साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २१५
युक्त करके अग्नि में होम करना चाहिये। सन्ध्या के समय भास्कर अस्त्र के द्वारा होम करना चाहिये।।३६-३७।।
होमावसाने च पुनर्होमभागो विधीयते।
ततः कृतार्थतामेति साधको देवदर्शनात् ॥३८॥
होम के अन्त में होम का भाग करे। तदनन्तर साधक देवदर्शन के फल से कृतार्थता प्राप्त करता है।।३८।।
त्रिकालवेदी तत्त्वज्ञो गुणत्रय-विवर्जितः।
प्राप्नुयात् परं स्थानमनिलानलवर्जितम् ॥३९॥
जो प्रकाश के ज्ञाता (भूत-भविष्य तथा वर्तमान को जानने वाले), तत्त्वज्ञ एवं गुणत्रय-वर्जित हैं, वे अग्नि तथा वायुरहित परम स्थान को प्राप्त करते हैं।।३९।।
स एवं पूज्यते मन्त्री देववद् भुवि मानवैः।
त्राता स एव लोकानां व्याधिदुःखविनाशनः ॥४०॥
अप्रमेयमिदं शास्त्रं पुराणं पूर्वचोदितम्।
द्वापरे नारदेनैव पुनः साम्बाय भाषितम् ॥४१॥
ततः प्रभृति लोकेषु प्रवृत्तं भास्करध्वजम्।
सर्वपापहरं पुण्यं सर्वकाम-प्रदायकम् ॥४२॥
इति श्रीसाम्बपुराणे यज्ञस्थानविधिनिरूपणं नाम चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
वह मन्त्रसाधक पृथ्वी पर जनगण द्वारा देवता के समान पूजित होता है। वह समस्त लोक का त्राणकर्त्ता एवं व्याधि तथा दुःख का विनाशक हो जाता है। तुलनारहित यह पुराण पूर्व में भी प्रकट था, जिसे द्वापर में नारद ने पुनः साम्ब को सुनाया। तभी से संसार में भास्कर ध्वजा प्रवृत्त होती है, जो समस्त पापहारी है। साथ ही परम पवित्र एवं समस्त कामनाओं को देने वाला है।।४०-४२।।
श्री साम्बपुराणोक्त यज्ञस्थानविधि नामक चालीसवाँ अध्याय समाप्त
एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(दीक्षाविधानम् )
वसिष्ठ उवाच
अतः परं तु दिक्पालान् पूर्वान् प्रभृति पूजयेत्।
ॐ विकटाय ठः ठः। ॐ वामनाय ठः ठः। ॐ लम्बोदराय ठः ठः। ॐ हेमगर्भाय ठः ठः। ॐ भीमवेगाय ठः ठः। ॐ सौम्यरूपाय ठः ठः। ॐ पञ्चात्मकाराय ठः ठः। ॐ विदेहाय ठः ठः। ॐ धर्मविग्रहाय ठः ठः। ॐ अहिर्बुध्न्याय ठः ठः। ॐ कालाय ठः ठः। ॐ उपकालाय ठः ठः। पूर्वस्यां दिशि चैतान् पूजयित्वा पञ्चरूपकैः खण्डाद्यैः प्रत्येकं पात्रेण बलिर्दातव्यः।
दक्षिणस्यां दिशि—अघोराय ठः ठः। ॐ बटुकाय ठः ठः। ॐ ऊर्ध्वरोमाय ठः ठः। ॐ मृत्युहस्ताय ठः ठः। ॐ मेघनादाय ठः ठः। ॐ कौस्तुभाय ठः ठः। ॐ धूमकालाय ठः ठः। ॐ उग्रजिह्वाय ठः ठः। ॐ मासमूर्तये ठः ठः। ॐ वल्कलिने ठः ठः। ॐ दण्डिने ठः ठः। ॐ कर्मसाक्षिणे ठः ठः। एतेषां मत्स्यमांसधूलिकादिभिर्बलिर्दातव्यः।
पश्चिमायाँ दिशि—ॐ सूर्यमूर्तये ठः ठः। ॐ गुहाशयाय ठः ठः। ॐ टङ्कपाणाय ठः ठः। ॐ महाबलाय ठः ठः। ॐ वायुभक्षाय ठः ठः। ॐ पञ्चमूर्तये ठः ठः। ॐ अग्निपाशाय ठः ठः। ॐ पशुपतये ठः ठः। ॐ महाआशाय ठः ठः। ॐ कृष्णदेहाय ठः ठः। ॐ अमोघाय ठः ठः। ॐ अच्युताय ठः ठः। एतेषां क्षारघृतपूर्णपात्रेण बलिर्दातव्यः।
उत्तरतः—ॐ शिखिलिङ्गिने ठः ठः। ॐ योगेश्वराय ठः ठः। ॐ त्रिशिखाय ठः ठः। ॐ शतक्रतवे ठः ठः। ॐ पञ्चशिखाय ठः ठः। ॐ सहस्रकिरणाय ठः ठः। ॐ सुवर्णकेतवे ठः ठः। ॐ पद्मकेतवे ठः ठः। ॐ यज्ञरूपाय ठः ठः। ॐ भुवनाधिपतये ठः ठः। ॐ पद्मनाभाय ठः ठः। एतेषां सुवर्णरजतवस्त्रैर्बलिदानम्।
वशिष्ठ देव कहते हैं—तदनन्तर पूर्वादि दिक् में दिक्पालों की पूजा करनी चाहिये। ॐ विकटाय ठः ठः इत्यादि मन्त्रों से पूजन करे (ठः ठः का अर्थ है—स्वाहा)।
ॐ विकटाय स्वाहा, ॐ वामनाय स्वाहा, ॐ लम्बोदराय स्वाहा, ॐ हेमगर्भाय स्वाहा, ॐ भीमवेगाय स्वाहा, ॐ सौम्यरूपाय स्वाहा, ॐ पञ्चात्मकाय स्वाहा, ॐ विदेहाय स्वाहा, ॐ धर्मविग्रहाय स्वाहा, ॐ अहिर्बुध्न्याय स्वाहा, ॐ कालाय स्वाहा,
एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २१७
ॐ उपकालाय स्वाहा ॐ—पूर्व दिशा में इन मन्त्रों से तत्तद् देवताओं की पूजा करके खाण्ड आदि पञ्च रूपकों द्वारा प्रत्येक को पात्र में बलि (उपहार) प्रदान करे।
अब दक्षिण में मूल में लिखित मन्त्रों से अघोर आदि का पूजन करना चाहिये—ॐ अघोराय स्वाहा, ॐ बटुकाय स्वाहा, ॐ ऊर्ध्वरोमाय स्वाहा, ॐ मृत्युहस्ताय स्वाहा, ॐ मेघनादाय स्वाहा, ॐ कौस्तुभाय स्वाहा, ॐ धूमकालाय स्वाहा, ॐ उग्रजिह्वाय स्वाहा, ॐ मासमूर्त्तये स्वाहा, ॐ वल्कलिने स्वाहा, ॐ दण्डिने स्वाहा, ॐ कर्मसाक्षिणे स्वाहा। इनको मत्स्य, मांस, धूलिकादि की बलि देनी चाहिये।
अब पश्चिम दिशा में सूर्यमूर्त्तियों का पूजन करे—ॐ सूर्यमूर्त्तये स्वाहा, ॐ गुहाशयाय स्वाहा, ॐ टङ्कपाणाय स्वाहा, ॐ महाबलाय स्वाहा, ॐ वायुभक्षाय स्वाहा, ॐ पञ्चमूर्त्तये स्वाहा, ॐ अग्निपाशाय स्वाहा, ॐ पशुपतये स्वाहा, ॐ महा आशाय स्वाहा, ॐ कृष्णदेहाय स्वाहा, ॐ अमोघाय स्वाहा, ॐ अच्युताय स्वाहा। इनको घृतपूर्ण क्षीरपूर्ण पात्र में बलि प्रदान करे।
