भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २२५

नारद उवाच एकोनविंशतिः शून्यै रूपैरेकावसानकैः ।
एतैः प्रमाणैर्वषाणां गण्डको ब्रह्मणः स्मृतः ॥३२॥
गण्डानां शतसाहस्रैर्मनुरेकः प्रकीर्त्तितः ।
याम्येन च पुरा कुर्यात्ततः स्वारोचिषेण च ॥३३॥
तृतीये मन्वन्तरे देवश्चतुर्थे कीर्त्तितो मनुः ।
पञ्चमे मन्वन्तरे सत्यः षष्ठे ऋतुश्च कीर्त्तिमान् ॥३४॥
सप्तमे सनत्कुमारस्तु कीर्त्तितं भुवनं रवेः ।
वैवस्वतेन मनुना वर्त्तमानेन कीर्त्तितम् ॥३५॥
अत ऊर्ध्वं भवेच्छम्भुः शम्भोरूर्ध्वं महानसः ।
महानसाद्वशिष्ठश्च ततः कल्पः समाप्यते ॥३६॥
इति श्रीशाम्बपुराणे यात्रानियमो नाम द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

नारद कहते हैं—उन्नीस शून्य रूप १९ प्रमाण वर्ष को ब्रह्मा का गण्डक कहते हैं। शतसहस्र गण्डक को एक मनु का काल कहते हैं। प्रथम है—याम्य मन्वतर एवं द्वितीय है—स्वारोचिष। इसी प्रकार तृतीय है—सूर्यदेव एवं चतुर्थ मन्वन्तर है—मनु। पञ्चम मन्वन्तर है—सत्य एवं षष्ठ है—कीर्तिमान केतु। सनत्कुमार को रवि का भुवन कहा गया है। वर्तमान में वैवस्वत मनु का काल है। इसके पश्चात् होगा शम्भु, तदनन्तर महानस, तत्पश्चात् होगा वशिष्ठ। तदनन्तर कल्प समाप्त हो जाता है।।३२-३६।।

श्री साम्बपुराणोक्त यात्रानियम नामक बयालीसवाँ अध्याय समाप्त

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