरिद्रता-प्रदायक होता है। ऊँची तथा छिद्रयुक्त होने से अनेक आपत्तियाँ आती हैं। इस प्रकार मन को आनन्दप्रदायक शुभ भूमि का निर्माण करे और शुद्ध-पवित्र आप्त जन उसकी रक्षा करें।।१६-१८।।
तस्याश्चोत्तरपार्श्वेन कुर्याद् गुरुगृहं महत्।
सम्भारसम्भृतः शिष्यो गुरोरात्मानमर्पयेत् ॥१९॥
विशुद्धकुलसम्भूतं वेदवेदाङ्गपारगम्।
आत्मविद्यारतं दान्तं देवद्विजपरायणम् ॥२०॥
अप्रव्रजितधर्माणं त्रयीमार्गव्यवस्थितम्।
मानवं धर्मवेत्तारमग्रजन्मा त्रिकालिकम्।
गुरुमेवंविधं विद्याच्छिष्यं वक्ष्याम्पतः परम् ॥२१॥
तदनन्तर उत्तर की ओर गुरु के लिये बृहद् गृह निर्मित कराये। समस्त सम्भार के साथ गुरु के निकट शिष्य स्वयं को अर्पित करे। विशुद्ध वंश वाले, वेद-वेदाङ्ग में पारङ्गत, आत्मविद्यारत, विजितेन्द्रिय, देव-ब्राह्मण की सेवा में तत्पर, गृहस्थ, वेदविहित पथ से धर्मानुष्ठान करने वाले, धर्मवेत्ता, त्रिकालज्ञ ब्राह्मण को गुरु बनाना चाहिये। अब शिष्य का वर्णन करता हूँ।।१९-२१।।
गुरोर्गुणसमः शिष्यस्तस्य कार्ये व्यवस्थितः।
चोदितो भक्तितत्त्वेन धर्मप्राप्तिफलं प्रति ॥२२॥
वर्जयेद्धीनजातींश्च नास्तिकानशुचीन्नरान्।
देविद्वजं गुरुं वापि यश्च निन्दति सर्वदा ॥२३॥
सगुणा निर्गुणा वापि यस्य भक्तिः प्रतिष्ठिता।
अनुग्राह्यः स गुरुणा नित्यभूतार्थकारिणा ॥२४॥
एकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २०३
महामण्डलवेत्ता तु ह्याचार्यो यत्र तिष्ठति।
तत्र तिष्ठति देवोऽसौ लोकनाथो जगत्पतिः॥२५॥
शिष्य को भी गुरु के समान ही गुणयुक्त होना चाहिये। वह गुरु के कार्य में सर्वदा नियुक्त हो तथा धर्म-प्राप्तिरूप फल-लाभार्थ भक्ति से प्रेरित हो। हीन जाति, नास्तिक, अशुचि व्यक्ति का (गुरु को) त्याग कर देना चाहिये। साथ ही उनका भी त्याग कर देना चाहिये, जो सर्वदा देवता, द्विज एवं गुरुदेव की निन्दा में लगे रहते हैं। जिनकी सगुण अथवा निर्गुण में भक्ति है, जो प्राणियों का हित चाहने वाला है, उसी का ग्रहण गुरु को शिष्यरूप में करना चाहिये। महामण्डलों को जानने वाला आचार्य जहाँ पर रहता है, वहाँ पर संसार के स्वामी भगवान् सूर्य का वास होता है॥२२-२५॥
तत्र पुण्या जनपदाः प्रजाश्च निरुपद्रवाः।
नारायणाधिपस्तत्र कृतकृत्यो महीपतिः॥२६॥
जो पुण्यदेश हो, जहाँ की प्रजा उपद्रवशून्य हो तथा जनगण के पालक शासक (जहाँ के) कृतज्ञ हों, वहाँ स्वयं नारायण का वास होता है॥२६॥
ज्ञात्वा तु परमं ज्ञानं सर्वदीक्षासमन्वितः।
सर्ववेदपवित्रश्च गृह्यशास्त्रात्मकः सदा॥२७॥
अविकल्पं विकल्पं च योगं सर्वार्थसाधकम्।
कन्याकर्तितसूत्रेण अर्कतूलमयेन वा॥२८॥
वर्त्तयेत् त्रिवृतं सूत्रं ग्रन्थिकेशविवर्जितम्।
देवस्य त्वेतिमन्त्रेण त्रिरादित्यं न वा पुनः।
प्रोक्षयेत् त्रिवृतं सूत्रं ततः कर्म समाचरेत्॥२९॥
परमज्ञान लाभ करके, सभी दीक्षा से युक्त होकर गृह्यशास्त्रानुसार (समस्त प्रयोजन-निष्पादक) अविकल्प अथवा विकल्प योगानुष्ठान करे। कन्या द्वारा काते गये सूत्र अथवा मदार की रुई के सूत्र से, गांठ तथा केशरहित त्रिवृत (तीन दण्डी—नौ गुण) सूत्र का यज्ञोपवीत धारण कराये। ‘देवस्य त्वा’ इत्यादि मन्त्र से अथवा ‘त्रिरादित्यं न वा’ इत्यादि मन्त्र से त्रिवृत सूत्र (यज्ञोपवीत) का प्रोक्षण करके तब कर्मारम्भ करे॥२७-२९॥
हेमपात्रं प्रगृह्यादौ रौप्यमौदुम्बरं क्रमात्।