उत्तर दिशा में शिखिलिङ्गी आदि का पूजन करे। यथा—ॐ शिखिलिङ्गिने स्वाहा, ॐ योगेश्वराय स्वाहा, ॐ त्रिशिखाय स्वाहा, ॐ शतक्रतवे स्वाहा, ॐ पञ्चशिखाय स्वाहा, ॐ सहस्रकिरणाय स्वाहा, ॐ सुवर्णकेतवे स्वाहा, ॐ पद्मकेतवे स्वाहा, ॐ यज्ञरूपाय स्वाहा, ॐ भुवनाधिपतये स्वाहा, ॐ पद्मनाभाय स्वाहा। इनको स्वर्ण, चाँदी तथा वस्त्र की बलि (उपहार) देनी चाहिये।
एवं यः कुरुते राजन्! पूजां शास्त्रप्रचोदिताम्।
तस्य सर्वे क्रियारम्भाः सकला प्रेत्य चेह च ॥
नान्यच्छास्त्रं समुद्दिष्टं भानोः पूजानिवेदनम्।
पुराणोक्तामिमां राजन् सर्ववेदोपबृंहिताम् ॥
महाराज! जो इस प्रकार से शास्त्रविहित पूजन करते हैं, उनकी इस लोक में तथा परलोक में सभी क्रिया सफल होती है। सूर्य के पूजादि में अन्य किसी शास्त्र का उल्लेख नहीं है। यहाँ जो कुछ बताया जा रहा है, वह वेद का संग्रहरूप तथा पुराणोक्त विधान है।
ये केचिदन्यतन्त्रज्ञाः पूजां कुर्वन्ति मोहिताः।
भक्तिश्रद्धां फलं तेषां न तु मन्त्रकृतं भवेत् ॥
जो अन्य मन्त्रों एवं तन्त्रों से मोहित (आकर्षित) होकर पूजा करता है, वह अपनी श्रद्धा तथा भक्ति का ही फल पाता है, किन्तु उसे मन्त्र का फल नहीं मिलता।
अध्येतव्यमिदंशास्त्रं सततं पापनाशनम्।
आयुरारोग्यविजयं यशः कीर्तिकरं शुभम् ॥
२१८ श्रीसाम्बपुराणम्
इस शास्त्र का पाठ सर्वदा करना उचित है। यह पापनाशक है। आयु-आरोग्य, विजय, यश तथा शुभ कीर्तिदायक है।
एतेषां दिक्पालानां पूजां कृत्वा पुनर्वक्ष्यमाणकर्मन्त्रैः पञ्चपञ्चाहुतयः आज्येनैकैकं पायसेन वा।
ॐ शितिने ठः ठः विकटाय। ॐ अशितिने ठः ठः वामनः। ॐ व्यवहिताय ठः ठः लम्बोदराय। ॐ संहताय ठः ठः हेमगर्भः। ॐ सर्वगाय ठः ठः विदेहाय। ॐ स्थिराय ठः ठः घामवेगाय। ॐ शान्ताय ठः ठः सौम्यरूपाय। ॐ सर्वहराय ठः ठः पञ्चात्मकाय। ॐ अजरूपाय ठः ठः धर्मविग्रहाय। ॐ निरभ्राय ठः ठः अहिर्बुध्न्याय। ॐ मनवे ठः ठः कालाय। ॐ किन्नराय ठः ठः उपकालाय। पूर्वदिशि योगिनः।
ॐ संस्तुताय ठः ठः अघोराय। ॐ अनन्ताय ठः ठः वडवामुखाय। ॐ क्रुद्धाय ठः ठः ऊर्ध्वरोमाय। ॐ समाय ठः ठः मृत्युहस्ताय। ॐ अनन्तजिह्वाय ठः ठः मेघनादाय। ॐ स्फुरिताय ठः ठः कौस्तुभाय। ॐ क्रूराय ठः ठः धूमकालाय। ॐ समोनवाढाय ठः ठः उग्रजिह्वाय। ॐ करभाय ठः ठः मासम्मूर्तये। ॐ आग्नेयाय ठः ठः वल्वली। ॐ रक्तवर्णाय ठः ठः दिणि। ॐ सुरक्ताय ठः ठः कर्मसाक्षी। दक्षिणदिग्भागिनः।
ॐ सरस्वत्यै ठः ठः वायुभक्षः। ॐ कारवे ठः ठः पञ्चमूर्त्तिः। ॐ क्रीडते ठः ठः अग्निपाशः। ॐ विक्रीडते ठः ठः पशुपतिः। ॐ हन्ताय ठः ठः महापाशः। ॐ विहन्ताय ठः ठः कृष्णदेहः। ॐ ध्रुवाय ठः ठः अमोघः। ॐ विशिखाय ठः ठः अच्युतः। पश्चिमदिग्भागिनः।
ॐ सवित्रे ठः ठः शिखिलिङ्गः। ॐ मध्यगताय ठः ठः ग्रन्थिवासः। ॐ युक्ताय ठः ठः योगवासः। ॐ खड्गिने ठः ठः त्रिशिखः। ॐ ज्येष्ठाय ठः ठः शतक्रतुः। ॐ मध्यगताय ठः ठः पञ्चशिखः। ॐ कनिष्ठाय ठः ठः सहस्रकिरणः। ॐ सर्वरोग्याय ठः ठः पद्मकेतुः। ॐ कातराय ठः ठः यज्ञरूपः। ॐ युगाय ठः ठः भुवनाधिपः। ॐ अनन्तशक्तये ठः ठः पद्मनाभः। उत्तरतः॥१॥
इन सभी दिक्पालों का पूजन करके पुनः नीचे लिखे मन्त्रों द्वारा प्रत्येक मन्त्र से ५-५ घृताहुति प्रदान करनी चाहिये अथवा पायस की एक-एक आहुति प्रदान करनी चाहिये।
ॐ शितिने स्वाहा विकटः, ॐ अशीतिने स्वाहा वामनः, ॐ व्यवहिताय स्वाहा लम्बोदरः, ॐ संहताय स्वाहा हेमगर्भः, ॐ सर्वगाय स्वाहा विदेहः, ॐ स्थिराय स्वाहा भीमवेगः, ॐ शान्ताय स्वाहा सौम्यरूपः, ॐ सर्वहराय स्वाहा पञ्चात्मकः, ॐ अजरूपाय स्वाहा धर्मविग्रहः, ॐ निरभ्राय स्वाहा अहिर्बुध्न्यः, ॐ मनवे स्वाहा कालः, ॐ किन्नराय स्वाहा उपकालः। ये पूर्व के योगी हैं।
एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २१९
अब दक्षिण में स्थित योगियों की पूजा करे—ॐ संस्तुताय स्वाहा अघोरः, ॐ अनन्ताय स्वाहा बड़वामुखः, ॐ क्रुद्धाय स्वाहा ऊर्ध्वरोमा, ॐ समाय स्वाहा मृत्युहस्तः, ॐ अनन्तविजयाय स्वाहा मेघनादः, ॐ स्फुरिताय स्वाहा कौस्तुभः, ॐ क्रूराय स्वाहा धूमकालः, ॐ समोनवाढ़ाय स्वाहा उग्रजिह्वः, ॐ करभाय स्वाहा मासमूर्तिः, ॐ अग्नये स्वाहा वल्कली, ॐ रक्तवर्णाय स्वाहा दिनी, ॐ सुरक्ताय स्वाहा कर्मसाक्षी। ये दक्षिण दिशा के योगी हैं।
अब पश्चिम के योगियों का पूजन करे—ॐ सरस्वत्यै स्वाहा वायुभक्षः, ॐ कारवे स्वाहा पञ्चमूर्तिः, ॐ क्रीड़ते स्वाहा अग्निपाशः, ॐ विक्रीड़ते स्वाहा पशुपतिः, ॐ हस्ताय स्वाहा महापाशः, ॐ विहन्ताय स्वाहा कृष्णदेहः, ॐ ध्रुवाय स्वाहा अमोघः, ॐ विशिखाय स्वाहा अच्युतः। ये पश्चिम के योगी हैं।
अब उत्तर स्थित योगिगण का पूजन करे—ॐ सवित्रे स्वाहा शिखिलिङ्गः, ॐ मध्यमाय स्वाहा ग्रन्थिवासः, ॐ युक्ताय स्वाहा योगवासः, ॐ खड्गिने स्वाहा त्रिशिखः, ॐ ज्येष्ठाय स्वाहा शतक्रतुः, ॐ मध्यगताय स्वाहा पञ्चशिखः, ॐ कनिष्ठाय स्वाहा सहस्रकिरणः, ॐ सर्वैराग्याय स्वाहा पद्मकेतुः, ॐ कातराय स्वाहा यज्ञरूपः, ॐ युगाय स्वाहा भुवनाधिपः, ॐ अनन्तशक्तये स्वाहा पद्मनाभः। ये उत्तर दिशा में अवस्थित हैं।
वेदोद्धृतमिदं राजन्मन्त्राकाशं पुरातनम्।
