साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२८ | श्रीसाम्बपुराणम्
हृष्टचित्त मनुगण उन्हें बाहुओं में उठाकर तपोवन में लाये एवं यथाविधान से उन्हें स्थापित करके सुसम्मत साङ्गोपाङ्ग विधि के साथ विचित्र स्तवन करने लगे। हे देव! आप प्रलय हैं। कालस्वरूप हैं। क्षमागुणान्वित हैं। रात्रि में अनल के समान हैं। आप सृष्टि-स्थितिकारक हैं। प्रजागण आपके अंगों से उत्पन्न हैं। आप शोषण (जलशोषण), वर्षण (शोषण के द्वारा वर्षण), हिम, घर्म, आनन्द, सुख तथा शीतलताकारक भी हैं। हे देव! आप ऋषियों के स्रष्टा हैं। आप ही पुरुष-प्रकृति तथा प्रभु हैं। आप ही छाया तथा संज्ञा (सूर्यपत्नीद्वय) की प्रतिष्ठा हैं। आप निरालम्ब तथा निराश्रय हैं।।१४-१७।।
आश्रयः सर्वभूतानां नमस्तेऽस्तु सदा मम।
त्वं देव सर्वतश्चक्षुः सर्वतः सर्वदा गतिः ॥१८॥
सर्वदः सर्वदा सर्वः सर्वसेव्यस्त्वमार्त्तिहा।
त्वं देव ध्यानिनां ध्यानं योगिनां योग उत्तमः ॥१९॥
त्वं भासा फलदः सर्वः सद्यः पापहरो विभुः ।
सर्वार्त्तिनाशं नोऽनाशीकरणं करुणाप्रभुः ॥२०॥
आप ही समस्त प्राणीगण के आश्रय हैं। आपके प्रति सर्वदा हम प्रणत रहें। हे देव! आप सर्वत्र देखते हैं। सर्वदा सभी ओर आपकी (अव्याहत) गति है। आप सर्वदा सबको सब कुछ देते हैं। आप सर्वस्वरूप हैं। सबके सेव्य तथा आर्तिनाशक हैं। हे देव! आप ध्यानीगण के ध्यान तथा योगीगण के उत्तम योग भी हैं। आप प्रकाशक, फल देने वाले, सर्वरूप तथा तत्क्षण पापहर्त्ता हैं। आप विभु हैं। सबकी आर्त्ति के नाशक, स्थितिकारक तथा करुणा करने में समर्थ हैं।।१८-२०।।
दयाशक्तिः क्षमावासः सघृणिर्घृणिमूर्त्तिमान् ।
त्वं देव सृष्टिसंहारस्थितिरूपः सुराधिपः ॥२१॥
बकः शोषो वृको दाहस्तुषारो दहनात्मकः ।
प्रणतार्त्तिहरो योगी योगमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥२२॥
त्वं देव हृदयानन्द शिरोरत्नप्रभामणिः ।
बोधकः पाठको ध्यायी ग्राहको ग्रहणात्मकः ॥२३॥
त्वं देव नियमो न्यायी नायको न्यायवर्द्धनः ।
अनित्यो नियतो नित्यो न्यायमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥२४॥
त्वं देव त्रायसे प्राप्तान् पालयस्यर्णवस्थितान् ।
ऊर्ध्वं त्राणार्दितांल्लोकांल्लोकचक्षुर्नमोऽस्तु ते ॥२५॥
आप दया, शक्ति तथा क्षमा के आश्रय हैं। कृपा तथा करुणा की मूर्ति हैं। हे देव! आप सृष्टि-संहार तथा स्थितिरूप हैं। आप समस्त देवताओं के अधिपति हैं। आप बकरूप हैं, पोषक हैं, वृकस्वरूप, दाहक, तुषार तथा दहनात्मक हैं। प्रणतजनों की आर्ति का