साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २३५
नास्तिक, अश्रद्धाशील होना, गुरु तथा शास्त्रवाक्य का लङ्घन करने का कार्य करना, अवैध मैथुन में प्रवृत्त होना उचित नहीं है।।६।।
अतः अक्रोधेन सत्यवादिना भूतानामहिंसकेनानसूयुनाशुचिनाऽजिह्येनानालस्येन भवितव्यम्। अतोऽङ्गमर्दिना तृणच्छेदिना नखशोधिना नित्योच्छिष्टेनाऽशङ्कमनसा सुकेशोनाभाव्यम्।
ब्राह्मे मुहूर्त्त उत्थाय धर्मार्थसाधुचिन्तकः।
आचम्य सन्ध्यां वन्देत पूर्वा च पश्चिमां तथा ॥
आदित्यमुद्यन्तमस्तं यान्तं वारिस्थमहमर्धमथ्मुपसृष्टं च नेक्षेत। परदारा न गन्तव्याः। केशप्रसाधनदन्तधावनान्यदेवतापूजनानि मध्याह्ने न कुर्वीत। मूत्रपुरीषे नाधितिष्ठेन्न पश्येच्च उदक्यया न प्रभाषेत। ग्रामसमीपे कृष्टक्षेत्रे न च पुरीषयेत्। विण्मूत्रे नाप्सु कुर्यात्। न भस्मनि मग्नो व्रजेन्न वास्थिनि। न प्राङ्मुखो न च कुत्सितमन्नमश्नीयात्। भुक्त्वाग्निमालम्भयेन्न सर्वप्राणान् स्पृशेत्। तुषकेशभस्मकार्पासास्थिउद्वर्त्तनावरक्तास्वेदादीनाधितिष्ठेत।
शान्तिहोमादीनि पवित्राणि कारयेत्। न सुप्तं गच्छन्तं स्थविरं प्रत्युत्थापयेत् न सुप्तं गच्छन्तं वा उपस्थापयेत्। आर्द्रार्नाईपादौ भोजनशयने। न वाग्निब्राह्मणोच्छिष्ठमालभेत्। न पश्येच्च सूर्याचन्द्रमसौ, नक्षत्राणि च न पश्येत्। आगच्छन्तं स्थविरं प्रत्युत्थायाभिवाद्यासनं दद्यात्। गच्छन्तं पृष्ठतोऽनुयायात्। भिन्नकांस्यासनं वर्जयेत्। नैकवस्त्रो भुञ्जीत न नग्नः स्नायाच्छयीत। नोच्छिष्टः स्पृशेच्छिरः। शिरसि केशप्रहरणं परिहरेत्। न पाणिद्वयेन शिरः कण्डूयेत्। नाभीक्ष्णं शिरसा स्नायात्। न द्विः स्नायाच्च। शिरः स्नातस्तैलेनाङ्गं न किञ्चित्स्पृशेत्। घृतं मधुसमं विषम्। मुद्गतिलान् भ्रष्टान्राश्नीयात्। उच्छिष्टो नाधीयात्। न वाध्यापयेत्, पूतिगन्धवातेन च।
अत्र गाथा यमेन गीता—
आयुरस्य निकृन्तति प्रजा नास्या भवेत्तथा।
य उच्छिष्टः प्रपठति स्वाध्यायं चाधिगच्छति ॥
सूर्यानिलानलसोमोदकगोद्विजनक्षत्राभिमुखः पथि च न मेहेत्। दिवा संध्या-सूदङ्मुखो दक्षिणामुखो रात्रौ तृणान्तर्हितभूमौ अवगुण्ठ्य नीवीविण्मूत्रे कुर्यात्। सामिषं श्राद्धं भुक्त्वा च न संध्यां वदेत्। ब्राह्मणक्षत्रियसर्पन्नात्रामन्येत। मिथ्यासत्याभ्यां गुरुणानुबन्धः कार्यो, गुरुं नापवादयेत्। गुर्वपवादे कर्णौ पिधातव्यौ, गन्तव्यमन्यत्र वा दूरादावसथात्। मूत्रपादावसेचने स्पृष्ट्वा मार्जनानि कर्त्तव्यानि। नाति प्रातर्मध्याह्ने सायाह्नेषु गच्छेत्, नैकौनाज्ञातैर्वृषलैः। गो-ब्राह्मण-क्षत्रिय-वृद्ध-भारतप्त-गर्भिणी-दुर्बलेभ्यः पन्था देयः। धृतं न धारयेद् वस्त्रं पादेनाक्रमते।
२३६ || श्रीसाम्बपुराणम्
अष्टमी-चतुर्दशी-पूर्णिमामावास्यासु ब्रह्मचारी भवेत्। वृथा मांसं भ्रष्टमांसं च न खादेत्। आक्रोशपरिवादपैशून्यनृशंसाभिधानहीनो नारन्तुदः स्यात्, हीनादुत्कृष्टमपि नाददीत। परमर्मदोषान्न वदेत्। हीनातिरिक्ताङ्गरूपद्रविणजातिसत्यहीननिन्दितविगर्हितान्नाधिक्षिपेत्। नास्तिक्यवेदनिन्दाद्वेषदम्भाभिमानतैक्ष्ण्यानि वर्जयेत्।
परस्मिन्दण्डने न इच्छेत्। क्रुद्धोऽपि न हन्यात्। अन्यत्र भार्यापुत्रदासदासीशिष्यभ्रातृभ्यः। न ब्राह्मणपरिवादी, न तिथिनक्षत्रदेशिकः स्यात्। कृत्वा मूत्रपुरीषेऽशुचौ रथ्यामाक्रम्य वा पुनः पादौ प्रक्षालयेत्। यावककृसरमांसशष्कुलीपायसमात्मार्थं न कल्पयेत्।