यजंस्त्रिकालमव्यग्रः सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥१॥
हे महाराज! वेद से उद्धृत तथा पुरातन मन्त्रों से सुबह, दोपहर तथा सायंकाल यजन करने से समस्त कामना पूर्ण हो जाती है॥१॥
इदमेव परं ज्ञानं कर्मयोगं च निष्कलम्।
इदं दत्तं मया तुभ्यं यथा साम्बाय भास्वते ॥२॥
यह परम ज्ञान तथा निष्कल कर्मयोग है। सूर्य ने साम्ब से जो कहा था, वह मैंने तुमसे कहा॥२॥
कृत्वा दिशां बलिं सम्यक् दिक्पालानां समाहितः।
होमं कृत्वा च तेनैव ततो ध्यानं विवस्वतः ॥३॥
समाहित होकर सब दिशाओं के दिक्पाल गण को बलि देनी चाहिये तथा पूर्वोक्त प्रकार से होम करके नीचे लिखे मन्त्रों से सूर्य का आह्वान करना चाहिये॥३॥
एह्येहि देवाकृतशब्दमूर्ते सर्वैर्वृतो यागमिमं प्रपश्य।
त्वमेव पूज्योऽसि सुरासुराणां धर्मादिवर्गस्य समीहकानाम् ॥४॥
२२० श्रीसाम्बपुराणम्
हे देव! आप आईये-आईये। आप शब्दमूर्त्ति को आवृत्त करके स्थित हैं। सबके द्वारा वरणीय होकर इस यज्ञ को देखिये। देवता, असुर तथा धर्मादि चतुर्वर्ग जिसका पालन करते हैं, उन सबके आप ही पूजनीय हैं॥४॥
ज्ञानं मन्त्रार्चितो भूयः कुसुमैश्च विधानतः।
गच्छ देव यथाकामं पुनरागमनाय च॥५॥
ज्ञानमन्त्रों द्वारा आप अर्चित हैं और यथाविधि पुष्पों से पूजित हैं। हे देव! आप पुनः आने के लिये यथेच्छा से गमन करिये॥५॥
इदमेव परं सत्यमिदमेव परं तपः।
इदमेव परो देवः सुरासुरनमस्कृतः॥६॥
यही परम सत्य है, परम तपस्या है। ये ही देवता तथा असुरों द्वारा नमस्कृत परम देव हैं॥६॥
पुराणोक्तमिदं शास्त्रं यः पठेत् प्रयतः शुचिः।
स सहस्रार्चिषं देवं प्रविशेन्नात्र संशयः॥७॥
पुराणोक्त इस शास्त्र का साग्रह पवित्र मन से जो पाठ करते हैं, वे सूर्यलोक में गमन करते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है॥७॥
तीर्थानां परमं तीर्थं मङ्गलानां च मङ्गलम्।
पवित्राणां पवित्रं च श्रोतव्यं परमं पदम्॥८॥
इति श्रीसाम्बपुराणे दीक्षाविधानो नाम एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
तीर्थों में यह परम तीर्थ है। मंगलों में परम मंगल है। पवित्रों में परम पवित्र है तथा यह परम वस्तु श्रोतव्य है॥८॥
श्री साम्बपुराणोक्त दीक्षाविधान नामक इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त
द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(यात्रानियमः)
वशिष्ठ उवाच
कृत्वा देवगृहं साम्ब ह्यानयित्वा तु याजकान्।
आजगामाथ धर्मात्मा यत्र सन्निहितो रविः ॥१॥
एते मित्रवनं श्रुत्वा देवमानुषपन्नगाः।
ऋषयः सिद्धविद्याद्या गन्धर्वोरगगुह्यकाः ॥२॥
दिक्पाला लोकपालाश्च गुह्याक्षाश्च धार्मिकाः।
सप्रजापतयः सर्वे गन्तुं प्रत्युपचक्रमुः ॥३॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—धर्मात्मा साम्ब ने देवमन्दिर तैयार करवाकर तथा याजकों को लाकर वहाँ आये, जहाँ सूर्यदेव (प्रतिमारूपी) सन्निहित थे। मित्रवन की बात सुनकर देवता, मनुष्य, सर्पगण, ऋषिगण, सिद्ध-विद्याधरगण, गन्धर्व, उरग, गुह्यक, प्रजापति के साथ सभी धार्मिक लोग भी वहाँ आने लगे॥१-३॥
उपवासपराः केचित् केचिदात्मनि तत्पराः।
त्रिवृताध्वराः केचित् केचिज्जाप्यसमन्विताः ॥४॥
दारुपाकधराः केचित् केचित्सर्वार्थगामिनः।
अपरे नियताहारा निराहारास्तथा परे ॥५॥
त्यक्त्वा देहगतां चिन्तां रविध्यानपरायणाः।
मासपक्षोपवासेन केचिल्लङ्घनमात्मनि ॥६॥
उनमें से कोई-कोई उपवासी, कोई-कोई आत्मचिन्तन में विभोर, कोई वेदपथगामी तथा कोई-कोई जप-निरत थे। कोई काष्ठ धनुषधारी थे, कोई सर्वाभिलाषी थे, कोई-कोई संयत आहार करने वाले थे, कोई-कोई निराहारी थे। उन्होंने अपनी-अपनी देहगत चिन्ता का त्याग करके सूर्य के ध्यान में स्वयं को मग्न कर लिया था। किसी ने मास अथवा पक्षकाल उपवास के फल से आत्मा का भी लङ्घन कर लिया था॥४-६॥
अचिरेणैव कालेन संप्राप्य लवणोदधिम्।
दृष्ट्वा तपोवनं रम्यं लवणोदधिमाश्रितम् ॥७॥
नानापुष्पफलोपेतं देवगन्धर्वसेवितम्।
ऋषयः पर्युपासन्ते क्रमं हित्वा ततः सदा ॥८॥
२२२ श्रीसाम्बपुराणम्
उन सबने अल्प काल में ही लवण समुद्र में पहुँचकर लवणोदधि पर आश्रित रम्य तपोवन को देखा। वह नाना पुष्प तथा फलों से शोभित एवं देव-गन्धर्वादि से सेवित था। वहाँ ऋषिगण सब समय क्रम का त्याग करके सेवारत थे॥७-८॥
अपरो रविलोकस्तु सादृश्यात् कीर्तितो भुवि ।
सर्वे ते हर्षमापन्ना दृष्ट्वा रम्यं तपोवनम् ॥९॥
रमणं सर्वकार्येषु सर्वभूतोपकारकम् ।
सर्वप्राणिसुखावासं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥१०॥
सादृश्य के कारण वह पृथ्वी का अपर सूर्यलोक कहलाता था। सभी उस रम्य तपोवन को देखकर प्रसन्न हो गये। वह तपोवन समस्त कार्य के लिये रमणीय था। समस्त प्राणियों का उपकारक तथा सुख की आवासभूमि था। इसका निर्माण विश्वकर्मा ने किया था॥९-१०॥
वशिष्ठ उवाच
नारदोऽप्यथ शास्त्रं तत् सदा पठति बुद्धिमान् ।
साधु साम्ब महाभाग भक्तिमानसि यादव ॥११॥
येनेयमीदृशी या तु कृता त्वर्चा सनातनी ।