अर्घ्यं दत्वा दिगीशेभ्यो यथापूर्वं क्रमेण तु॥३०॥
मध्ये नारायणाख्याय सूर्याय परमात्मने।
तेजोबुद्बुदरूपाय अर्घ्यपात्रं निवेदयेत्॥३१॥
पहले स्वर्णपात्र ग्रहण करे। तदनन्तर चाँदी तथा गूलर की लकड़ी से निर्मित पात्र लेकर क्रमशः (यथापूर्व क्रमेण) दिग्देवतागण को अर्घ्य देना चाहिये। मध्य में नारायण नामक तेजःप्रकाशरूप सूर्य के लिये अर्घ्यपात्र निवेदित करे॥३०-३१॥
२०४ श्रीसाम्बपुराणम्
धूपमेवं क्रमेणैव बलिं चापि सुसंस्कृतम्।
तिलांस्त्रिमधुरोपेतान् जुहुयात् कर्मसिद्धये ॥३२॥
इसी प्रकार से धूप तथा सुसंस्कृत बलि भी प्रदान करे। तदनन्तर घृत-मधु तथा शर्करायुक्त तिल की कर्मसिद्धि हेतु आहुति प्रदान करे॥३२॥
ॐ इन्द्राय परमात्मने स्वाहा। ॐ अग्नये शुचिष्मते ठः ठः। ॐ यमाय धर्मात्मने ठः ठः। ॐ निर्ऋतये कालात्मने ठः ठः। ॐ वरुणाय सलिलात्मने ठः ठः। ॐ वायवे स्पर्शात्मने ठः ठः। ॐ सोमायामृतात्मने ठः ठः। ॐ ईशानाय ज्ञानात्मने ठः ठः। ॐ पराय विद्महे तेजोरूपाय धीमहि तन्नस्तेजः प्रचोदयात् ॥३३॥
महामन्त्रमिमं पुण्यं महामण्डलसम्भवम्।
स्मरन्ति ये सदा राजंस्ते भवन्ति हितद्विजाः ॥३४॥
आहुति का मन्त्र मूल में दिया गया है। परमात्मा इन्द्र-हेतु, शुचिष्मान अग्नि-हेतु, धर्मरूप यम-हेतु, कालात्मा निर्ऋति-हेतु, जलस्वरूप वरुण-हेतु, स्पर्शात्मक वायु, अमृतात्मा सोम तथा ज्ञानस्वरूप ईशान के हेतु आहुति प्रदान करनी चाहिये। तदनन्तर मन्त्र कहे 'हम परतत्त्व को जानते हैं, तेजोरूप का ध्यान करते हैं, वह परमात्मा तेजस्वरूप सूर्यदेव हमारी शक्ति (तेज) का प्रेरण करे'। राजन्! महामण्डल से उद्भूत एवं अतिशय पवित्र यह महा-मन्त्र सदा स्मरण करना चाहिये। यह ब्राह्मणों के लिये हितकारक होता है॥३३-३४॥
शरीरमण्डलस्येदं महामन्त्रं प्रकीर्तितम्।
तस्मान्महत्त्वमेवोक्तं मण्डलस्य पुरातनैः ॥३५॥
कर्णिकाऽष्टाङ्गुला प्रोक्ता केसरं तत्समं स्मृतम्।
कर्णिका केशरैस्तुल्या यमस्य परिकीर्तिता ॥३६॥
शरीरमण्डल का यह महामन्त्र कहा गया है। इसीलिये प्राचीन लोग इसे मण्डल में महत्तम (सर्व बृहन्मण्डल) कहते हैं। मण्डल का मध्यभाग (कर्णिका) आठ अंगुल का हो। केशर भी उसी के समान हो। पद्म की कर्णिका केशर के माप की ही होगी। ऐसा कहा गया है॥३५-३६॥
पद्मतुल्यः स्मृतो द्वारः प्रकोष्ठो द्वारतुल्यकः।
वीथिः प्रकोष्ठकैस्तुल्या स्थितिरेषा प्रकीर्तिता ॥३७॥
सितं रक्तं तथा पीतं हरितं कृष्णमेव च।
आलिखेन्मण्डलं मन्त्री गायत्र्या परिमन्त्रितम् ॥३८॥
अष्टहस्तं समन्तात्तु बाह्यतो मण्डलाकृतिः।
तदर्द्धेन पुनर्मध्यं वापीतुल्यं पुरं लिखेत् ॥३९॥
एकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २०५
पद्म के ही तुल्य द्वार होगा। प्रकोष्ठ भी द्वार के तुल्य माप का होगा। पथ (वीथी) भी प्रकोष्ठ के समान होगा। यह स्थिति कही गयी है। मन्त्र जपने वाला साधक शुभ्र, रक्त, पीत तथा हरित कृष्ण वर्ण मण्डल को गायत्री से शोधित करके अंकित करे। यह मण्डल चारो ओर से आठ हाथ होगा। बाहर मण्डलाकृति होगी। उसमें उससे आधे माप की वापी (पुष्करिणी) के समान पुर का अंकन करे।।३७-३९।।
तन्मध्ये तु लिखेत्पद्मं पत्रद्वादशभूषितम्।
मूर्त्तिद्वादशकं तेषु निवेशेत्तु विधानवित् ॥४०॥
चतुरस्रं पुनः कृत्वा बाह्यतो स्रगमालिखेत्।
वज्रं शक्तिं च दण्डं च खड्गं पाशं तथैव च॥
