साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २२७
उनके शरीर, इन्द्रियाँ तथा प्राण शीर्ण हो गये थे। वे देवता (सूर्य) की आराधना में लगे थे। जागरण से थके, क्लान्त, आर्त्त तथा पथ चलने से प्रपीड़ित थे। सूर्यदेव की कृपाकांक्षार्थ वहाँ सभी स्तवन कर रहे थे।।७।।
ततः प्रभातसमये पद्मरागारुणप्रभे ॥८॥
विमला भूर्दिशः सर्वाः किरणोद्योतने रवेः।
स्तूयमानाः स्थिताः सर्वे भास्करोदयकाङ्क्षिणः ॥९॥
तदनन्तर पद्मराग के समान अरुणवर्ण प्रभात में पृथ्वी तथा समस्त दिशायें उदीयमान सूर्य-किरणों से निर्मल हो गयीं और सूर्यदेव के उदय की अपेक्षा में सभी स्तव करने लगे।।८-९।।
रविरागारुणीभूतसागराकाशभूतलम् ।
तत्क्षणेनैव सर्वांसामैकज्वालात्वमागताः ॥१०॥
तस्यामुदयवेलायां विवस्वद्धयैकमास्पदम्।
वीक्ष्यमाणाद्भुतं रूपं विराजन्तं दिवाकरम् ॥११॥
दिविस्थं सागरस्थं च द्विविधं मण्डलोद्यतम्।
अपरा भगवन्मूर्तिर्जलमध्ये विराजते ॥१२॥
पूर्वेदित रविकिरणों के अरुण वर्ण से सागर-आकाश-भूतल में मानो सूर्यरश्मि की ज्वाला आ पड़ी। उस उदयकाल में सूर्य ही एकमात्र अवलम्बन थे। अपूर्व रूप में विराजित सूर्यदेव की मूर्त्ति (आकृति) परिलक्षित होने लगी। आकाश तथा सागर में दो मण्डल देखे गये और एक अन्य भगवद् मूर्त्ति (सूर्यदेव की मूर्त्ति) जल में भी विराजित दिखाई देने लगी।।१०-१२।।
सर्वे विस्मयमापन्ना दृष्ट्वा चाद्भुतदर्शनम्।
मनवो बाहुसंवाहैरवतीर्णा महोदधिम् ॥१३॥
इस अलौकिक दर्शन को देखकर सभी विस्मित हो गये। तभी मनुगण बाँहें फैलाये महासमुद्र में अवतीर्ण हो गये।।१३।।
बाहुभिः संगृहीत्वा तु ह्यानयित्वा तपोवनम्।
स्थापयित्वा विधानेन मनवे हृष्टमानसाः ॥१४॥
स्तोत्रैः स्तुवन्ति ते चित्रैः साङ्गोपाङ्गैः सुसम्मितैः।
त्वं देव प्रलयः कालः क्षयः क्षान्तः क्षपानलः ॥१५॥
उद्भवः स्थितिसम्पत्तिः प्रजास्ते चाङ्गसम्भवाः।
सोषवर्षहिमं घर्मप्रह्लादं सुखशीतलम् ॥१६॥
त्वं देव ऋषिकर्त्ता च प्रकृतिः पुरुषः प्रभुः।
छाया संज्ञा प्रतिष्ठापि निरालम्बो निराश्रयः ॥१७॥