अग्निपरिचारी नित्यं भिक्षां दद्यात्। वाग्यतः प्राङ्मुखोदन्तकाष्ठं प्रशस्तमद्यात्। नाभ्युदितः स्यात्। प्रातरुत्थाय पितरमाचार्यमभिवादयेत्। अकृत्वा दन्तधावनं देवपूजाकार्यगमनसमागमान्नाचरेत्। अन्यत्र गुरुवृद्धधार्मिकेभ्यः समलो दिशोऽनावलोक्य उदकञ्चाच्छिद्रा न शयीत। अवाक्शिर ऊर्ध्वशिखश्च भग्नावशीर्णान्तर्धानसंयुक्तशयने न तिर्यक् पदाकृष्यासनं प्रमृज्य न विशेत्। सूर्यस्य पूजां कथां भक्तिं कारयेत्, तत्सर्वयमस्य प्राप्नोति धर्मम्।
नित्यं ब्राह्मणं भोजयेत्, कथाकारिणं विशेषतः। अन्यदेते यदखादेत्सर्वमपि। निशायां न स्नायात्, स्नात्वा गात्रं न मार्जयेत्। स्नात्वा नानुलिम्पेत्। न स्नात्वाद्र्रवासा तिष्ठेत्। वासो न विधिनुयात्। स्रजो नावकृष्टव्याः। न बहिर्धार्याश्च। रक्तमाल्यं न धार्यं, शुक्लं धार्यं तु अन्यत्र कमलकुवलयाम्लानासनेभ्यः।
स्नातस्य वर्णमांदद्यात्, श्वासविपर्ययं न कुर्यात्। नान्यद्धृतं धारयेत्। न च जीर्णमलिनं, सति सम्भवे अन्यशय्यायामन्यद्रव्याणामन्यदेवतार्चायाम्। कीटकेशावपन्नमुद्धृतसारं नाश्नीयादन्यदैवावसनपिदालशाकमुदुम्बरान्नादेत्। अजागव्यमायुरशुष्कपर्युषितमांसं च। न पाणौ लवणमादद्यात्। श्वादव्यापदं स्पृष्ट्वाभूभूक्षणहेक्षिय तत अर्चलीणाघ्रातं च।
न रात्रौ भुञ्जीत दधिसक्तून्। श्रोकीसं च वर्जयेत्। बालेन परपुत्रेण च। शाकं प्रातश्च भुञ्जीत नान्तरा न समाहितः। वाग्यतो नैकपात्रश्च नग्नो संविशन्न शब्दकृत्। शेषे न कस्यापि उदकपूर्वमन्त्रमतिथिभ्यो दत्वा समश्नीयात्। एकपंक्तौ गतानां चेद्दधिमधुसक्तुपायसपानीयं निरस्याश्नीयात्। शेषं न कस्यचिद् दद्यात्। दध्यनुपानं शुक्लाशने न कार्यम्।
अक्रोध, सत्यवादी होना चाहिये। प्राणीगण के प्रति हिंसा तथा असूया का आचरण, अशुचि, खलता तथा आलस्य का परित्याग करना चाहिये। लोष्ट्र नहीं फेंकना चाहिये,
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २३७
तृण-छेदन नहीं करना चाहिये। नख को साफ रक्खे, सर्वदा जूठन ग्रहण न करे। संशयापन्न मन वाला न हो। सदा अच्छे केश धारण करे।
ब्राह्म मुहूर्त में उठकर धर्म के लिये सत् चिन्तन करे। तदनन्तर आचमन करके पूर्व तथा पश्चिम सन्ध्या (प्रातः तथा मध्याह्न सन्ध्या) वन्दन करे।
उदीयमान, अस्तगामी, जलस्थित, मध्याह्नकालीन सूर्य को न देखे। परस्त्री-गमन न करे। मध्याह्नकाल में केश-प्रसादन, दन्तधावन अथवा सूर्य के अतिरिक्त अन्य देवता का पूजन नहीं करे। मल-मूत्र न रोके तथा उन्हें न देखे। असच्चरित्र के साथ वार्ता न करे। ग्राम की कर्षण भूमि (खेती भूमि) में मलत्याग न करे। जल में विष्ठा अथवा मूत्र-त्याग न करे। भस्म अथवा अस्थि पर नग्न होकर न जाय। पूर्व की ओर मुख करके अन्नग्रहण न करे तथा कदन्न (कुत्सित या बासी अन्न) भोजन न करे। भोजन करके अग्नि स्पर्शोपरान्त समस्त प्राणों का स्पर्श करे। तुष, केश, भस्म, कपास, अस्थि का स्पर्श न करे। शरीर का मार्जन न करे तथा पसीना-युक्त अवस्था में न रहे।
शान्ति, होम आदि पवित्र कर्म कराये। सुप्त अथवा गमनकारी वृद्ध को न उठावे अर्थात् न बैठाये। भीगे तथा बिना धुले पात्र में भोजन न करे। अग्नि अथवा ब्राह्मण का जूठन-लङ्घन न करे। सूर्य तथा चन्द्र को एक साथ न देखे तथा नक्षत्र की ओर न ताके। वृद्ध को आते देखकर उठकर अभिवादन करके उसे आसन पर बैठाये। चलते समय वृद्ध के पीछे-पीछे चलना चाहिये। टूटे काँसे के पात्र में भोजन नहीं करना चाहिये। नग्न होकर स्नान न करे, नग्न होकर शयन भी न करे। जूठे हाथों से मस्तक का स्पर्श नहीं करना चाहिये। सर के बाल नहीं खींचना चाहिये। दोनों हाथों से माथा नहीं खुजलाना चाहिये। बार-बार डुबकी लगाकर स्नान न करे तथा दो बार स्नान न करे। माथा डुबोकर स्नान करने पर तैल से अंग का स्पर्श न कराये। घृत तथा मधु एक साथ विषतुल्य है। मूँग तथा तिल मिलाकर न खाये (एक साथ न खाये)। उच्छिष्ट अवस्था में अध्ययन तथा अध्यापन न करे। सड़ी गन्धयुक्त वायु में भी अध्ययन तथा अध्यापन नहीं करना चाहिये।