त्वत्प्रसादेन सावित्र्यं यत्पश्यामस्तपोवनम् ॥१२॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—बुद्धिमान् नारद भी इस शास्त्र को सर्वदा कहते रहते हैं। महाभाग यादव साम्ब! साधु, तुम भक्तिमान् हो। तुमने ऐसी सनातन प्रतिमा स्थापित की है। तुम्हारी कृपा से ही मैंने सूर्य का तपोवन देखा॥११-१२॥
श्रुत्वा तं निर्मलं वाक्यं साम्बः परमधर्मवान् ।
प्रणिधाय शिरो भूमौ देवं विज्ञापयत्ततः ॥१३॥
परम धार्मिक साम्ब ने इस निर्मल बात को सुनकर भूमि पर मस्तक अवनत करके देव से इस प्रकार प्रार्थना किया॥१३॥
यत्त्वयोदाहृतं पूर्वं सान्निध्यं स्थानमुत्तमम् ।
ममैवानुग्रहाद्देव पूजानुग्रहकारिणा ॥१४॥
अस्ति मे कृपया किञ्चिद् वद सौम्य विभावसो ।
क्षीणगात्रेन्द्रियप्राणो गिरा चाप्यतिमन्दया ॥१५॥
हे सौम्य! मेरे प्रति कृपा करके देवपूजा के अनुग्रहकारी आपने जिस उत्तम स्थान की बात बतलायी थी, मेरे प्रति करुणा करके हे विभावसु (सूर्य)! कुछ कृपा करिये तथा उपदेश दीजिये। मेरे शरीर-प्राण-इन्द्रियादि अत्यन्त क्षीण हैं एवं वाणी भी अत्यन्त मन्द है॥१४-१५॥
द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २२३
ज्ञात्वा भक्त्यान्वितं साम्ब देवो वचनमब्रवीत्।
त्यज कीर्त्तिकृतां चिन्तां मत्स्थाने यदुनन्दन ॥१६॥
पूर्वदत्तं मया वाचा प्रसादं शृणु यादव।
अस्मिँल्लवणोदधेस्तीरे तापसाः पूर्वमानवाः ॥१७॥
मत्प्रसादं च काङ्क्षन्तः क्लिष्टान् वर्षशतान्बहून्।
तान् दृष्ट्वा तापसांस्तत्र कृपा मे विकृतां हृदि ॥१८॥
साम्ब की भक्ति देखकर देव (सूर्यदेव) कहते हैं—हे यदुनन्दन! मेरे पास आकर चिन्ताओं का परित्याग कर दो। हे यादव! मेरी पूर्वप्रदत्त प्रसन्नता की बात सुनो। लवण समुद्र के तीर पर प्राचीन अनेक तपस्वी मेरे अनुग्रह की आकांक्षा करके सैकड़ों-सैकड़ों वर्ष तक क्लेश का भोग करते हैं। उन तपस्वियों को देखकर मेरे मन में कृपा का उदय होता है॥१६-१८॥
ब्रूत वत्सा यथान्यायं पयो वर्चो बलं वनम्।
सत्यधर्म्मार्थयुक्तार्थान् प्रार्थयध्वमनुत्तमम् ॥१९॥
श्रुत्वा ते निर्मलं वाक्यं देववक्त्राद्विनिःसृतम्।
मानवा हर्षमापन्नाः संप्रहृष्टात्ममानसाः ॥२०॥
यदि प्रसन्नो भगवान् वरं दातुं समुद्यतः।
अविघ्नमस्तु नश्चैव त्वयि भक्तिर्विभावसौ ॥२१॥
हे वत्सगण! बोलो, न्यायपूर्ण दुग्ध, वर्च, बल, वन, सत्यधर्म के लिये प्रयोजनीय अतुलनीय वस्तु की प्रार्थना करो। सूर्यदेव के मुख से निकले निर्मल वाक्य सुनकर हर्षित चित्त से तापसगण आनन्दित होकर बोले—भगवन्! यदि प्रसन्न होकर वर देने के लिये आप उद्यत हो गये हैं, तो यह वर दें कि हमलोगों को कोई विघ्न न हो तथा आप सूर्यदेव में हमारी भक्ति बराबर बनी रहे॥१९-२१॥
एवमस्त्विति सोऽप्युक्त्वा भगवान्दिनकृद्विभुः।
अपरं प्रार्थयध्वं वै वरं वदत मानवाः ॥२२॥
भूयस्तुष्टास्तु ते साम्ब सर्वधर्मपरायणाः।
प्रार्थयन्ते परं श्रेष्ठं प्रहृष्टोत्फुल्ललोचनाः ॥२३॥
'वही हो' कहकर भगवान् विभु सूर्यदेव ने यह भी कहा—हे मानवगण! अन्य वर माँगो। हे साम्ब! समस्त धर्मपरायण लोगों ने तुष्ट होकर पुनः परम श्रेष्ठ वर की प्रार्थना की॥२२-२३॥
मुनय ऊचुः
यदि तुष्टो महातेजा वरं दातुं समुद्यतः।
त्वत्प्रसादेन देवेश स्रष्टारोऽस्य भवामहे ॥२४॥
२२४ श्रीसाम्बपुराणम्
मुनिगण कहते हैं—हे महातेजस्वी! यदि आप प्रसन्न हैं और वर देना चाहते हैं तब हे देवेश! आपकी कृपा से हम इस जगत् के सृष्टिकर्त्ता हो जायें॥२४॥
वशिष्ठ उवाच तत्प्रसन्नो महातेजाः पुनर्वचनमब्रवीत्। एवं भवतु भूयोऽपि प्रजासर्गं प्रकल्प्यथ॥२५॥ अन्यच्छृणुत वक्ष्यामि कीर्त्तिकारणहेतुना। इदं तपोवनं रम्यं यदा स्थानमनुत्तमम्॥२६॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—उनके प्रति सन्तुष्ट होकर महातेजस्वी सूर्यदेव पुनः कहते हैं—ऐसा ही हो। तुम प्रजासृष्टि करो। और भी सुनो, यह कीर्ति का हेतु होगा। यह स्थान अतुलनीय रम्य तपोवन होगा॥२५-२६॥
श्रुत्वा तु निर्मलं वाक्यं ते वै प्राहुर्दिवाकरम्। त्वत्प्रसादेन चास्माकं देव यत्प्रीतिकारकम्॥२७॥ कीर्त्यर्थं प्रतिलप्स्यामो रोचयस्व दिवाकर। इदं स्थानं समासाद्य वयं तीर्णाः सुरप्रभो॥२८॥ प्रजानां च हितार्थाय ममैवानुग्रहाय च। अत्र कीर्तिं करिष्यामः प्रसादात्तव भास्करः॥२९॥
यह सुनिर्मल बात सुनकर मुनिगण पुनः दिवाकर देव से कहते हैं—हे देव! आपकी कृपा से हमारे लिये जो कीर्तिकर है, उसे हमने प्राप्त किया। हे दिवाकर! आप प्रकाशित हो जायें। हे देवताओं के स्वामी! इस स्थान को प्राप्त करके हम उत्तीर्ण होंगे। प्रजागण के कल्याण के लिये यह हम पर अनुग्रह का निमित्त है। हे भास्कर! आपकी कृपा से हम कीर्त्ति प्राप्त करेंगे॥२७-२९॥
देव उवाच दत्वा यूयं मम स्थानं सप्तद्वीपेषु दुर्लभम्। मन्वन्तरमथैकं च कीर्त्तिमन्तो भविष्यथ॥३०॥ मन्त्रसिद्धास्तु ये चान्ये मुनयश्च सुरोत्तमाः। मम स्थानरताः सर्वे तेनोर्ध्वं नैव भाषितम्॥३१॥