ध्वजं गदां त्रिशूलं च यथारूपं व्यवस्थितम् ॥४१॥
उसमें (मध्य में) द्वादश पत्रभूषित पद्म का अङ्कन करना चाहिये। विज्ञानज्ञ व्यक्ति उसमें (द्वादश पद्म में) द्वादश मूर्त्ति स्थापित करे। अब चतुरस्र बनाकर बाहर स्रक् (माला) का अङ्कन करे। वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वजा, गदा तथा त्रिशूल को यथायथ रूप से स्थापित करे।।४०-४१।।
परो विश्वात्मकः शम्भुर्नमस्कारो वषट्कृतः।
सम्बुद्धो विश्वकर्त्ता च निष्कलो ज्ञानसम्भवः ॥४२॥
मानोन्मानो महासत्त्वो द्वादशैते प्रकीर्तिताः।
आधारभूताः सर्वस्य जगन्नाथो व्यवस्थितः ॥४३॥
पर, विश्वात्मक, शम्भु, नमस्कार, वषट्कृत, सम्बुद्ध, विश्वकर्त्ता, निष्कल, ज्ञानसम्भव, मान, उन्मान, महासत्त्व—ये बारह समस्त जगत् के आधाररूप तथा जगत् के पालकरूप से कीर्त्तित हैं।।४२-४३।।
अभीषवे इदं विष्णुधामच्छन्दोमनोज्योतिश्चत्वारि शृंगास्ते प्राणाय अग्निमीडे ईषे त्वोज्जे॑ अग्न आयाहि शन्नो देवी कृत्तिवासा ब्रह्मयज्ञानामिति यद्देवा द्वादश-मूर्तयः॥४४॥
मध्ये मूर्त्तिर्महाकाली कल्पिका च प्रबोधिनी।
नीलाम्बरा घनान्तस्था अमृता च प्रकीर्तिता ॥४५॥
'अभीषवे इदं विष्णुधाम' इत्यादि (मूल में अङ्कित) मन्त्रात्मक द्वादश मूर्त्ति देवता हैं। मध्य में महाकाली, कल्पिका, प्रबोधिनी!, नीलाम्बरा, घनान्तस्था तथा अमृता का स्थान कहा गया है।।४४-४५।।
शुक्लो जयन्तो विजयो नैकवर्णो हुताशनः।
हुतार्चिर्व्यापकश्चैव अश्वाः सप्त प्रकीर्तिताः ॥४६॥
२०६ श्रीसाम्बपुराणम्
शुक्ल, जयन्त, विजय, नैककर्ण, हुताशन, हुतार्चि एवं व्यापक—ये सात अश्व कहे गये हैं।।४६।।
ॐ हारिण्यै स्वाहा इडा। ॐ विहारिण्यै स्वाहा सुषुम्ना। ॐ आनन्दायै स्वाहा विदुः। ॐ भाविन्यै स्वाहा संज्ञा। ॐ मोहिन्यै स्वाहा प्रमर्दिनी। ॐ ज्वालिन्यै स्वाहा प्रकर्षिणी। ॐ तापिन्यै स्वाहा महाकाली। ॐ कल्पायै स्वाहा कल्पिका। ॐ क्रुद्धायै स्वाहा प्रबोधिनी। ॐ मृत्यवे स्वाहा नीलाम्बरा। ॐ हरात्यै स्वाहा घना। ॐ द्रुमाय स्वाहा शुक्ला। ॐ शुद्धाय स्वाहा जयन्तः। ॐ महाघोरणाय स्वाहा विजयः। ॐ चित्राय स्वाहा अनेकवर्णः। ॐ रुद्राय स्वाहा हुताशनः। ॐ संवलिताय स्वाहा हुतार्चिः। ॐ महाशिखाय स्वाहा व्यापकः। ॐ ज्वलित-चण्डलोचनाय स्वाहा अरुणोरथस्थाने।
एवमालिख्य विधिवन्मण्डलं शास्त्रपूर्वकम्।
पूर्वप्रतिष्ठिते वह्नौ संस्कारं कारयेत्पुनः ॥४७॥
शास्त्र के अनुसार विधिपूर्वक मण्डल बनाकर ‘ॐ हारिण्यै स्वाहा’ इत्यादि मन्त्रों से आहुति देकर पूर्व में प्रतिष्ठित की गई अग्नि का पुनः संस्कार करे।।४७।।
परिसमूहनं तत्र गायत्र्या चोपलेपनम्।
शन्नो भवन्तु वनस्पदित्युल्लेखनविन्दुना ॥४८॥
अभ्युक्षणं विन्दुना।
आद्याक्षरसंयुक्तेन अग्नेः स्थापनमुत्तमम्।
तत्त्वमध्ये प्रणवो भवेत्।
कृत्वा वह्निक्रियामेतां यथावदनुपूर्वशः।
सुयजेत् क्षीरसंयुक्तं चरूद्वादशसंज्ञितम्।
संवृत्यार्घ्यं तु गायत्र्या होमयेज्जातवेदसम् ॥४९॥
वहाँ परिसमूहन एवं गायत्री द्वारा उपलेपन करे। ‘शन्नो भवन्तु वनस्पद्’ इत्यादि मन्त्र से बिन्दु-लेखन करना चाहिये। बिन्दु द्वारा अभ्युक्षण करना चाहिये। आद्य अक्षर संयुक्त करके अग्नि का स्थापन करना चाहिये। तत्त्व में प्रणवयुक्त करे। यथायथ आनुपूर्वीक वह्निक्रिया इस प्रकार से करके १२ क्षीर संयुक्त चरु से यज्ञ करना चाहिये। अर्घ्य संस्कृत करके गायत्री द्वारा अग्नि में हवन करना चाहिये।।४८-४९।।