इस प्रसङ्ग में यम द्वारा एक गाथा कही गयी है—जो व्यक्ति उच्छिष्ट अवस्था में पाठ करता है अथवा स्वाध्याय करता है, उसकी आयु नष्ट होती है, उसके पुत्रादि नाक से बोलने वाले होते हैं।
सूर्य, वायु, अग्नि, चन्द्र, जल, गौ, ब्राह्मण तथा नक्षत्र की ओर मूत्रत्याग न करे। दिन तथा सन्ध्या काल में उत्तर की ओर मुख करके, रात्रि में दक्षिण की ओर मुख करके तृणाच्छादित भूमि में कमर ढ़ककर मल-मूत्र का त्याग करे।
आमिष भोजन तथा श्राद्ध का भोजन करके सन्ध्या नहीं करे। ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा सर्पों की अवज्ञा न करे। मिथ्या तथा सत्य द्वारा गुरु को अनुबद्ध करे। गुरु की निन्दा
२३८ | श्रीसाम्बपुराणम्
कदापि न करे। जहाँ गुरुनिन्दा हो रही हो, वहाँ दोनों कान बन्द कर ले अथवा वहाँ से दूर चला जाय। मूत्र-त्यागोपरान्त पैर धोकर जल द्वारा हाथों की भी मार्जना करनी चाहिये। अत्यन्त प्रातः, मध्याह्न में तथा सन्ध्या काल में शूद्रादि के साथ न जाय। गौ, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वृद्ध, भार से दबे, गर्भिणी तथा दुर्बल के लिये मार्ग से बगल होकर उन्हें मार्ग देना चाहिये। बिना धुले वस्त्र न पहने। पैरों से किसी पर आक्रमण न करे। अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा तथा अमावस्या को ब्रह्मचारी रहना चाहिये। वृथा मांस (जिसे देवताओं को अर्पित न किया हो), भ्रष्ट मांस (जीवादि पड़े, कीटाणु पड़े, जीवों द्वारा मारे गये तथा अग्नि पर सेंका गया मांस) कभी न खाये। आक्रोश, निन्दा, चुगली, नृशंसता का त्याग करे। किसी के दिल को चोट न पहुँचाये। हीन लोगों से उत्कृष्ट वस्तु भी ग्रहण न करे। अन्य का गोपन दोष लोगों के समक्ष प्रकट न करे। हीन अंग वाले (अंधे, लंगड़े, अंगरहित) तथा अतिरिक्त अंग जिनका है, उनसे घृणा न करे। जो रूपवान, धनवान, ज्ञाति, झूठे तथा निन्दित एवं विगर्हित हैं, उनसे घृणा न करे। नास्तिक, वेदनिन्दक, द्वेष, दम्भ, अभिमान तथा कठोरता का परित्याग कर देना चाहिये।
अन्य को दण्ड देने की इच्छा न करे। क्रुद्ध होने पर भी आघात न करे। तब भी भार्या, पुत्र, दास-दासी, शिष्य तथा भाईयों पर शासन तो करना ही चाहिये (अनुशासन हेतु)। कभी भी ब्राह्मण की निन्दा न करे। तिथि नक्षत्र गणना कार्य न करे। मल-मूत्र त्याग करके अथवा सड़क से वापस आकर पैर धोना चाहिये। तिल, आधा पका जौ, खिचड़ी, मांस, तण्डुलादि मिश्रित यवागू अथवा पायस अपने लिये तैयार न करे (अर्थात् केवल अकेले न खाये, बाँट कर खाये)।
जो नित्य अग्नि का होम करते हैं, उनको नित्य भिक्षा दे। वाक् संयम करके (मौनी रहकर) पूर्वमुख होकर प्रशस्त दतुअन चबाये। सूर्योदय के पश्चात् सोना नहीं चाहिये। प्रातः उठकर पिता तथा आचार्य को प्रणाम करे। दाँत साफ किये बिना देवपूजा तथा गमनागमन न करे।
गुरु-वृद्ध तथा धार्मिक की ओर एवं सब ओर न देखकर केवल उत्तर पश्चिम की ओर शिर रखकर न सोये अर्थात् गुरु, वृद्ध, धार्मिक की ओर पैर न करे तथा उत्तर एवं पश्चिम की ओर सिर करके न सोये। सर नीचा करके अथवा शिखा ऊपर रखकर, टूटी जीर्ण शय्या पर, पैरों से खींच कर बिना साफ किये आसन पर न बैठे। सूर्य की पूजा-कथा, भक्तिकार्य (सेवाकार्य) कराये। यह सब धर्म यम से प्राप्त होता है (अर्थात् धर्मराज फल देते हैं)।