सूर्यदेव कहते हैं—सप्त द्वीपों के मध्य मेरे इस दुर्लभ स्थान को दान करके तुम एक मन्वन्तर-पर्यन्त कीर्तिमान रहोगे। अन्य जो मन्त्रसिद्ध मुनिगण तथा देवश्रेष्ठ लोग हैं, वे मेरे इस स्थान की सेवा करके ऊर्ध्वलोकों में गमन करेंगे। इस विषय में और कुछ नहीं कहना है॥३०-३१॥
एकोनविंशतिः शून्यै रूपैरेकावसानकैः ।
द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २२५
नारद उवाच
एकोनविंशतिः शून्यै रूपैरेकावसानकैः ।
एतैः प्रमाणैर्वषाणां गण्डको ब्रह्मणः स्मृतः ॥३२॥
गण्डानां शतसाहस्रैर्मनुरेकः प्रकीर्त्तितः ।
याम्येन च पुरा कुर्यात्ततः स्वारोचिषेण च ॥३३॥
तृतीये मन्वन्तरे देवश्चतुर्थे कीर्त्तितो मनुः ।
पञ्चमे मन्वन्तरे सत्यः षष्ठे ऋतुश्च कीर्त्तिमान् ॥३४॥
सप्तमे सनत्कुमारस्तु कीर्त्तितं भुवनं रवेः ।
वैवस्वतेन मनुना वर्त्तमानेन कीर्त्तितम् ॥३५॥
अत ऊर्ध्वं भवेच्छम्भुः शम्भोरूर्ध्वं महानसः ।
महानसाद्वशिष्ठश्च ततः कल्पः समाप्यते ॥३६॥
इति श्रीशाम्बपुराणे यात्रानियमो नाम द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
नारद कहते हैं—उन्नीस शून्य रूप १९ प्रमाण वर्ष को ब्रह्मा का गण्डक कहते हैं। शतसहस्र गण्डक को एक मनु का काल कहते हैं। प्रथम है—याम्य मन्वतर एवं द्वितीय है—स्वारोचिष। इसी प्रकार तृतीय है—सूर्यदेव एवं चतुर्थ मन्वन्तर है—मनु। पञ्चम मन्वन्तर है—सत्य एवं षष्ठ है—कीर्तिमान केतु। सनत्कुमार को रवि का भुवन कहा गया है। वर्तमान में वैवस्वत मनु का काल है। इसके पश्चात् होगा शम्भु, तदनन्तर महानस, तत्पश्चात् होगा वशिष्ठ। तदनन्तर कल्प समाप्त हो जाता है।।३२-३६।।
श्री साम्बपुराणोक्त यात्रानियम नामक बयालीसवाँ अध्याय समाप्त
त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(सूर्यस्तुतिः भक्तमाहात्म्यञ्च)
वसिष्ठ उवाच
तस्मिंस्तपोवने देशे तीरे तु लवणोदधेः ।
तिष्ठन्ति ये च सम्प्राप्ता देवदर्शनकाङ्क्षिणः ॥१॥
केचिद् ध्यायन्ति पूतात्मा केचित्तद्गतमानसाः ।
यजन्ति हव्यसम्पन्नाश्चिन्तयन्त्यात्मतत्पराः ॥२॥
गायन्ति सिद्धगन्धर्वा नृत्यन्त्यप्सरसांवराः ।
वीणाहस्ताश्च ये केचिदर्घहस्तास्तथापरे ॥३॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—लवणसमुद्र के तीर पर तपोवन देश में देवदर्शन की इच्छा से जो स्थित थे, उनमें पूतचित्त होकर कोई ध्यान कर रहा था, कोई तद्गत चित्त होकर स्थित था, कोई हव्यादि यज्ञ में रत था तो कोई आत्मनिष्ठा-चिन्तन में लीन था। सिद्ध तथा देवगण गायन कर रहे थे, श्रेष्ठ अप्सरायें नृत्यरत थीं। उनमें किसी के हाथों में वीणा थी तो कोई अर्घ्य हस्त (अर्घ्य प्रदान) था॥१-३॥
कृताञ्जलिपुटाः केचित् केचिदानतमस्तकाः ।
योगिनो योगचित्ताश्च मुनयो यतमानसाः ॥४॥
ऋषयः क्षान्तिसंयुक्ता देवाः स्तुन्वन्ति भास्करम् ।
यातुधानास्तथा यक्षाः सिद्धाश्चैव महोरगाः ॥५॥
दिक्पाला लोकपालाश्च ये च विघ्नविनायकाः ।
सर्वे भक्तिपरा भूत्वा तिष्ठन्ति सूर्यकानने ॥६॥
कोई अञ्जलियुक्त था, किसी ने मस्तक झुका रखा था। योगचित्त योगीगण, यतमानस मुनिगण, क्षमान्वित ऋषिगण तथा देवगण भास्कर की स्तुति कर रहे थे। ऐसे ही यातुधान, यक्ष, सिद्ध, महासर्पगण, दिक्पालगण तथा विघ्ननाशक लोकपालगण भक्तितत्पर होकर सूर्यवन में स्थित थे॥४-६॥
क्षीणगात्रेन्द्रियप्राणा देवाराधनतत्पराः ।
जागरार्त्तिपराः क्लिष्टा अध्वभिः परिपीडिताः ॥७॥
स्तूयमानाः स्थिताः सर्वे भास्करोदयकाङ्क्षिणः ।
त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २२७
उनके शरीर, इन्द्रियाँ तथा प्राण शीर्ण हो गये थे। वे देवता (सूर्य) की आराधना में लगे थे। जागरण से थके, क्लान्त, आर्त्त तथा पथ चलने से प्रपीड़ित थे। सूर्यदेव की कृपाकांक्षार्थ वहाँ सभी स्तवन कर रहे थे।।७।।
ततः प्रभातसमये पद्मरागारुणप्रभे ॥८॥
विमला भूर्दिशः सर्वाः किरणोद्योतने रवेः।
स्तूयमानाः स्थिताः सर्वे भास्करोदयकाङ्क्षिणः ॥९॥
तदनन्तर पद्मराग के समान अरुणवर्ण प्रभात में पृथ्वी तथा समस्त दिशायें उदीयमान सूर्य-किरणों से निर्मल हो गयीं और सूर्यदेव के उदय की अपेक्षा में सभी स्तव करने लगे।।८-९।।
रविरागारुणीभूतसागराकाशभूतलम् ।
तत्क्षणेनैव सर्वांसामैकज्वालात्वमागताः ॥१०॥
तस्यामुदयवेलायां विवस्वद्धयैकमास्पदम्।
वीक्ष्यमाणाद्भुतं रूपं विराजन्तं दिवाकरम् ॥११॥
दिविस्थं सागरस्थं च द्विविधं मण्डलोद्यतम्।
अपरा भगवन्मूर्तिर्जलमध्ये विराजते ॥१२॥
पूर्वेदित रविकिरणों के अरुण वर्ण से सागर-आकाश-भूतल में मानो सूर्यरश्मि की ज्वाला आ पड़ी। उस उदयकाल में सूर्य ही एकमात्र अवलम्बन थे। अपूर्व रूप में विराजित सूर्यदेव की मूर्त्ति (आकृति) परिलक्षित होने लगी। आकाश तथा सागर में दो मण्डल देखे गये और एक अन्य भगवद् मूर्त्ति (सूर्यदेव की मूर्त्ति) जल में भी विराजित दिखाई देने लगी।।१०-१२।।
सर्वे विस्मयमापन्ना दृष्ट्वा चाद्भुतदर्शनम्।
मनवो बाहुसंवाहैरवतीर्णा महोदधिम् ॥१३॥
