साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१४ श्रीसाम्बपुराणम्
कवचाय हुम्। नेत्र—ॐ हूं ॐ क्षूं नेत्रे। इसे ब्रह्मरुद्र तथा विष्णुरुद्र कहा गया है। यह देवाधिदेव भास्कर का हृदय है॥२९॥
स्वयम्भूव्यापको देवश्चान्ते चैव व्यवस्थितः।
त्रैलोक्यस्य सदा पूज्यं शिरो देवस्य कीर्तितम्॥३०॥
‘आ’ में स्थित स्वयम्भु व्यापक देव त्रैलोक्य में सदा पूज्य हैं और यह सूर्यदेव का मस्तक कहा गया है॥३०॥
रुद्रो विष्णुस्तथा ब्रह्मा रवेराद्यन्तसंस्थितः।
दुःसहां दाहनीमेतां शिखामाहुर्दिवस्पतेः॥३१॥
व्यापको विष्णुसहित आदित्यान्ते व्यवस्थितः।
कवचं सर्वविघ्नानां नाशनं देवनिर्मितम्॥३२॥
आद्यन्तेऽवस्थितः सूर्यो ब्रह्मा व्यापकमध्यतः।
सृष्टि-संहार-कर्त्ता च ह्यस्त्रमेतदुदाहृतम्॥३३॥
रुद्र, विष्णु तथा ब्रह्मा सूर्यदेव के आदि-अन्त में संस्थित हैं। दुःसह दाहनी (दग्ध करने की शक्ति) को दिवस्पति सूर्यदेव की शिखा कहा जाता है। व्यापक विष्णु के साथ आदित्य अन्त में रहते हैं। यह देवनिर्मित कवच समस्त विघ्नों का नाशक है। सूर्य आदि तथा अन्त में अवस्थित हैं। ब्रह्मा व्यापक हैं, अतः मध्य में रहते हैं। सृष्टि तथा संहार के कर्त्ता को अस्त्र कहा गया है॥३१-३३॥
नेत्रमेकं समुद्दिष्टमेतदक्षरमव्ययम्।
युगान्तानलवर्णाभमनेकादित्यवर्चसम् ॥३४॥
एवं तद्भास्करं ज्ञेयं षड्विधं संप्रकीर्तितम्।
पूर्वं द्वादशधा प्रोक्तमेतत् सूर्येण भाषितम्॥३५॥
इन्हें एकनेत्र कहा गया है, जो अव्यय अथवा अक्षर है तथा युगान्त काल में अग्नि के वर्ण के समान, अनेक सूर्यरश्मि के समान होते हैं। यह छः प्रकार के सूर्य की बातें कहीं गयीं। पहले द्वादश प्रकार के कहे गये थे। यह सब सूर्यदेव ने साम्ब से कहा था॥३४-३५॥
लक्षमेकैकमावर्त्य न चागस्त्यानुपूर्वशः।
तथैव मन्त्रे देवस्य पुनर्लक्षं समाहितः॥३६॥
तिलांस्त्रिमधुरोपेतान् होमयेज्जातवेदसम्।
भास्करास्त्रेण जुहुयात् सायं सहविषा समम्॥३७॥
सूर्य एक-एक लाख आवर्त्तन करते हैं; किन्तु अगस्त्य का अतिक्रमण नहीं करते। ऐसे समाहित होकर सूर्यदेव का एक लाख मन्त्र उच्चारण करके तिल-घृत-मधु-शर्करा