भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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२२२ श्रीसाम्बपुराणम्

उन सबने अल्प काल में ही लवण समुद्र में पहुँचकर लवणोदधि पर आश्रित रम्य तपोवन को देखा। वह नाना पुष्प तथा फलों से शोभित एवं देव-गन्धर्वादि से सेवित था। वहाँ ऋषिगण सब समय क्रम का त्याग करके सेवारत थे॥७-८॥

अपरो रविलोकस्तु सादृश्यात् कीर्तितो भुवि ।
सर्वे ते हर्षमापन्ना दृष्ट्वा रम्यं तपोवनम् ॥९॥
रमणं सर्वकार्येषु सर्वभूतोपकारकम् ।
सर्वप्राणिसुखावासं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥१०॥

सादृश्य के कारण वह पृथ्वी का अपर सूर्यलोक कहलाता था। सभी उस रम्य तपोवन को देखकर प्रसन्न हो गये। वह तपोवन समस्त कार्य के लिये रमणीय था। समस्त प्राणियों का उपकारक तथा सुख की आवासभूमि था। इसका निर्माण विश्वकर्मा ने किया था॥९-१०॥

वशिष्ठ उवाच

नारदोऽप्यथ शास्त्रं तत् सदा पठति बुद्धिमान् ।
साधु साम्ब महाभाग भक्तिमानसि यादव ॥११॥
येनेयमीदृशी या तु कृता त्वर्चा सनातनी ।
त्वत्प्रसादेन सावित्र्यं यत्पश्यामस्तपोवनम् ॥१२॥

वशिष्ठदेव कहते हैं—बुद्धिमान् नारद भी इस शास्त्र को सर्वदा कहते रहते हैं। महाभाग यादव साम्ब! साधु, तुम भक्तिमान् हो। तुमने ऐसी सनातन प्रतिमा स्थापित की है। तुम्हारी कृपा से ही मैंने सूर्य का तपोवन देखा॥११-१२॥

श्रुत्वा तं निर्मलं वाक्यं साम्बः परमधर्मवान् ।
प्रणिधाय शिरो भूमौ देवं विज्ञापयत्ततः ॥१३॥

परम धार्मिक साम्ब ने इस निर्मल बात को सुनकर भूमि पर मस्तक अवनत करके देव से इस प्रकार प्रार्थना किया॥१३॥

यत्त्वयोदाहृतं पूर्वं सान्निध्यं स्थानमुत्तमम् ।
ममैवानुग्रहाद्देव पूजानुग्रहकारिणा ॥१४॥
अस्ति मे कृपया किञ्चिद् वद सौम्य विभावसो ।
क्षीणगात्रेन्द्रियप्राणो गिरा चाप्यतिमन्दया ॥१५॥

हे सौम्य! मेरे प्रति कृपा करके देवपूजा के अनुग्रहकारी आपने जिस उत्तम स्थान की बात बतलायी थी, मेरे प्रति करुणा करके हे विभावसु (सूर्य)! कुछ कृपा करिये तथा उपदेश दीजिये। मेरे शरीर-प्राण-इन्द्रियादि अत्यन्त क्षीण हैं एवं वाणी भी अत्यन्त मन्द है॥१४-१५॥