साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 231, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(यात्रानियमः)
वशिष्ठ उवाच
कृत्वा देवगृहं साम्ब ह्यानयित्वा तु याजकान्।
आजगामाथ धर्मात्मा यत्र सन्निहितो रविः ॥१॥
एते मित्रवनं श्रुत्वा देवमानुषपन्नगाः।
ऋषयः सिद्धविद्याद्या गन्धर्वोरगगुह्यकाः ॥२॥
दिक्पाला लोकपालाश्च गुह्याक्षाश्च धार्मिकाः।
सप्रजापतयः सर्वे गन्तुं प्रत्युपचक्रमुः ॥३॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—धर्मात्मा साम्ब ने देवमन्दिर तैयार करवाकर तथा याजकों को लाकर वहाँ आये, जहाँ सूर्यदेव (प्रतिमारूपी) सन्निहित थे। मित्रवन की बात सुनकर देवता, मनुष्य, सर्पगण, ऋषिगण, सिद्ध-विद्याधरगण, गन्धर्व, उरग, गुह्यक, प्रजापति के साथ सभी धार्मिक लोग भी वहाँ आने लगे॥१-३॥
उपवासपराः केचित् केचिदात्मनि तत्पराः।
त्रिवृताध्वराः केचित् केचिज्जाप्यसमन्विताः ॥४॥
दारुपाकधराः केचित् केचित्सर्वार्थगामिनः।
अपरे नियताहारा निराहारास्तथा परे ॥५॥
त्यक्त्वा देहगतां चिन्तां रविध्यानपरायणाः।
मासपक्षोपवासेन केचिल्लङ्घनमात्मनि ॥६॥
उनमें से कोई-कोई उपवासी, कोई-कोई आत्मचिन्तन में विभोर, कोई वेदपथगामी तथा कोई-कोई जप-निरत थे। कोई काष्ठ धनुषधारी थे, कोई सर्वाभिलाषी थे, कोई-कोई संयत आहार करने वाले थे, कोई-कोई निराहारी थे। उन्होंने अपनी-अपनी देहगत चिन्ता का त्याग करके सूर्य के ध्यान में स्वयं को मग्न कर लिया था। किसी ने मास अथवा पक्षकाल उपवास के फल से आत्मा का भी लङ्घन कर लिया था॥४-६॥
अचिरेणैव कालेन संप्राप्य लवणोदधिम्।
दृष्ट्वा तपोवनं रम्यं लवणोदधिमाश्रितम् ॥७॥
नानापुष्पफलोपेतं देवगन्धर्वसेवितम्।
ऋषयः पर्युपासन्ते क्रमं हित्वा ततः सदा ॥८॥