भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 218
२०८श्रीसाम्बपुराणम्

स्वाहा उत्तरतः, ॐ अव्यक्ताय स्वाहा आग्नेय्याम्, ॐ क्षयाय स्वाहा नैर्ऋत्याम्, ॐ अक्षयाय स्वाहा वायव्याम्, ॐ संघातिने स्वाहा ऐशान्याम्, अष्टमूर्त्तीनां चोदितैर्मन्त्रै रश्मिभिस्समुदाहृतम्। एवं कृतमन्त्रन्यासमभिषिक्तं दीक्षायोगेन योजयेत्, ॐ पावकाय शुचये स्वाहा यज्ञोपवीतम्, ॐ धर्मराजाय स्वाहा दण्डकाष्ठम्, ॐ दुरुक्तदुरितपरिघानि स्वाहा मेखलायज्ञोपवीतम्'। काल्यमाविकत्वचोद्भवम् दण्डकाष्ठं पालाशमौदुम्बरं खादिरं च दण्डम्। मेखला दर्भमौञ्जी मौर्वी विल्वजा। 'ॐ सरस्वत्यै स्वाहा, ॐ वेदवत्यै स्वाहा, ॐ चर्यावित्यै स्वाहा, ॐ सत्यवत्यै स्वाहा, ॐ ध्रुवावत्यै स्वाहा, ॐ स्वभावत्यै स्वाहा, ॐ प्रतिष्ठावत्यै स्वाहा—एभिर्मन्त्रैः समिद्धेऽग्नौ उपविश्य घृताहुतयः पाकयज्ञपात्रेण सप्ताहुतयः पूर्वोक्तमन्त्रेण जुहुयात्। एवं कृत्वा विधानं तु शिष्यं गुरुरग्निकुण्डाद्भस्मादाय पञ्चभिः स्थानैर्मूर्ध्ना- लभेत्। 'ॐ चित्राय स्वाहा पूर्वमध्ये, ॐ खमविष्णवे स्वाहा पूर्वतः, ॐ हिंसाय ठः ठः' दक्षिणतः। ॐ विदिताय ठः ठः पश्चिमतः। 'ॐ लिखने ठः ठः उत्तरतः। 'ॐ सम्भूतिने' सर्वगात्रेषु भस्मावकिरेत्। ॐ सोमवत्यै स्वाहा, ॐ सुभगे ठः ठः, ॐ प्रेतवति ठः ठः, ॐ वाजिनवति ठः ठः। कृतदीक्षाविधानस्य एता आहुतयो दिग्विदितासु होतव्याः होमान्ते गुरवे गृहसमेतं सर्वोपकरणं दद्यात् तथा प्रार्थतं चेति॥५८॥

इति साम्बपुराणे दीक्षामण्डलवर्णनं नामैकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः


मस्तक पर—ॐ अं शिरः। हृदय में—आं हृदयम्। नाभि में—ॐ ईं नाभ्याम्। चक्षु में—ॐ ईं ॐ चक्षुषि। नासिकाद्वय में—ॐ ईं ॐ नासिकाभ्याम्। कर्णयुगल में—ॐ फट् ॐ कर्णयोः। मुख में—ॐ हूं ॐ आस्ये। जिह्वा पर—ॐ क्षं ॐ जिह्वायाम्। शिखा पर—ॐ क्षां ॐ शिखायाम्। समस्त शरीर में—ॐ क्षं ॐ सर्वगात्रेषु—

इस प्रकार से न्यास करके निम्न मन्त्र से आठ पुष्प प्रदान करे—

पद्ममध्य में—ॐ भूतात्मने गोपतये स्वाहा। पूर्व में—ॐ खद्योताय स्वाहा। दक्षिण में—ॐ ससत्याय स्वाहा। पश्चिम में—ॐ अमृताय स्वाहा। उत्तर में—ॐ वक्षस्तमाय स्वाहा। आग्नेय कोण में—ॐ अव्यक्ताय स्वाहा। नैर्ऋत्य कोण में—ॐ क्षयाय स्वाहा। वायुकोण में—ॐ अक्षयाय स्वाहा। ईशान कोण में—ॐ सङ्घातिने स्वाहा।

उक्त मन्त्ररूप रश्मि द्वारा अष्टमूर्ति का वर्णन किया गया। इस प्रकार से मन्त्रन्यास करके अभिषिक्त शिष्य को नीचे अंकित मन्त्र द्वारा दीक्षा से युक्त करे।

यज्ञोपवीत—ॐ पावकाय स्वाहा।
दण्डकाष्ठ—ॐ धर्मराजाय स्वाहा।