भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

(सूर्यस्तुतिः भक्तमाहात्म्यञ्च)

वसिष्ठ उवाच
तस्मिंस्तपोवने देशे तीरे तु लवणोदधेः ।
तिष्ठन्ति ये च सम्प्राप्ता देवदर्शनकाङ्क्षिणः ॥१॥
केचिद् ध्यायन्ति पूतात्मा केचित्तद्गतमानसाः ।
यजन्ति हव्यसम्पन्नाश्चिन्तयन्त्यात्मतत्पराः ॥२॥
गायन्ति सिद्धगन्धर्वा नृत्यन्त्यप्सरसांवराः ।
वीणाहस्ताश्च ये केचिदर्घहस्तास्तथापरे ॥३॥

वशिष्ठदेव कहते हैं—लवणसमुद्र के तीर पर तपोवन देश में देवदर्शन की इच्छा से जो स्थित थे, उनमें पूतचित्त होकर कोई ध्यान कर रहा था, कोई तद्गत चित्त होकर स्थित था, कोई हव्यादि यज्ञ में रत था तो कोई आत्मनिष्ठा-चिन्तन में लीन था। सिद्ध तथा देवगण गायन कर रहे थे, श्रेष्ठ अप्सरायें नृत्यरत थीं। उनमें किसी के हाथों में वीणा थी तो कोई अर्घ्य हस्त (अर्घ्य प्रदान) था॥१-३॥

कृताञ्जलिपुटाः केचित् केचिदानतमस्तकाः ।
योगिनो योगचित्ताश्च मुनयो यतमानसाः ॥४॥
ऋषयः क्षान्तिसंयुक्ता देवाः स्तुन्वन्ति भास्करम् ।
यातुधानास्तथा यक्षाः सिद्धाश्चैव महोरगाः ॥५॥
दिक्पाला लोकपालाश्च ये च विघ्नविनायकाः ।
सर्वे भक्तिपरा भूत्वा तिष्ठन्ति सूर्यकानने ॥६॥

कोई अञ्जलियुक्त था, किसी ने मस्तक झुका रखा था। योगचित्त योगीगण, यतमानस मुनिगण, क्षमान्वित ऋषिगण तथा देवगण भास्कर की स्तुति कर रहे थे। ऐसे ही यातुधान, यक्ष, सिद्ध, महासर्पगण, दिक्पालगण तथा विघ्ननाशक लोकपालगण भक्तितत्पर होकर सूर्यवन में स्थित थे॥४-६॥

क्षीणगात्रेन्द्रियप्राणा देवाराधनतत्पराः ।
जागरार्त्तिपराः क्लिष्टा अध्वभिः परिपीडिताः ॥७॥
स्तूयमानाः स्थिताः सर्वे भास्करोदयकाङ्क्षिणः ।