नित्य ब्राह्मण-भोजन कराये; विशेषतः जो भगवान् की कथा कहते हैं, उनको भोजन कराये। अस्पृश्य द्रव्य को छोड़कर सब कुछ खा सकते हैं। रात्रि में स्नान करना उचित नहीं है। स्नान करके शरीर-मार्जन न करे, स्नानोपरान्त तैलादि न लगाये। स्नान करके
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २३९
गीले कपड़ों में न रहे। वस्त्रों को उड़ाये (फहराये) नहीं। माला को मसलना, तोड़ना उचित नहीं है। उसे बाहर धारण न करे। रक्तमाला धारण न करे। कमल, नीलपद्म, अम्लान असन पुष्प की माला के अतिरिक्त शुभ्र माला धारण करे।
(यहाँ 'स्नातस्य वर्णमां दद्यात्' का अर्थ स्पष्ट नहीं है)। श्वास का विपर्यय न करे। अन्य का पहना वस्त्र न पहने तथा जीर्ण एवं मलिन वस्त्र का व्यवहार न करे। सम्भव होने पर भी अन्य की शय्या, द्रव्य तथा अन्य के देवता-विग्रह को ग्रहण न करे। कीट-केशादि युक्त तथा सत् निकाले द्रव्य का भक्षण करना उचित नहीं है। अन्य देवता को अर्पित पिदाल शाक, गूलर-प्रभृति तथा बकरा-भेंड़ा-गौ-मयूर का शुष्क तथा बासी मांस न खाये। खाली हाथ पर नमक ग्रहण न करे। (यहाँ 'श्वादव्यापदं स्पृष्ट्वा भूभ्रूणहेक्ष्यित तत अर्चलीढ़ाघ्रातं च' का अर्थ संदिग्ध तथा अस्पष्ट होने के कारण नहीं दिया जा रहा है)।
रात्रि में दधि एवं सत्तू न खाये। श्लोकीस (?) का भी वर्जन करे। बालक तथा अन्य के पुत्र का भी वर्जन करे। प्रातः शाक का भोजन करे। असमाहित होकर अन्य समय शाक न खाये। वाक् संयम करके एक पात्र में नग्नावस्था में बैठकर कोई शब्द न करे (? तात्पर्य समझ में नहीं आता)। अन्त में किसी अन्य का जल तथा अन्न अतिथियों देकर भक्षण न करे। एक पंक्ति में भोजन करने वालों के साथ दधि-मधु-सत्तू तथा पानीय का भोजन करे। पात्र में बची वस्तु किसी को न दे। दधि को शुभ्र भोजन के साथ मिलाकर ग्रहण करे।
आचम्य चैकहस्तेन परिश्राव्यं तथोदकम्।
अंगुष्ठे चरणस्याथ दक्षिणस्यावसेचनम्॥७॥
पाणिं मूर्ध्नि समाधाय स्पृष्ट्वाग्निं सुसमाहितः।
ज्ञातीनां श्रेष्ठतामेति प्रयोगकुशलो नरः॥८॥
एक हथेली पर जल लेकर आचमन करना चाहिये। तत्पश्चात् दाहिने पैर के अंगूठे पर जल छोड़े। तदनन्तर हाथ को मस्तक पर रखकर सावधान हो अग्नि का स्पर्श करे। इससे प्रयोगनिपुण व्यक्ति ज्ञातिगण में प्रधानता प्राप्त करता है॥७-८॥
आर्द्रपाणिना नाभिघ्राणपाणितलाभिन्न स्पृशंस्तिष्ठेत्। पतितकथां दर्शनं संसर्गश्च वर्जयेत्। परापवादमप्रियवचनं न ब्रूयात्। न कस्यचिन्मन्युमुत्पादयेत्। न दिवा मैथुनं गच्छेत्। कन्याबन्ध्यकीमज्ञातां गर्भिणीं व्यङ्गां वृद्धां प्रव्रजितां पतिव्रतीं वर्णोत्कृष्टां निकृष्टवर्णां पिङ्गलीं कुष्ठिनीं योगिनीं चित्रिणीं स्वकुलजां ज्ञातिसम्बन्धहीनामपस्मारिणीं च वर्जयेत्। अगम्यां न गच्छेत्। राजसखावैद्यबालवृद्धमृत्युशरणागतसम्बन्धि ब्राह्मणी तदन्येषां स्त्रियं वन्ध्यां च वर्जयेत्। निष्ठीव्य क्षुत्वा न शुचिर्भवेत्।
२४० श्रीसाम्बपुराणम्
वृद्धो गतिरवशत्रो मित्राणि शुकसारिकाः।
पारावताः पुण्यकृताः गेहे स्युस्तैलपायिकाः ॥१९॥