यथोद्दिष्टेन मन्त्रेण सूत्रान्नति जुहुयात्।
होमान्ते प्राशनं कृत्वा गुरुदेवं प्रपूजयेत्।
पूजयित्वा विशेषेण विधानोक्तेन कर्मणा ॥५०॥
एकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २०७
निर्दिष्ट मन्त्र द्वारा सूत्रों की आहुति देनी चाहिये। होम के अन्त में आचमन करके गुरु तथा देवताओं का विशेष विधान से पूजन करना चाहिये॥५०॥
सह तेनैव विधिना प्राग्वंशे प्राग्समाहिते।
प्रभाते कृतपुण्याहौ द्वौ तौ व्रतपरायणौ ॥५१॥
मण्डलालिखनं कुर्याद्यत्पूर्वमभिचोदितम्।
वितानध्वजमालाभिः कलशैश्च विभूषितम् ॥५२॥
प्रभात काल में दो व्रतपरायण व्यक्ति पूर्व में कथित विधि के अनुसार पूजन करें। पूर्वोक्त नियम के अनुसार मण्डल बनाकर वितान (चंदोवा), ध्वजा, माला तथा कलशों से उसे भूषित करे॥५१-५२॥
दर्पणैर्विमलैश्चैव छत्रैर्वस्त्रावगुण्ठितैः।
योगैर्नानाविधैर्मध्यैर्महाबल्युपहारकैः ॥५३॥
पूजां कुर्वीत नियतो गुरु-मन्त्र-परायणः।
कृत्वा कुशोत्तरां वेदीं चतुरङ्गुलमुच्छ्रिताम् ॥५४॥
निर्मल दर्पण, छत्र, वस्त्र द्वारा अवगुण्ठित एवं नाना योग द्वारा मध्य में महाबलि का उपहार प्रदान करके गुरुमन्त्र-परायण व्यक्ति को नित्य पूजन करना चाहिये॥५३-५४॥
पश्चिमे मण्डलद्वारे शिष्यं तत्राधिवासयेत्।
द्रुपदा प्रथमं प्रोक्तमिदमापो द्वितीयकम् ॥५४॥
कर्तृभिर्देवताभ्यश्च भास्करार्चिस्त्रिभिः परैः।
कृत्वाऽभिषेकं मन्त्री तु पुनः कृत्वा प्रदक्षिणाम् ॥५६॥
प्रविष्टे मण्डलं शिष्ये तत्त्वन्यासं प्रकल्पयेत् ॥५७॥
चार अंगुल ऊँची कुशोत्तरा वेदी तैयार करके पश्चिम मण्डल द्वार पर शिष्य को बैठाकर प्रथमतः 'द्रुपदा' इत्यादि मन्त्र से, द्वितीयतः 'इदमापः' इत्यादि मन्त्र से तथा 'कर्तृभिः देवताभ्यश्च भास्करार्चि' मन्त्र से (तृतीय मन्त्र से) अभिषेक करना चाहिये। तदनन्तर पूर्वोक्त मन्त्र से पुनः प्रदक्षिणा करके शिष्यमण्डल में प्रवेश करके नीचे लिखे मन्त्र से तत्त्वन्यास करना चाहिये॥५५-५७॥
ॐ अं शिरः, ॐ आं हृदयम्, ॐ इं नाभ्याम्, ॐ ईं ॐ चक्षुषि, ॐ ईं ॐ नासिकायाम्, ॐ फट् ॐ कर्णयोः, ॐ हुं ॐ आस्ये, ॐ क्षैं ॐ जिह्वायाम्, ॐ क्षां ॐ शिखायाम्, ॐ क्षं ॐ सर्वगात्रेषु।
न्यासमेवं विधिं कृत्वा दापयेदष्टपुष्पिकाम्।
'ॐ भूतात्मने गोपतये स्वाहा पद्ममध्ये ॐ खद्योताय स्वाहा पूर्वतः, ॐ ससत्याय स्वाहा दक्षिणतः, ॐ अमृताय स्वाहा पश्चिमतः, ॐ वक्षस्तमाय
| २०८ | श्रीसाम्बपुराणम् |
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स्वाहा उत्तरतः, ॐ अव्यक्ताय स्वाहा आग्नेय्याम्, ॐ क्षयाय स्वाहा नैर्ऋत्याम्, ॐ अक्षयाय स्वाहा वायव्याम्, ॐ संघातिने स्वाहा ऐशान्याम्, अष्टमूर्त्तीनां चोदितैर्मन्त्रै रश्मिभिस्समुदाहृतम्। एवं कृतमन्त्रन्यासमभिषिक्तं दीक्षायोगेन योजयेत्, ॐ पावकाय शुचये स्वाहा यज्ञोपवीतम्, ॐ धर्मराजाय स्वाहा दण्डकाष्ठम्, ॐ दुरुक्तदुरितपरिघानि स्वाहा मेखलायज्ञोपवीतम्'। काल्यमाविकत्वचोद्भवम् दण्डकाष्ठं पालाशमौदुम्बरं खादिरं च दण्डम्। मेखला दर्भमौञ्जी मौर्वी विल्वजा। 'ॐ सरस्वत्यै स्वाहा, ॐ वेदवत्यै स्वाहा, ॐ चर्यावित्यै स्वाहा, ॐ सत्यवत्यै स्वाहा, ॐ ध्रुवावत्यै स्वाहा, ॐ स्वभावत्यै स्वाहा, ॐ प्रतिष्ठावत्यै स्वाहा—एभिर्मन्त्रैः समिद्धेऽग्नौ उपविश्य घृताहुतयः पाकयज्ञपात्रेण सप्ताहुतयः पूर्वोक्तमन्त्रेण जुहुयात्। एवं कृत्वा विधानं तु शिष्यं गुरुरग्निकुण्डाद्भस्मादाय पञ्चभिः स्थानैर्मूर्ध्ना- लभेत्। 