साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २२९
हरण करने वाले आप योगी हैं। हे योगमूर्तिरूप! आपको नमस्कार है। हे देव! आप हृदयानन्द-दायक हैं, मस्तक के रत्नरूप प्रभामणि हैं। आप ही बुद्धि देने वाले, पाठक, ध्यानकारक, ग्राहक तथा ग्रहणरूप भी हैं।
हे देव! आप नियम, न्यायनिष्ठ, न्यायप्रवर्त्तक तथा न्यायवर्द्धक हैं। अनित्य होते हुये भी सदा नित्यरूप, न्यायमूर्त्ति हैं। आपको नमस्कार है। हे देव! आप प्रपन्न का त्राण करते रहते हैं। समुद्रस्थित जनों का पालन करते हैं और उन्हें कष्टदायक लोकों से उठाकर ऊर्ध्व में ले जाते हैं। आप लोकचक्षु हैं, आपको नमस्कार है।।२१-२५।।
दमनोऽसि त्वं दुर्दान्तः साध्यानां चैव साधकः।
बन्धुस्त्वं बन्धुहीनानां नमस्ते बन्धुरूपिणे ॥२६॥
कुरु शान्तिं दयावास! प्रसीद जगतः पते।
यदस्माभिरिहितं वाक्यमभीष्टं कीर्त्तितं प्रभो ॥२७॥
आप दमनकारी तथा दुर्दान्त हैं। साध्य के साधक एवं बन्धुहीन के बन्धुस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। हे दयाश्रय! आप शान्तिविधान करें। हे जगत् के पालक! प्रसन्न हो जाईये। हे प्रभु! हमने हितकारी अभीष्ट वाक्य कहा है।।२६-२७।।
एवं श्रुत्वा ततः सर्वे पप्रच्छुः प्रतिमां रवेः।
केनेयं निर्मिता मूर्त्तिः केन त्वं प्रतिपादितः।
कस्मादिहागतो देव संशयोऽत्र नियच्छ नः ॥२८॥
इस प्रकार सुनकर सबने तब सूर्यप्रतिमा से जिज्ञासा किया—किसने इस मूर्ति का निर्माण किया? किसने आपको प्रतिपन्न किया? किसलिये आप यहाँ आये? हे देव! हमारा सन्देह दूर करिये।।२८।।
देव उवाच
तस्मिन् काले समादेशान्निर्मिता विश्वकर्मणा।
सर्वलोकहितार्थाय ससुरैरर्चिता पुरा ॥२९॥
तस्मिन् हिमवतः पृष्ठे कल्पवृक्षे निधापिता।
तस्मात्तु चन्द्रभागायां प्रविष्टा स्थानकारणात् ॥३०॥
चन्द्रभागात्तु वैपाशं वैपाशाच्च शतद्रवम्।
शतद्रवाच्च विजेया प्रविष्टा यमुनां नदीम् ॥३१॥
यमुनातो जाह्नवीं च तयानीता शनैः शनैः।
भागीरथीतो विजेया मोदगङ्गा महानदी ॥३२॥
ममैवानुग्रहेणासौ तीर्थानां प्रवरः स्मृतः।
तस्माद्वै मोदगङ्गायाः प्रविष्टा लवणोदधिम् ॥३३॥
साम्प्रतं च प्रवर्त्तध्वं स्थापनं मे मनूत्तमाः।