गीली हथेली से पाणितल (हथेली के तल) के अतिरिक्त नाभि तथा नासिका का स्पर्श न करे (अर्थात् हथेली के तल से स्पर्श न करे)। पतितों से वार्त्ता, उनको देखना तथा उनसे संसर्ग रखना छोड़ दे। अन्य की निन्दा न करे तथा अप्रिय वचन न बोले। किसी में क्रोध उत्पन्न नहीं करना चाहिये (क्रोधित न करे)। दिन में मैथुनासक्त न हो। कन्या, पालिता, अज्ञाता, गर्भिणी, अंगहीना, वृद्धा, प्रब्रजिता (संन्यासिनी), व्रतचारिणी, अपनी अपेक्षा उच्च वर्ण वाली, हीन वर्ण वाली, पिङ्गला, कुष्ट रोगग्रस्त, योगिनी, चित्रिणी, अपने वंश में उत्पन्न, जाति-सम्बन्धरहित, अपस्मार रोग से ग्रस्त का वर्जन करे। अगम्या गमन न करे। राजा के सखा, वैद्य, बालक, वृद्ध, मरणोन्मुख—इनकी सम्बन्धन्वित तथा ब्राह्मणी एवं अन्य की स्त्री का भी वर्जन करे। वमन करने तथा नख काटने से पवित्रता नहीं होती। वृद्ध, अवसन्न, मित्र, शुक, सारिका, कबूतर, तैलपक्षी—ये सब घर के लिये मंगलकारी होते हैं॥१९॥
सन्ध्यायां स्वाध्यायं भोजनं न च कुर्यात्। न नक्तं पित्राणि, न प्रसाधनं न च पण्यक्रिया कदाचित्कार्या। दैवे पित्र्ये स्वनक्षत्रे च शिरःस्नातो भवेत्। न पृष्ठपदयो- रग्निं दद्यात्। प्रेतस्य सन्ध्यायां नोच्चरेत् प्रयत्नतः स्यात्। इच्छामपि कुर्वता दारा रक्ष्याः। न दिवास्वापः आयुषे पूरे निशायाश्च। अवृतो यज्ञं न गच्छेदन्यत्र दर्शनात्। नैको रात्रौ व्रजेत्। अनागतायां पश्चिमसन्ध्यायां गृहमधिवसेत्। मातृपितृवचनं हितमहितं चय्यमेव विचार्य। धनुर्वेदहस्तिहयपृष्ठरथचर्य्यासु प्रयत्नः कार्य्यः। युक्तिशब्दकला- गान्धर्वशास्त्रपुराणेतिहासाख्यानमाहात्म्यचरिताभिज्ञेन भवितव्यम्। आदित्यव्रतं सप्तम्यां चरेत्। न गां पादेन स्पृशेत्। गोरज्जुं न लङ्घयेत्। न्यासविश्वासहारिमधम्र्म्यमहतोगो- ब्राह्मणस्त्रीषु न शूरः स्यात्, अकृतज्ञश्च। एको मिष्टं नाश्नीयात्। स्त्रीभ्यः स्त्रीबन्धुभ्यश्च वृत्तिं नाशयेत्। अत्र गाथाः—
आक्रोशकसमालोके सुहृदन्यो न विद्यते।
यस्तु दुष्कृतमादाय सुकृतेनाभिशंसति ॥२०॥
सन्ध्या समय में वेदाध्ययन-अध्यापन तथा भोजन न करे। रात में पितृकार्य, प्रसाधन, वाणिज्य आदि कभी न करे। दैवकार्य, पितृकार्य में तथा अपने नक्षत्र में डुबकी लगाकर स्नान करे। पीठ घुमाकर अथवा पैर से अग्नि ग्रहण न करे। सन्ध्याकाल में (भूत) 'प्रेत' शब्द का उच्चारण नहीं करना चाहिये। इच्छापूर्वक सर्वदा स्त्री की रक्षा करना उचित है। दिन में सोना उचित नहीं है। पूर्ण परमायु के लिये रात्रि के प्रथम भाग में भी नहीं सोना चाहिये। देखने के अतिरिक्त अवृत स्थिति में यज्ञस्थल में नहीं जाना चाहिये। रात्रि में एकाकी कहीं न जाय। रात्रि समाप्त न होने पर घर में ही रहना उचित है। माता-पिता का वाक्य हित हो अथवा अहितपूर्ण, उसे विचार कर करे। धनुर्वेद शिक्षा, हाथी तथा
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २४१
घोड़े की सवारी तथा रथचालन में सदा सावधान रहे। न्यायादि तर्कशास्त्र (युक्ति), शब्द (व्याकरणादि शब्दानुशासन), कला (नृत्यादि), गान्धर्वशास्त्र (गीतादि), पुराण, इतिहास (पुरावृत्त), आख्यान (गल्पादि) तथा माहात्म्य (महिमा से इनकी) चरित से अभिज्ञ रहे। इन्हें जाने।
सप्तमी को आदित्य का व्रत करे। गाय का स्पर्श पैर से न करे। गाय के बाँधने की रस्सी अथवा सिक्कड़ को भी न लाँघे। (यहाँ 'न्यासविश्वासहारिमधौमयमहतों' का अर्थ स्पष्ट नहीं है, अतएव अनुवाद नहीं किया गया)। गौ, ब्राह्मण तथा स्त्रीगण के प्रति बहादुरी नहीं दिखाये तथा अकृतज्ञ न हो। अकेले मिठाई न खाये। महिलाओं से तथा स्त्री के बान्धवों से (श्वसुरालय वालों से) जीविका ग्रहण न करे।