'ॐ चित्राय स्वाहा पूर्वमध्ये, ॐ खमविष्णवे स्वाहा पूर्वतः, ॐ हिंसाय ठः ठः' दक्षिणतः। ॐ विदिताय ठः ठः पश्चिमतः। 'ॐ लिखने ठः ठः उत्तरतः। 'ॐ सम्भूतिने' सर्वगात्रेषु भस्मावकिरेत्। ॐ सोमवत्यै स्वाहा, ॐ सुभगे ठः ठः, ॐ प्रेतवति ठः ठः, ॐ वाजिनवति ठः ठः। कृतदीक्षाविधानस्य एता आहुतयो दिग्विदितासु होतव्याः होमान्ते गुरवे गृहसमेतं सर्वोपकरणं दद्यात् तथा प्रार्थतं चेति॥५८॥
इति साम्बपुराणे दीक्षामण्डलवर्णनं नामैकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
मस्तक पर—ॐ अं शिरः। हृदय में—आं हृदयम्। नाभि में—ॐ ईं नाभ्याम्। चक्षु में—ॐ ईं ॐ चक्षुषि। नासिकाद्वय में—ॐ ईं ॐ नासिकाभ्याम्। कर्णयुगल में—ॐ फट् ॐ कर्णयोः। मुख में—ॐ हूं ॐ आस्ये। जिह्वा पर—ॐ क्षं ॐ जिह्वायाम्। शिखा पर—ॐ क्षां ॐ शिखायाम्। समस्त शरीर में—ॐ क्षं ॐ सर्वगात्रेषु—
इस प्रकार से न्यास करके निम्न मन्त्र से आठ पुष्प प्रदान करे—
पद्ममध्य में—ॐ भूतात्मने गोपतये स्वाहा। पूर्व में—ॐ खद्योताय स्वाहा। दक्षिण में—ॐ ससत्याय स्वाहा। पश्चिम में—ॐ अमृताय स्वाहा। उत्तर में—ॐ वक्षस्तमाय स्वाहा। आग्नेय कोण में—ॐ अव्यक्ताय स्वाहा। नैर्ऋत्य कोण में—ॐ क्षयाय स्वाहा। वायुकोण में—ॐ अक्षयाय स्वाहा। ईशान कोण में—ॐ सङ्घातिने स्वाहा।
उक्त मन्त्ररूप रश्मि द्वारा अष्टमूर्ति का वर्णन किया गया। इस प्रकार से मन्त्रन्यास करके अभिषिक्त शिष्य को नीचे अंकित मन्त्र द्वारा दीक्षा से युक्त करे।
यज्ञोपवीत—ॐ पावकाय स्वाहा।
दण्डकाष्ठ—ॐ धर्मराजाय स्वाहा।
एकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २०९
मेखला यज्ञोपवीत—ॐ दुरुक्तदुरितपरिधानि स्वाहा।
काल्य आविक् त्वक् से बनाया गया दण्डकाष्ठ होगा। पलाश, गूलर तथा खदिर से बना दण्ड होगा। मेखला होगी दूब एवं मूँज से निर्मित तथा मौर्वी होगी बिल्व काष्ठ-निर्मित। अग्नि प्रज्वलित करके घृताहुति देकर पाकयज्ञपात्र द्वारा नीचे लिखे मन्त्र से सात आहुति से होम करे—
ॐ सरस्वत्यै स्वाहा, ॐ वेदवत्यै स्वाहा, ॐ चर्यावत्यै स्वाहा, ॐ सत्यवत्यै स्वाहा, ॐ ध्रुवावत्यै स्वाहा, ॐ स्वभावत्यै स्वाहा, ॐ प्रतिष्ठावत्यै स्वाहा।
इस प्रकार विधान करके गुरु अग्निकुण्ड से भस्म लेकर उसे शिष्य के मस्तक पर नीचे लिखे मन्त्र से पाँच बार लगाये—
पूर्वमध्य में—ॐ चित्राय स्वाहा।
पूर्व में—ॐ खमविष्णवे स्वाहा।
दक्षिण में—ॐ हिंसाय ठः ठः।
पश्चिम में—ॐ विदिताय ठः ठः।
उत्तर दिशा में—ॐ लिखने ठः ठः।
'ॐ सम्भूतिने' इत्यादि मन्त्र से समस्त शरीर में (सभी अंगों में) भस्म लगाये।
दीक्षाविधान के अनन्तर इन मन्त्रों से आहुति देनी चाहिये—ॐ सोमवत्यै स्वाहा, ॐ सुभगे ठः ठः, ॐ प्रेतवति ठः ठः, ॐ वाजिनवति ठः ठः (सबके अन्त में स्वाहा लगाये)। होम के अन्त में गृह के साथ समस्त उपकरण श्रीगुरुदेव को प्रदान करे तथा ऐसी ही प्रार्थना करे।।५८।।
श्रीसाम्बपुराणोक्त दीक्षाविधान नामक उनचालीसवाँ अध्याय समाप्त
चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(यज्ञस्थानविधिः)
अतः परं प्रवक्ष्यामि यज्ञस्थानविधिं शुभम्।
अधियज्ञोऽस्ति यज्ञानां यज्ञाङ्गो यज्ञसम्भवः ॥१॥