इस अलौकिक दर्शन को देखकर सभी विस्मित हो गये। तभी मनुगण बाँहें फैलाये महासमुद्र में अवतीर्ण हो गये।।१३।।
बाहुभिः संगृहीत्वा तु ह्यानयित्वा तपोवनम्।
स्थापयित्वा विधानेन मनवे हृष्टमानसाः ॥१४॥
स्तोत्रैः स्तुवन्ति ते चित्रैः साङ्गोपाङ्गैः सुसम्मितैः।
त्वं देव प्रलयः कालः क्षयः क्षान्तः क्षपानलः ॥१५॥
उद्भवः स्थितिसम्पत्तिः प्रजास्ते चाङ्गसम्भवाः।
सोषवर्षहिमं घर्मप्रह्लादं सुखशीतलम् ॥१६॥
त्वं देव ऋषिकर्त्ता च प्रकृतिः पुरुषः प्रभुः।
छाया संज्ञा प्रतिष्ठापि निरालम्बो निराश्रयः ॥१७॥
२२८ | श्रीसाम्बपुराणम्
हृष्टचित्त मनुगण उन्हें बाहुओं में उठाकर तपोवन में लाये एवं यथाविधान से उन्हें स्थापित करके सुसम्मत साङ्गोपाङ्ग विधि के साथ विचित्र स्तवन करने लगे। हे देव! आप प्रलय हैं। कालस्वरूप हैं। क्षमागुणान्वित हैं। रात्रि में अनल के समान हैं। आप सृष्टि-स्थितिकारक हैं। प्रजागण आपके अंगों से उत्पन्न हैं। आप शोषण (जलशोषण), वर्षण (शोषण के द्वारा वर्षण), हिम, घर्म, आनन्द, सुख तथा शीतलताकारक भी हैं। हे देव! आप ऋषियों के स्रष्टा हैं। आप ही पुरुष-प्रकृति तथा प्रभु हैं। आप ही छाया तथा संज्ञा (सूर्यपत्नीद्वय) की प्रतिष्ठा हैं। आप निरालम्ब तथा निराश्रय हैं।।१४-१७।।
आश्रयः सर्वभूतानां नमस्तेऽस्तु सदा मम।
त्वं देव सर्वतश्चक्षुः सर्वतः सर्वदा गतिः ॥१८॥
सर्वदः सर्वदा सर्वः सर्वसेव्यस्त्वमार्त्तिहा।
त्वं देव ध्यानिनां ध्यानं योगिनां योग उत्तमः ॥१९॥
त्वं भासा फलदः सर्वः सद्यः पापहरो विभुः ।
सर्वार्त्तिनाशं नोऽनाशीकरणं करुणाप्रभुः ॥२०॥
आप ही समस्त प्राणीगण के आश्रय हैं। आपके प्रति सर्वदा हम प्रणत रहें। हे देव! आप सर्वत्र देखते हैं। सर्वदा सभी ओर आपकी (अव्याहत) गति है। आप सर्वदा सबको सब कुछ देते हैं। आप सर्वस्वरूप हैं। सबके सेव्य तथा आर्तिनाशक हैं। हे देव! आप ध्यानीगण के ध्यान तथा योगीगण के उत्तम योग भी हैं। आप प्रकाशक, फल देने वाले, सर्वरूप तथा तत्क्षण पापहर्त्ता हैं। आप विभु हैं। सबकी आर्त्ति के नाशक, स्थितिकारक तथा करुणा करने में समर्थ हैं।।१८-२०।।
दयाशक्तिः क्षमावासः सघृणिर्घृणिमूर्त्तिमान् ।
त्वं देव सृष्टिसंहारस्थितिरूपः सुराधिपः ॥२१॥
बकः शोषो वृको दाहस्तुषारो दहनात्मकः ।
प्रणतार्त्तिहरो योगी योगमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥२२॥
त्वं देव हृदयानन्द शिरोरत्नप्रभामणिः ।
बोधकः पाठको ध्यायी ग्राहको ग्रहणात्मकः ॥२३॥
त्वं देव नियमो न्यायी नायको न्यायवर्द्धनः ।
अनित्यो नियतो नित्यो न्यायमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥२४॥
त्वं देव त्रायसे प्राप्तान् पालयस्यर्णवस्थितान् ।
ऊर्ध्वं त्राणार्दितांल्लोकांल्लोकचक्षुर्नमोऽस्तु ते ॥२५॥
आप दया, शक्ति तथा क्षमा के आश्रय हैं। कृपा तथा करुणा की मूर्ति हैं। हे देव! आप सृष्टि-संहार तथा स्थितिरूप हैं। आप समस्त देवताओं के अधिपति हैं। आप बकरूप हैं, पोषक हैं, वृकस्वरूप, दाहक, तुषार तथा दहनात्मक हैं। प्रणतजनों की आर्ति का
त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २२९
हरण करने वाले आप योगी हैं। हे योगमूर्तिरूप! आपको नमस्कार है। हे देव! आप हृदयानन्द-दायक हैं, मस्तक के रत्नरूप प्रभामणि हैं। आप ही बुद्धि देने वाले, पाठक, ध्यानकारक, ग्राहक तथा ग्रहणरूप भी हैं।
हे देव! आप नियम, न्यायनिष्ठ, न्यायप्रवर्त्तक तथा न्यायवर्द्धक हैं। अनित्य होते हुये भी सदा नित्यरूप, न्यायमूर्त्ति हैं। आपको नमस्कार है। हे देव! आप प्रपन्न का त्राण करते रहते हैं। समुद्रस्थित जनों का पालन करते हैं और उन्हें कष्टदायक लोकों से उठाकर ऊर्ध्व में ले जाते हैं। आप लोकचक्षु हैं, आपको नमस्कार है।।२१-२५।।
दमनोऽसि त्वं दुर्दान्तः साध्यानां चैव साधकः।
बन्धुस्त्वं बन्धुहीनानां नमस्ते बन्धुरूपिणे ॥२६॥
कुरु शान्तिं दयावास! प्रसीद जगतः पते।
यदस्माभिरिहितं वाक्यमभीष्टं कीर्त्तितं प्रभो ॥२७॥
आप दमनकारी तथा दुर्दान्त हैं। साध्य के साधक एवं बन्धुहीन के बन्धुस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। हे दयाश्रय! आप शान्तिविधान करें। हे जगत् के पालक! प्रसन्न हो जाईये। हे प्रभु! हमने हितकारी अभीष्ट वाक्य कहा है।।२६-२७।।
एवं श्रुत्वा ततः सर्वे पप्रच्छुः प्रतिमां रवेः।
केनेयं निर्मिता मूर्त्तिः केन त्वं प्रतिपादितः।
कस्मादिहागतो देव संशयोऽत्र नियच्छ नः ॥२८॥
इस प्रकार सुनकर सबने तब सूर्यप्रतिमा से जिज्ञासा किया—किसने इस मूर्ति का निर्माण किया? किसने आपको प्रतिपन्न किया? किसलिये आप यहाँ आये? हे देव! हमारा सन्देह दूर करिये।।२८।।
देव उवाच
तस्मिन् काले समादेशान्निर्मिता विश्वकर्मणा।
सर्वलोकहितार्थाय ससुरैरर्चिता पुरा ॥२९॥
तस्मिन् हिमवतः पृष्ठे कल्पवृक्षे निधापिता।
तस्मात्तु चन्द्रभागायां प्रविष्टा स्थानकारणात् ॥३०॥
चन्द्रभागात्तु वैपाशं वैपाशाच्च शतद्रवम्।
शतद्रवाच्च विजेया प्रविष्टा यमुनां नदीम् ॥३१॥