इस विषय में कहा गया है कि निन्दक के समान कोई बन्धु नहीं है। वह जिसकी निन्दा करता है, उसका पाप ग्रहण कर लेता है और अपना पुण्य उसे प्रदान कर देता है॥१०॥
कूटसाक्षी न भवेत्। शरणागतं न परित्यजेत्। दानं न कीर्त्तयेत्। बल्वजानां दानेन कांस्यदोहनेन परवत्सेन च गौर्न दोग्धव्या। पत्नीं रजस्वलां नाभिगच्छेत्। शुद्धस्नातां चतुर्थ्यां वा षोडशीं समविषमदिनेषु पुत्रैर्दुहितृकामो निर्विकारोऽधिशयीत। नाग्नाममेध्यं प्रक्षिपेत्।
न वर्षति धावेत्। न च वातेनापचत्। अनिष्ट्वा नवं सस्यं नाद्यात्। शुक्लवस्त्रधारी स्यात्। श्मश्रुकेशनखान्नादीर्घान् बिभृयात्। नोदके स्वरूपं पश्येत्। नापः परिचक्षीत, भार्यया सह नाश्नीयात्। न तामीक्षेत् सुखासीनामश्नन्तीं क्षुवन्तीं सृष्टमैथुनां जृम्भमाणां च परस्त्रियं च नग्नाम्। नाग्निं मुखेन धमेत्। न पादौ प्रतापयेत्। अधस्तान्नोपद्ध्यात्। नैनं लङ्घयेत्। न पादतः कुर्यात्। न भूमिं प्रविलिखेत्। ष्ठीवनामेध्यलिप्तरुधिरवसास्थीनि न जले क्षिपेत्। शून्यगृहे नैकः शयीत। न चाग्निगुरुदेवद्विजपतिधेन्वध्ययनभोजनेषु दक्षिणपाणिमुद्धरेत्। न वारयेद् गां चरन्तीं परसस्यमादयन्तीं परस्मै नाचक्षीत। दिवीन्द्रायुधं दृष्ट्वा न कस्यचिद्दर्शयेत्।
अधार्मिकदेशे न वसेत्। व्याधिबहुलो नैको वीथीं प्रपद्येत्। पर्वते न चिरं वसेत्। वृथा चेष्टामञ्जलिना जलपानमुत्सङ्गेन भक्ष्याभक्षणं, कुतूहलं त्यजेत्। नृत्यगीतवादित्रास्फोटनाक्ष्वेलनानि च विरक्तोऽपि नेक्षेत। कांस्यभाजनेन न पादं प्रक्षालयेत्, पादेन च वन्दितश्वादिभिर्न व्रजेत्। बालातपप्रेतधूमसंमार्जनीरजांसि परिहरेत्। न द्यूतं क्रीडेत्। न स्वयमुपानहौ हरेत्। शयनस्थो नाश्नीयात्। न पाणिस्थाने चासनेन बाहुभ्यां नदीं प्रतरेत्। न वृक्षमारोहेत्। न सन्दिग्धां नावमारोहेत्। न कूपमवतरेत्। न देवद्विजगुरुराजस्नातकाचार्य्यमैथुनवासः, न च भुक्त्वा स्नायात्, नातुरो न महानिशि, नाविज्ञाते जलाशये, न वासोभिरजस्रम्। वैरीतत्सहायाधार्मिकतस्करसेवापरिहर्तव्या।
२४२ | श्रीसाम्बपुराणम्
सतीप्रियं सत्यं ब्रूयात्। सत्यमप्रियं प्रियमनृतं च न ब्रूयात्। शुष्कवैरवचनं वर्जयेत्। सर्वं मङ्गलाचरणयुक्तः स्यात्। सर्वगात्राणि नखानि नाभिपाणितलेन न स्पृशेदमन्त्रतः। रहस्यानि रोमाणि वर्जयेत्। देवद्विजोत्तमगुरून् सेवेयेत्, ईश्वरं च रक्षार्थम्। परवशकर्म जहात्। आत्मवशं कुर्वीत सुखार्थी। अन्तरालपरितोषकृद्धार्मिकः स्यात्। अर्थकामौ धर्मविवर्जितौ त्याज्यौ। वाक्पाणिपादनेत्रचपलो न भवेत्। परद्रोही च ऋत्विक्पुरोहिताचार्यमातुलातिथिशाश्रितवृद्धबालातुरवैद्यज्ञातिसंबन्धिबांधव-मातृपितृभार्यादुहितृभिर्विवादं न समाचरेत्। गोहिरण्यभूम्यश्ववासोऽन्नतिलघृता-न्यविद्वान्न प्रतिगृह्णीयात्। परकीयनिखातेषु न स्नायात्। वापीं च सप्तपिण्डानुद्धृत्य। नदीदेवखातप्रस्रवणेषु स्नानं कुर्यात्।
कृद्धमन्दातुरप्रेष्यगणिकाविद्वज्जुगुप्सितं स्तेनतक्षकवार्धुषिकगायककदर्य-दीक्षितम्। निन्द्यबद्धाभिशस्तशठपुंश्चलीबन्दिचिकित्सकम्, पूगान्त्रशूद्रोच्छिष्टशुष्क-पर्युषितावक्षतुं नाद्यात्। द्विषतश्चायुष्कामः सुवर्णकारान्नं परिहरेत्। अनध्यायिनं वर्जयेत्। तृप्त्यतिशयसुखप्रजा चक्षुर्भूत्यायुरग्रवेश्मरूपचन्द्रसूर्यसालोक्येष्टभार्याशा-श्रुतसर्वैश्वर्यब्रह्मलोकावाप्तिकामः सूर्यनिमित्तछत्रोपानहौ च दद्यात्। उत्तमोत्तमसम्बन्ध्या-वित्तकुलोन्नतिकामः शयनगृहकुशबन्ध्यपुष्पोदकमणिदधिमत्स्यपयोमांसशाका निरग्निर्नुदेत्। देवतातिथिगुरुभूत्यार्चनोद्धरणे कामः अध्यात्मज्ञाननिरतः स्यात्।
इति ते कीर्तितः सम्यगाचारः पुण्यलक्षणः।