यज्ञमूर्त्तिं नमस्कृत्य त्वां यज्ञेन यजामहे।
अब शुद्ध यज्ञस्थान-विधि का वर्णन किया जाता है। हे सूर्यदेव! आप यज्ञों में अधियज्ञ हैं। आप यज्ञ के अंगस्वरूप हैं। यज्ञ से उद्भूत हैं। आप यज्ञमूर्त्ति को नमस्कार करके यज्ञ द्वारा ही आपका पूजन करता हूँ॥१॥
ज्वालामालाकुलप्रख्ये सर्वकारणसम्भवे ॥२॥
विग्रहे देवदेवस्य वर्णस्थानं निबोध मे।
हृदये सिद्धिराद्यस्तु रवेः सकलनिष्कला ॥३॥
कर्मनिर्वाणगावेतावाकारौ परिकीर्त्तितौ।
ईईविद्येशयोगीशौ नाभेस्तस्य बभूवतुः ॥४॥
ज्वालामाला द्वारा विस्तृत, समस्त कारणों के उत्पत्तिस्वरूप देवदेव सूर्य के विग्रह का वर्ण एवं स्थान कहता हूँ, सुनो। रवि हृदय में आद्य अक्षर (अ) सकल तथा निष्कल सिद्धियों का कारण तथा सिद्धिरूप है। 'आ' कर्म का निर्वाण प्रापक कहा गया है। सूर्य की नाभि में 'इ ई' वर्णद्वय अवस्थान करते हैं। ये विद्या तथा योग के ईश्वर हैं॥२-४॥
उ ऊ भावादिबीजे तु ऊरूभ्यां चास्य धीमतः।
ऋ ॠ ऋतं च सत्यं च पद्भ्यां तस्य बभूवतुः ॥५॥
धर्मादिवर्गविपुलं लृकारं ग्रहणार्णवम्।
ए ऐ देवस्य मातरौ श्लोके अं अः मद्द्योममूर्त्ति द्वौ ॥६॥
धीमान् सूर्य के ऊरुद्वय में समस्त प्राणियों के आदि बीजरूप 'उ ऊ' वर्णद्वय अवस्थान करते हैं। उनके चरणयुगल में रहते हैं—ऋ तथा ॠ, जो ऋत तथा सत्य के प्रतीक हैं। 'लृ'कार है—धर्मादि वर्णसकल तथा 'ओ' है—समुद्रस्वरूप (ग्रहणार्णव समुद्ररूप)। 'ए ऐ' सूर्य के प्रसिद्ध मातृद्वय हैं। 'अं तथा अः' ये दोनों महत् आकाश मूर्त्तिरूप हैं॥५-६॥
कखौ स्यन्दनमित्युक्तं गघौ मण्डलकीर्त्तितौ।
ङकारः सारथिः साक्षाद् देवदेवस्य धीमतः ॥७॥
चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २११
चकारे पितरो नित्यं छकारे देवदानवाः।
जकारे च जगत् सर्वं झकारे बन्धनक्रिया ॥८८॥
'क' तथा 'ख' वर्ण को रवि का प्रसिद्ध रथ कहा गया है। 'ग' तथा 'घ' को उनका मण्डल कहते हैं। धीमान् देवदेव सूर्य का साक्षात् सारथी है—'ङ'। 'च'कार में नित्यपितृगण तथा 'छ'कार में देवता तथा दानवगण अवस्थान करते हैं। 'ज'कार में समस्त जगत् है तथा 'झ'कार में बन्धन क्रिया अवस्थित है॥७-८॥
अस्य पातनसम्भूर्तिर्जंकारः परिहासयेत्।
टकारस्त्रोटयेत्पाशाट्ठकारस्तिर्यगो भवेत् ॥८९॥
डकारोऽनुग्रहस्थानं ढकारः क्रोध उच्यते।
णकारा बालखिल्याद्या भृग्वाद्याश्च महातपाः ॥९०॥
इनके पातन तथा ऐश्वर्य को लेकर 'ञ'कार परिहास करता है। 'ट'कार पाप-बन्धन को छिन्न करता है और 'ठ'कार वक्रगामी है। 'ड'कार है—अनुग्रह-स्थान तथा 'ढ'कार को क्रोध कहते हैं। 'ण'कार हैं—बालखिल्य तथा भृगु-प्रभृति महातपा मुनिगण॥९-१०॥
तकारे सिद्ध-गन्धर्वास्थकारे पुण्यसम्भवः।
दमः प्रोक्तो दकारेण धकारो ब्रह्मगोचरः ॥९१॥
नकारे सर्वतोऽनन्तः पकारोऽक्षरसम्भवः।
फकारस्त्वशुभं हन्ति बकारेण शुभं स्मृतम् ॥९२॥
'त'कार में सिद्ध तथा गन्धर्वगण वास करते हैं। 'थ'कार पुण्यस्थान है। 'द'कार द्वारा दम को कहा गया है और 'ध'कार ब्रह्मप्रापक है। 'न'कार अनन्तस्वरूप है। 'प'कार अक्षर- उत्पत्ति का स्थान है। 'फ'कार अशुभ को नष्ट करता है एवं 'ब'कार को शुभदायक कहते हैं॥११-१२॥
भकारो भेदकः प्रोक्तो मकारः सरितांपतिः।
यकारो ग्रहनक्षत्रा रेफः प्रोक्तः प्रदाहकः ॥९३॥
लकारो विषयास्वादी वकारस्तु भवोद्भवः।
शकारः शोषयेद् दोषान् षकारो बीजमुच्यते ॥९४॥
