साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(आचारलक्षणम्)
वशिष्ठ उवाच
स जयति सुरपतिनाथः करनिकरविनिहतसकलकलिः ।
शाश्वतममलनयनमखिलभुवनभवनप्रदीपो रविः ॥१॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—सुरपतिपालक सूर्यदेव की जय हो, जिनका रश्मिजाल समस्त पापों का विनाशक है। वे शाश्वत, निर्मल नयन हैं, जो निखिल भुवनरूप भवन के प्रदीपरूप हैं अर्थात् अपनी किरणों से समस्त भुवन को आलोकित करते हैं।।१।।
साम्ब उवाच
आचारः परमो धर्म इति धर्मविदोऽवदन् ।
आचाराद्वर्धते ह्यायुर्ह्याचारो हन्त्यलक्षणम् ॥२॥
आचारात् सुखभागी स्यादाचाराच्छ्रियमश्नुते ।
अतस्तमहमाचारं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥३॥
आदित्यभक्तः पुरुषः कीदृगाचारमाचरेत् ।
देवस्य प्रियतामेति श्रियमायुश्च विन्दति ॥४॥
साम्ब कहते हैं—आचार श्रेष्ठ धर्म है, यह धर्मज्ञ लोगों का कथन है। आचार से आयु बढ़ती है, आचार ही अशुभ का नाश करता है। प्राणी आचार के फल से सुखभागी हो जाते हैं। इससे ऐश्वर्य-भोग करते हैं। इसलिये तत्त्वतः आचार को सुनने की इच्छा है। आदित्यभक्त किस प्रकार के आचार का अनुष्ठान करके सूर्यदेव को प्रिय होकर ऐश्वर्य तथा आयु प्राप्त करते हैं?।।२-४।।
नारद उवाच
अत्र ते संप्रवक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
आयुर्लक्ष्मीर्यशो हेतुः सूत्रमाचरणस्य यत् ॥५॥
नारद कहते हैं—तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, मैं उसे तुमको सम्यक् रूप से बतलाता हूँ। जो आयु, धन-सम्पत्ति तथा यश का कारण है, उस आचरण के सूत्र (लक्षण) को कहता हूँ।।५।।
नास्तिकेनाश्रद्दधानेन गुरुणा शास्त्रलङ्घिना ।
भिन्नमर्यादसङ्कीर्ण मैथुने न भवितव्यम् ॥६॥