साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २२३
ज्ञात्वा भक्त्यान्वितं साम्ब देवो वचनमब्रवीत्।
त्यज कीर्त्तिकृतां चिन्तां मत्स्थाने यदुनन्दन ॥१६॥
पूर्वदत्तं मया वाचा प्रसादं शृणु यादव।
अस्मिँल्लवणोदधेस्तीरे तापसाः पूर्वमानवाः ॥१७॥
मत्प्रसादं च काङ्क्षन्तः क्लिष्टान् वर्षशतान्बहून्।
तान् दृष्ट्वा तापसांस्तत्र कृपा मे विकृतां हृदि ॥१८॥
साम्ब की भक्ति देखकर देव (सूर्यदेव) कहते हैं—हे यदुनन्दन! मेरे पास आकर चिन्ताओं का परित्याग कर दो। हे यादव! मेरी पूर्वप्रदत्त प्रसन्नता की बात सुनो। लवण समुद्र के तीर पर प्राचीन अनेक तपस्वी मेरे अनुग्रह की आकांक्षा करके सैकड़ों-सैकड़ों वर्ष तक क्लेश का भोग करते हैं। उन तपस्वियों को देखकर मेरे मन में कृपा का उदय होता है॥१६-१८॥
ब्रूत वत्सा यथान्यायं पयो वर्चो बलं वनम्।
सत्यधर्म्मार्थयुक्तार्थान् प्रार्थयध्वमनुत्तमम् ॥१९॥
श्रुत्वा ते निर्मलं वाक्यं देववक्त्राद्विनिःसृतम्।
मानवा हर्षमापन्नाः संप्रहृष्टात्ममानसाः ॥२०॥
यदि प्रसन्नो भगवान् वरं दातुं समुद्यतः।
अविघ्नमस्तु नश्चैव त्वयि भक्तिर्विभावसौ ॥२१॥
हे वत्सगण! बोलो, न्यायपूर्ण दुग्ध, वर्च, बल, वन, सत्यधर्म के लिये प्रयोजनीय अतुलनीय वस्तु की प्रार्थना करो। सूर्यदेव के मुख से निकले निर्मल वाक्य सुनकर हर्षित चित्त से तापसगण आनन्दित होकर बोले—भगवन्! यदि प्रसन्न होकर वर देने के लिये आप उद्यत हो गये हैं, तो यह वर दें कि हमलोगों को कोई विघ्न न हो तथा आप सूर्यदेव में हमारी भक्ति बराबर बनी रहे॥१९-२१॥
एवमस्त्विति सोऽप्युक्त्वा भगवान्दिनकृद्विभुः।
अपरं प्रार्थयध्वं वै वरं वदत मानवाः ॥२२॥
भूयस्तुष्टास्तु ते साम्ब सर्वधर्मपरायणाः।
प्रार्थयन्ते परं श्रेष्ठं प्रहृष्टोत्फुल्ललोचनाः ॥२३॥
'वही हो' कहकर भगवान् विभु सूर्यदेव ने यह भी कहा—हे मानवगण! अन्य वर माँगो। हे साम्ब! समस्त धर्मपरायण लोगों ने तुष्ट होकर पुनः परम श्रेष्ठ वर की प्रार्थना की॥२२-२३॥
मुनय ऊचुः
यदि तुष्टो महातेजा वरं दातुं समुद्यतः।
त्वत्प्रसादेन देवेश स्रष्टारोऽस्य भवामहे ॥२४॥