'भ'कार को भेदक कहते हैं तथा 'म'कार को नदियों का पति 'सागर' कहा गया है। 'य'कार ग्रह-नक्षत्र है तथा 'र' को प्रदाहक कहते हैं। 'ल'कार विषय का आस्वादनकारी है। 'व'कार उत्पत्ति का कारणरूप है। 'श'कार सब दोषों का शोषण करता है और 'ष'कार बीजरूप कहा गया है॥१३-१४॥
सकारे छन्दसां जन्म हकारे ब्रह्मशाश्वतम्।
क्षत्रं परमनिर्वाणमभयं कामदं प्रभुम् ॥९५॥
२१२ श्रीसाम्बपुराणम्
यत्तदेकाक्षरं ज्ञानं शान्तं सम्यक् प्रतिष्ठितम्।
क्षकारेण क्षयं याति जगत्स्थावरजंगमम्॥१६॥
अक्षयश्चाव्ययश्चैव क्षकारः परिपठ्यते।
शुभा ह्येते तव प्रोक्ता बीजाः सूर्यस्य नित्यशः॥१७॥
'स'कार को छन्दों का जन्मस्थल तथा 'ह'कार को शाश्वत ब्रह्म का अवस्थान कहा गया है। उसे क्षत्र अर्थात् विपद से उद्धारकारक, परमनिर्वाण स्थान, अभय, कामप्रद तथा प्रभु कहा गया है। उनका एकाक्षर ज्ञान शान्त तथा सम्यक् प्रतिष्ठित है। 'क्ष' द्वारा समस्त स्थावर-जंगम जगत् विनष्ट हो जाता है। सूर्य के इन समस्त बीजसमूहों को तुमसे कहा॥१५-१७॥
यथाकर्मणि योगेन वर्णा ह्येते प्रकीर्तिताः।
तथा फलप्रदाः सर्वे भवन्ति पर्युपासिताः॥१८॥
जिस प्रकार के कर्म के योग से इन वर्णों को कहा गया (अर्थात् जिस वर्ण का जो कर्म बताया गया), उसी प्रकार यथायथ रूप से उपासित होने पर ये सभी फलदायक हो जाते हैं॥१८॥
बृहद्वल उवाच
यदुक्तं वर्णजातीनां फलं कर्मसमुद्भवम्।
तन्न शक्यं समाख्यातुं चित्तेनास्थिरवृत्तिना॥१९॥
दीक्षावसाने साम्बस्य यदुक्तं भास्करेण तु।
तन्मे ब्रूहि महामन्त्रं सर्वकामार्थसाधनम्॥२०॥
महाराज बृहद्वल जिज्ञासा करते हैं—वर्णसमूह के कर्मसमुद्भूत जिस फल की बात आपने कही, उसे मैं अस्थिर वृत्ति चित्त के द्वारा धारण नहीं कर पा रहा हूँ। दीक्षा के अन्त में सूर्यदेव ने साम्ब से जो कहा था, उस सर्वकामार्थसाधक महामन्त्र का वर्णन कृपा करके मुझसे करें॥१९-२०॥
वशिष्ठ उवाच
शृणु राजन् महामन्त्रं भूतसंहारकारकम्।
उत्पत्तिव्यञ्जकं चैव जगतश्च पराभवम्॥२१॥
भास्करं कर्णिकाभूतं व्यापकं पूर्वपश्चिमे।
याम्ये सौम्ये तदा विष्णुर्ब्रह्मा ऐशान नैर्ऋते॥२२॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—महाराज! महामन्त्र की बात सुनिये। यह प्राणियों का संहार-कारक, उत्पत्ति, प्रकाशक तथा जगत् के पराभवरूप है। पद्म की कर्णिका के स्थल में भास्कर पूर्व तथा पश्चिम में व्याप्त रहते हैं। दक्षिण तथा उत्तर में विष्णु रहते हैं। ऐसे ही ईशान तथा नैर्ऋत्य कोण में ब्रह्मा रहते हैं॥२१-२२॥
चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २१३
रुद्रमाग्नेयवायव्ये पद्म एतत् प्रकीर्तितम्।
चमत्कारकरं मन्त्रमुद्धतं साम्बकारणम्॥२३॥
'ॐ अं ॐ हूं जूं दुं दूं ओं ॐ'।
एतत्तु परमं गुह्यमेतत्तु परमं पदम्।
एतत्तु परमं ज्ञानमेतत्तु परमं पदम्॥२४॥
अग्नि तथा वायुकोण में रुद्र रहते हैं। इस प्रकार पद्म का वर्णन किया गया। साम्ब के लिये कहा गया चमत्कारी महामन्त्र है—'ॐ अं ॐ हूं जूं दुं दूं ओं ॐ'। यह परम गोपनीय, परम स्थान, परम ज्ञानस्वरूप तथा श्रेष्ठ ज्ञानप्रापक है॥२३-२४॥
व्यापकाभयसंयुक्तो यदा ह्यायुःप्रदो रविः।
रुद्रयुक्तो व्याधिहरो धनदो विष्णुयोजितः॥२५॥
जब सूर्य व्यापक तथा अभययुक्त रहते हैं तब वे आयुप्रद होते हैं। जब रुद्रयुक्त होते हैं, तब व्याधि हर लेते हैं। जब विष्णु से युक्त होते हैं, तब धन प्रदान करते हैं॥२५॥