यमुनातो जाह्नवीं च तयानीता शनैः शनैः।
भागीरथीतो विजेया मोदगङ्गा महानदी ॥३२॥
ममैवानुग्रहेणासौ तीर्थानां प्रवरः स्मृतः।
तस्माद्वै मोदगङ्गायाः प्रविष्टा लवणोदधिम् ॥३३॥
साम्प्रतं च प्रवर्त्तध्वं स्थापनं मे मनूत्तमाः।
२३० श्रीसाम्बपुराणम्
सूर्यदेव कहते हैं—एक बार समस्त लोकों के हितार्थ आदेश पाकर विश्वकर्मा ने इस मूर्त्ति का निर्माण किया है। पूर्वकाल में देवताओं के साथ विश्वकर्मा ने इस मूर्ति का अर्चन किया था। तब हिमालय के पृष्ठदेश में कल्पवृक्ष की स्थापना की थी। वहाँ से स्थान के लिये चन्द्रभागा में प्रविष्ट हुये थे (मूर्त्ति प्रविष्ट हुई थी)। चन्द्रभागा से वैपाश में, वैपाश से शतद्रु में एवं वहाँ से यमुना नदी में प्रविष्ट जानना चाहिये। यमुना से धीरे-धीरे जाह्नवी में आयी। वहाँ से महानदी मोदगंगा में, तदनन्तर मोदगंगा से लवणसमुद्र में मूर्त्ति प्रविष्ट हो गयी। हे मनुष्यश्रेष्ठ! अब मुझे स्थापित करने का कार्य करो।।२९-३३।।
श्रुत्वा देवास्तु तद्वाक्यं निर्मलं प्रीतिवर्द्धनम् ॥३४॥
प्राञ्जलिप्रणता भूताः स्तूयमाना रविस्थिता।
ततो वैवस्वतः प्राज्ञः सर्वधर्मप्रणोदितः ॥३५॥
कारयामास विप्रान्तु विदुर्दैवालयं शुभम्।
स्थापयित्वा रविं भक्त्या त्रिःस्थानेषु सुरोत्तमाः ॥३६॥
निवृत्तिं याति सुकृतो देवकार्यार्थतत्पराः।
सर्वे दीक्षापरा भूत्वा भास्कराद् विधिकाङ्क्षिणः ॥३७॥
देवगण उनकी निर्मल प्रीतिवर्द्धक वाणी सुनकर अञ्जलिबद्ध मुद्रा में प्रणत होकर भगवान् सूर्य की स्तुति करने लगे। तब समस्त धर्मों के प्रेरक वैवस्वत ने ब्राह्मणों द्वारा सूर्य का शुभ देवालय प्रस्तुत कराया। उत्तम देवगणों ने तीन स्थानों पर (सूर्य की तीन मूर्त्ति थी) भक्तिपूर्वक सूर्य को स्थापित करके निवृत्ति प्राप्त की। तदनन्तर देवकार्य में तत्पर उन लोगों ने दीक्षा ग्रहण करके सूर्यदेव से विधि एवं नियम जानने की इच्छा व्यक्त की।।३४-३७।।
यतोऽधिमण्डलं कुर्युस्तद्गतैरन्तरात्मभिः।
लिखितं मण्डलं दिव्यं यथोक्तं भास्करेण तु ॥३८॥
यथाविधि समुद्दिष्टं क्रियां सौरिसमाश्रिताम्।
विश्वकर्माभ्यनुज्ञाय सवर्णां मूर्द्धजाः प्रजाः ॥३९॥
ततो नाम प्रकुर्वन्ति सम्प्रहृष्टतनूरूहाः।
अनेन मुण्डिताः सर्वे तेन मुण्डित उच्यते ॥४०॥
उन्होंने अन्तःकरण के तद्गत भाव से अधिमण्डल की भावना किया (बनाया)। तदनन्तर भास्कर द्वारा कथित दिव्य मण्डल अंकित किया। विश्वकर्मा की अनुमति से सूर्य से सम्बन्धित यथाविधि क्रिया सम्पन्न की। सबके ऊपर प्रजा थी अर्थात् सबसे पहले प्रजा (उपस्थित लोग) का प्रसङ्ग लिया गया। तत्पश्चात् हृष्ट तथा रोमाञ्चित होकर प्रजागण का नामकरण किया गया। सबने मुण्डन कराया था, इसलिये उन्हें 'मुण्डित' कहा गया।।३८-४०।।
त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २३१
अथ कृतार्थसंज्ञाश्च निगमज्ञैरुदाहृताः ।
मुडि प्रमर्दने धातुः संज्ञायां च विधीयते ।
प्रकर्षाद्दर्द्येद्येन तेन मुण्डीर उच्यते ॥४१॥
शास्त्रज्ञों द्वारा इनका नाम यथार्थ संज्ञा वाला हो गया। प्रदर्शन अर्थ में 'मुडि' धातु का संज्ञार्थ में प्रयोग होता है। जहाँ सम्यक् रूप से अर्दन किया गया हो, वह 'मुण्डित' होता है।।४१।।
वशिष्ठ उवाच
एवमाद्यमिदं स्थानं कीर्त्यते च युगे युगे।
सर्वपापहरं पुण्यं सर्वतीर्थमयं शुभम् ॥४२॥
ये तु केचिन्नराः लोके भक्तियुक्तात्तिर्वेदकाः ।
तस्मिन् यन्त्रे समापन्नाः सद्यो मुञ्चन्ति वर्तिताः ॥४३॥
केचित्तत्र महामोहादस्मिंस्तीर्थे विबुद्धयः ।
न तेषां सम्पदां स्थैर्यं यदि प्राप्तुं सुदुष्करम् ॥४४॥
वशिष्ठ देव कहते हैं—इस प्रकार से इस आदि स्थान का युग-युग में वर्णन किया गया है। यह समस्त पापों का हरण करने वाला है। पुण्यप्रद, शुभ तथा समस्त तीर्थमय है। जो कोई भी पृथ्वी का व्यक्ति भक्तियुक्त तथा आर्त स्थिति में इस सूर्ययन्त्र के पास आयेगा, वह सदा मुक्त हो जायेगा। यदि कोई ज्ञानी इस तीर्थ के सम्बन्ध में मोहग्रस्त हो जाता है, तब सुदुष्कर सम्पत्तिवान होने पर भी उसकी (सम्पत्ति में) स्थिरता नहीं रहती।।४२-४४।।
यावत् प्रतपते भानुर्यावच्च लवणोदधिः ।
यावद् भूमिधरा देवास्तावत् कीर्त्तिर्विभावसोः ॥४५॥
ये च पापसमायुक्ता जायन्ते भुवि मानवाः ।
तेषामेव रविस्त्राता ये तत्क्षेत्रसमाश्रिताः ॥४६॥
एवंविधो ह्ययं सूर्यः सदा कार्यों विजानता ।
देवः कीर्त्तिधनाकाङ्क्षी किं पुनर्भूवि मानवाः ॥४७॥
जब तक सूर्य अपनी किरणें प्रसारित करते रहेंगे, जब तक यह लवण समुद्र रहेगा। जब तक पर्वत तथा देवगण रहेंगे, तब तक सूर्य की कीर्ति स्थायी रहेगी। इस पृथ्वी पर जो समस्त मनुष्य पापयुक्त होकर जन्म लेते हैं, उनके सूर्य ही त्राणकर्त्ता हैं। यदि वे मनुष्य उनके स्थान का आश्रय लेते हैं, तब सूर्य उनका त्राण करते हैं। ऐसे प्रभाव से युक्त ये सूर्य हैं। यह सब जानकर सदैव उनकी सेवा करना ही उचित है। उनसे ही देवता भी कीर्ति तथा धन की आकांक्षा करते हैं, पृथ्वी के मनुष्य की तो बात ही क्या है।।४५-४७।।