आयुर्लक्ष्मीयशोभूतिकारणं ब्रह्मनिर्मितम् ॥१९॥
कूटसाक्षी (जो मिथ्या प्रतारणामूलक गवाही देता है) न बने। शरण में आये का त्याग न करे। दान करके उसका बखान नहीं करना चाहिये। राहु का दान करे। काँसा के पात्र में गोदोहन न करे। अन्य गाय के बछड़े को लगाकर गाय का दोहन नहीं करे। ऋतुमती पत्नी के साथ मैथुन न करे। शुद्ध स्नाता पत्नी के साथ चतुर्थ दिन या सोलहवें दिन समान अथवा विषम दिन पुत्र अथवा कन्या की कामना से निर्विकार होकर शयन करे। नग्न स्त्री पर अमेध्य वस्तु का क्षेपण नहीं करना चाहिये।
बरसात में न दौड़े। हाथ हिलाकर हवा करके अन्न न पकाये। अनिष्टकारी पुरातन शस्य न खाये। शुभ्र वस्त्र पहने। दाढ़ी, बाल तथा नख को न बढ़ाये। जल में अपनी आकृति न देखे। जल को (पशु के समान) जीभ से न चाटे। स्त्री के साथ एक साथ भोजन न करे। सुखासीना, भोजनकारिणी, भूखी, स्पृष्ट मैथुना तथा जंभाई लेती स्त्री को एवं नग्न परस्त्री को न देखे।
सीधे मुख की हवा से अग्नि को न जलाये (बाँस की नली से फूँक मारे)। अग्नि से ऊपर पैर न सेंके। देह के नीचे की ओर अग्नि का ताप ग्रहण नहीं करना चाहिये। अग्नि को लाँघना उचित नहीं है। भूमि पर नहीं लिखे। थूक, अमेध्यलिप्त वस्तु, रक्त, वसा
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २४३
तथा अस्थि को जल में न फेंके। शून्य गृह में एकाकी न सोये। अग्नि-गुरु-देवता-ब्राह्मण, पति, धेनु, अध्ययन तथा भोजन—सबसे दाहिने हाथ से व्यवहार करे। तृण खा रही गाय को हठात् रोकना नहीं चाहिये। यदि वह अन्य की फसल खा रही हो, तब भी उस व्यक्ति को न बताये। आकाश में इन्द्रधनुष देखकर अन्य को नहीं दिखलाना चाहिये कि यह देखो इन्द्रधनुष है।
अधार्मिक देश में न रहे। व्याधिग्रस्त अवस्था में एकाकी यात्रा न करे। पर्वत पर दीर्घकाल-पर्यन्त नहीं रहना चाहिये। वृथा चेष्टा, अञ्जली से जल पीना, गोद में रखकर भोजनादि करना तथा कुतूहल का परित्याग करे। नृत्य-गीत-वाद्य-वीरों का बाहुशब्द तथा कुत्सित गायन अथवा क्रीड़ा आदि को विरक्त त्यागी स्थिति हो जाने पर भी न देखे। कांस्य पात्र में पैर न धोये। पैदल स्थिति में शब्दकारी अश्वादि के साथ न चले। उदीयमान सूर्य, श्मशान की धूम, झाड़ू की धूल (हवा) का त्याग करे। लेटे हुये न खाये। हथेली पर अथवा आसन पर रखकर न खाये। हाथ से (पानी काटकर अर्थात् तैरकर) नदी पार नहीं करना चाहिये।
वृक्ष पर न चढ़े। सन्देहप्रद नौका पर न बैठे। कूंयें में न उतरे। देवता-ब्राह्मण-गुरु-राजा-विद्यार्थी तथा मैथुनकारी के साथ न रहे। भोजनोपरान्त स्नान न करे। अस्वस्थावस्था में, गम्भीर रात में तथा अज्ञात जलाशय में स्नान नहीं करना चाहिये। अधिक वस्त्र पहन कर भी स्नान न करे। शत्रु, शत्रु के सहायक, अधार्मिक तथा चोर की सेवा करना छोड़ देना चाहिये।
सदा प्रिय सत्य बोले। अप्रिय सत्य तथा प्रिय झूठ कदापि नहीं बोलना चाहिये। अनर्थक शत्रुता तथा अनर्थक वाक्य का वर्जन करना चाहिये। समस्त मंगल आचरण करे। समस्त अंग, नख, नाभिदेश तथा पाणितल का मन्त्र के विना स्पर्श न करे। गोपन स्थान तथा समस्त रोमों का वर्जन करे। देवता, ब्राह्मण तथा गुरु की पूजा करनी चाहिये। अपनी रक्षा हेतु ईश्वर की सेवा करना उचित है। दूसरे के अधीन होकर कार्य करना छोड़ दे। सुखाभिलाषी अपने अधीन होकर कार्य करे। अन्तरात्मा को सन्तोष देने वाले विधान का पालन करके धार्मिक बने। धर्महीन अर्थ तथा काम का त्याग करना ही उचित है। वाणी, हाथ, पैर तथा नेत्र को बेकार न नचाये।