सर्वान् संसाधयेदर्थान् योजितः परमेष्ठिना।
आकाशमध्यपातालमञ्जनं रोचनादिकम्॥२६॥
रुद्रेणात्यन्तसंरुद्धः शत्रूणां भयवर्द्धनः।
विष्णुना स्तम्भयेत्क्षिप्रं वाचं वाचस्पतेरपि॥२७॥
ब्रह्मा के साथ जब युक्त हो जाते हैं, तब लोगों का समस्त प्रयोजन सिद्ध हो जाता है। आकाश, अन्तरिक्ष, पाताल, तल, सब ज्ञान उनकी किरणों से युक्त हैं। रुद्र के साथ अत्यन्त युक्त होने पर वे शत्रुओं के लिये भयकारक हो जाते हैं। विष्णु से युक्त हो जाने पर बृहस्पति तक के वाक्य का स्तम्भन कर देते हैं॥२६-२७॥
नव वर्णाः शरीरस्य भास्करास्त्रं च दुर्धरम्।
षडङ्गं सम्प्रवक्ष्यामि तन्निबोध यथाक्रमम्॥२८॥
शरीर के नौ वर्ण भास्कर के दुर्धर अस्त्र-स्वरूप हैं। अब षडङ्ग कहता हूँ, उसे यथाक्रमेण सुनो॥२८॥
ॐ दूं हूं हृदयाय नमः। ॐ दूं क्षूं ॐ आं शिरसि। ॐ ऊं हूं आं क्षूं हूं डं ॐ शिखायाम्। ॐ ओं क्षूं ॐ कवचाय हुम्। ॐ हूं ॐ क्षूं नेत्रे।
ॐ क्षूं नेत्रं ब्रह्मरुद्रौ विष्णुरुद्रस्तथैव च।
हृदयं देवदेवस्य भास्करस्य जगत्पतेः॥२९॥
षडङ्ग मन्त्र इस प्रकार है। हृदय—ॐ दूं हूं हृदयाय नमः। मस्तक—ॐ दूं क्षूं ॐ आं शिरसि। शिखा—ॐ ऊं हूं आं क्षूं हूं डं ॐ शिखायां। कवच—ॐ ओं क्षूं ॐ
२१४ श्रीसाम्बपुराणम्
कवचाय हुम्। नेत्र—ॐ हूं ॐ क्षूं नेत्रे। इसे ब्रह्मरुद्र तथा विष्णुरुद्र कहा गया है। यह देवाधिदेव भास्कर का हृदय है॥२९॥
स्वयम्भूव्यापको देवश्चान्ते चैव व्यवस्थितः।
त्रैलोक्यस्य सदा पूज्यं शिरो देवस्य कीर्तितम्॥३०॥
‘आ’ में स्थित स्वयम्भु व्यापक देव त्रैलोक्य में सदा पूज्य हैं और यह सूर्यदेव का मस्तक कहा गया है॥३०॥
रुद्रो विष्णुस्तथा ब्रह्मा रवेराद्यन्तसंस्थितः।
दुःसहां दाहनीमेतां शिखामाहुर्दिवस्पतेः॥३१॥
व्यापको विष्णुसहित आदित्यान्ते व्यवस्थितः।
कवचं सर्वविघ्नानां नाशनं देवनिर्मितम्॥३२॥
आद्यन्तेऽवस्थितः सूर्यो ब्रह्मा व्यापकमध्यतः।
सृष्टि-संहार-कर्त्ता च ह्यस्त्रमेतदुदाहृतम्॥३३॥
रुद्र, विष्णु तथा ब्रह्मा सूर्यदेव के आदि-अन्त में संस्थित हैं। दुःसह दाहनी (दग्ध करने की शक्ति) को दिवस्पति सूर्यदेव की शिखा कहा जाता है। व्यापक विष्णु के साथ आदित्य अन्त में रहते हैं। यह देवनिर्मित कवच समस्त विघ्नों का नाशक है। सूर्य आदि तथा अन्त में अवस्थित हैं। ब्रह्मा व्यापक हैं, अतः मध्य में रहते हैं। सृष्टि तथा संहार के कर्त्ता को अस्त्र कहा गया है॥३१-३३॥
नेत्रमेकं समुद्दिष्टमेतदक्षरमव्ययम्।
युगान्तानलवर्णाभमनेकादित्यवर्चसम् ॥३४॥
एवं तद्भास्करं ज्ञेयं षड्विधं संप्रकीर्तितम्।
पूर्वं द्वादशधा प्रोक्तमेतत् सूर्येण भाषितम्॥३५॥
इन्हें एकनेत्र कहा गया है, जो अव्यय अथवा अक्षर है तथा युगान्त काल में अग्नि के वर्ण के समान, अनेक सूर्यरश्मि के समान होते हैं। यह छः प्रकार के सूर्य की बातें कहीं गयीं। पहले द्वादश प्रकार के कहे गये थे। यह सब सूर्यदेव ने साम्ब से कहा था॥३४-३५॥
लक्षमेकैकमावर्त्य न चागस्त्यानुपूर्वशः।
तथैव मन्त्रे देवस्य पुनर्लक्षं समाहितः॥३६॥
तिलांस्त्रिमधुरोपेतान् होमयेज्जातवेदसम्।
भास्करास्त्रेण जुहुयात् सायं सहविषा समम्॥३७॥
सूर्य एक-एक लाख आवर्त्तन करते हैं; किन्तु अगस्त्य का अतिक्रमण नहीं करते। ऐसे समाहित होकर सूर्यदेव का एक लाख मन्त्र उच्चारण करके तिल-घृत-मधु-शर्करा