२३२ श्रीसाम्बपुराणम्
एतत्स्थानं सुरेशस्य सर्व्वैर्देवैरधिष्ठितम्।
शान्तिं पुष्टिं सुखं कामं सर्व्वभूतार्त्तिनाशनम्॥४८॥
यह स्थान देवेश सूर्यदेव का है। यहाँ सभी देवता अधिष्ठित हैं। शान्ति, पुष्टि, सुख, कामप्रदायक तथा समस्त प्राणियों की आर्त्ति का नाशक यह स्थान है॥४८॥
एतदेव हि सा कीर्त्तिः कीर्त्तिता मुनिभिः पुरा।
अत्र पश्यन्ति ये भानुमुद्यन्तं मूर्त्तिसंस्थितम्॥४९॥
तारयन्ति नराः पूता आत्मानं गोलवर्द्धनम्।
यां यां क्रियां समारभे सूर्यक्षेत्रेषु मानवः॥५०॥
तां तां सिद्धिमवाप्नोति इह लोके परत्र च।
जम्बूद्वीपो महाद्वीपः कर्मभूमिरनुत्तमः॥५१॥
यत्रेयमीदृशी कीर्त्तिर्देवेनैव प्रकीर्त्तिता।
यत्र पश्येत् सहस्त्रांशुमित्यसौ शोध्यते जनैः॥५२॥
सूर्य की इस प्रकार की कीर्त्ति की बात का मुनिगण पुराकाल से कीर्त्तन करते हैं। यहाँ मूर्त्तिस्थित उदीयमान सूर्य को जो देखते हैं, वे पवित्र लोग अपने वंश का तथा लोक का उद्धार करते हैं। लोग सूर्यक्षेत्र में जिस-जिस कार्य को प्रारम्भ करते हैं, इहलोक तथा परलोक में उनको वही-वही सिद्धि प्राप्त होती है। जम्बूद्वीप महाद्वीप है। यह श्रेष्ठ कर्मभूमि है। यहाँ सूर्यदेव ने ऐसी कीर्त्ति स्थापित की है कि यहाँ जो सहस्त्रांशु सूर्य का दर्शन करेंगे, वे शुद्ध हो जायेंगे॥४९-५२॥
एका मूर्त्तिर्द्विधा कृत्वा भूतलेष्ववतारिता।
प्रत्यूषे चैव मुण्डीरं ये पश्यन्ति नराः सकृत्॥५३॥
न कदाचिद् भयं शोको रोगस्तेषां प्रपद्यते।
कालहृत् कालप्रीत्या च मध्याह्ने ये त्ववेक्षकाः।
तेषामेव सुखोदर्को ह्यचिरेणैव जायते॥५४॥
साम्बकृतपुरे भानुः सायाह्ने यैरुदीक्षितः।
सद्यः सम्पद्यते तेषां धर्मकामार्थसाधनम्॥५५॥
एक ही मूर्त्ति पृथ्वी पर दो भाग में अवतीर्ण है। प्रत्यूष काल में जो मुण्डीर (सूर्य) को देखते हैं, उन्हें शोक तथा रोग नहीं होता। काल की प्रीति में जो मध्याह्न में कल्याणकारी सूर्य को देखते हैं, उन्हें अतिशीघ्र सुख मिलता है। साम्ब द्वारा निर्मित नगरी में जो सन्ध्याकाल में सूर्य का दर्शन करते हैं, उनको तत्क्षण धर्म, अर्थ तथा काम का साधन प्राप्त हो जाता है॥५३-५५॥
त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २३३
एवं युक्तिं समाधाय सर्वधर्मपरायणाः।
कीर्त्तयित्वा रवेः कीर्त्तिर्जग्मुः सूर्यालयं प्रति॥५६॥
प्रजापतीनामिदमालयं रवेर्विधायितं देववरानुकम्पितम्।
विघातकास्तत्र पतन्त्यसाधवो वह्नेः शिखायां शलभा इव क्षणात्॥५७॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यस्तुतिर्भक्तमाहात्म्यं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः
●
ऐसा स्थिर निश्चय करके सभी धर्मपरायण लोग सूर्य की कीर्त्ति-कथा का गान करते हुये सूर्यालय में गये। प्रजापतियों द्वारा निर्धारित सूर्य का यह मन्दिर देवश्रेष्ठ सूर्यदेव से अनुकम्पित है। इसके विघ्नकारी असाधुगण अग्निशिखा में पड़ते जा रहे पतङ्गों के समान तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं॥५६-५७॥
श्री साम्बपुराणोक्त सूर्यस्तुति तथा भक्तमाहात्म्यनामक तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त
●
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(आचारलक्षणम्)
वशिष्ठ उवाच
स जयति सुरपतिनाथः करनिकरविनिहतसकलकलिः ।
शाश्वतममलनयनमखिलभुवनभवनप्रदीपो रविः ॥१॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—सुरपतिपालक सूर्यदेव की जय हो, जिनका रश्मिजाल समस्त पापों का विनाशक है। वे शाश्वत, निर्मल नयन हैं, जो निखिल भुवनरूप भवन के प्रदीपरूप हैं अर्थात् अपनी किरणों से समस्त भुवन को आलोकित करते हैं।।१।।
साम्ब उवाच
आचारः परमो धर्म इति धर्मविदोऽवदन् ।
आचाराद्वर्धते ह्यायुर्ह्याचारो हन्त्यलक्षणम् ॥२॥
आचारात् सुखभागी स्यादाचाराच्छ्रियमश्नुते ।
अतस्तमहमाचारं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥३॥
आदित्यभक्तः पुरुषः कीदृगाचारमाचरेत् ।
देवस्य प्रियतामेति श्रियमायुश्च विन्दति ॥४॥
साम्ब कहते हैं—आचार श्रेष्ठ धर्म है, यह धर्मज्ञ लोगों का कथन है। आचार से आयु बढ़ती है, आचार ही अशुभ का नाश करता है। प्राणी आचार के फल से सुखभागी हो जाते हैं। इससे ऐश्वर्य-भोग करते हैं। इसलिये तत्त्वतः आचार को सुनने की इच्छा है। आदित्यभक्त किस प्रकार के आचार का अनुष्ठान करके सूर्यदेव को प्रिय होकर ऐश्वर्य तथा आयु प्राप्त करते हैं?।।२-४।।
नारद उवाच
अत्र ते संप्रवक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
आयुर्लक्ष्मीर्यशो हेतुः सूत्रमाचरणस्य यत् ॥५॥
नारद कहते हैं—तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, मैं उसे तुमको सम्यक् रूप से बतलाता हूँ। जो आयु, धन-सम्पत्ति तथा यश का कारण है, उस आचरण के सूत्र (लक्षण) को कहता हूँ।।५।।
नास्तिकेनाश्रद्दधानेन गुरुणा शास्त्रलङ्घिना ।
भिन्नमर्यादसङ्कीर्ण मैथुने न भवितव्यम् ॥६॥