अन्य के साथ द्रोह का आचरण नहीं करना चाहिये। पुरोहित, आचार्य, मामा, अतिथि, आश्रित, वृद्ध, बालक, आतुर, वैद्य, ज्ञाति, सम्बन्धी, बान्धव, माता-पिता, भ्राता, विमाता, कन्या तथा भृत्य के साथ विवाद नहीं करना चाहिये। गौ, स्वर्ण, भूमि, अश्व, वस्त्रादि, अन्न, तिल तथा घृत को जाने बिना इन्हें ग्रहण न करे। दूसरे के खोदे जलाशय में स्नान नहीं करे। सप्त पिण्ड का दान किये बिना दूसरे के जलाशय में स्नान नहीं करना चाहिये। नदी, अपने-आप जो जलाशय बना है तथा प्रस्रवण में स्नान करना उचित है।
२४४ श्रीसाम्बपुराणम्
क्रुद्ध, दुष्ट जन, आतुर, दास, गणिका, विद्वान् के निन्दक, चोर, सूत्रधार, गायक तथा निन्दित का अन्न ग्रहण न करे। निन्दक, अभिशप्त, शठ, पुंश्चली (वेश्यादि), बन्दी तथा चिकित्सक का अन्न ग्रहण न करे। पूगान्त्र (सुपारी-मिश्रित अन्न), शूद्र का जूठा, शुष्क-बासी-सड़ा, मिट्टी में पड़ा (हिचकी के समय मिट्टी में गिरा) अन्नादि ग्रहण नहीं करना चाहिये।
आयु चाहने वाला व्यक्ति शत्रु का तथा स्वर्णकार का अन्न त्याग दे। जो अध्ययन नहीं करते, उनका साथ न करे। तृप्ति, अतिशय सुख, पुत्रादि, चक्षु, उन्नति, आयु, गृह, रूप, चन्द्र, सूर्य, सालोक्य, अभिलषित वस्तु, भार्या, नित्य ऐश्वर्य तथा ब्रह्मलोक-प्राप्ति की कामना से सूर्य को छत्र तथा पादुका देनी चाहिये। उत्तम सम्बन्ध, धन-सम्पत्ति, वंश की उन्नति-कामना, शय्या, गृह, कुशबन्ध, पुष्प, जल, मणि तथा दधि, मत्स्य, दुग्ध, मांस, शाक का दान करे। देवता, अतिथि, गुरु-सेवक की अर्चना द्वारा उद्धार की कामना से निरन्तर आत्मा के सम्बन्ध में चेष्टारत रहना चाहिये।
हे साम्ब! तुमसे यह पुण्यलक्षण आचार की वर्णना सम्यक् रूप से कहा, जो आयु, धन-सम्पत्ति, फल तथा उन्नति का कारण है तथा ब्रह्मा द्वारा निर्मित है।।११।।
आचारयुक्तः पुरुषः प्रेत्य चेह च मोदते।
आचाराद्वर्द्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम् ॥१२॥
दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः।
दुष्टभोगी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥१३॥
आचारपरायण व्यक्ति परलोक तथा इहलोक में सुख प्राप्त करते हैं। आचार द्वारा आयु की वृद्धि होती है और आचार अलक्षण का विनाश करता है। दुराचारी पुरुष इस जगत् में निन्दित होता है। वह दुष्ट भोगों तथा व्याधि का सर्वदा भोग करके अल्पायु हो जाता है।।१२-१३।।
तस्माद् भवेत् सदाचारः समुदा श्रीरवेर्नरः।
देवस्य प्रियतामेति लक्ष्मीं विन्दति निश्चलाम् ॥१४॥
इति श्री साम्बपुराणे आचारलक्षणं नाम चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
अतएव लोक आनन्द से सूर्य के सदाचार से सम्पन्न हों। इससे सूर्यदेव की अचल सम्पदा तथा प्रीति मिलती है।।१४।।
श्री साम्बपुराणान्तर्गत सदाचार कथन नामक चौवालीसवाँ अध्याय समाप्त।
पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(छत्र-पादुकयोर्दानफलम्)
साम्ब उवाच
इदमुक्तं त्वया ब्रह्म छत्रं सूर्येण निर्मितम्।
उपानहौ च यो दद्याच्छक्रलोकं स गच्छति ॥१॥
एतदाचक्ष्व भगवन् कथं सूर्यविनिर्मितम्।
छत्रपादुकयोर्दानमध्वतान्तर्हि जायते ॥२॥
साम्ब कहते हैं—आपने बतलाया है कि सूर्य ने छत्र तथा पादुका का निर्माण किया है तथा जो छत्र तथा पादुका दान करता है, वह इन्द्रलोक जाता है। हे भगवन्! अब यह कहिये कि किस प्रकार सूर्य-विनिर्मित छत्र तथा पादुका-दान के फल से द्विजत्व प्राप्त होता है॥१-२॥
नारद उवाच
एतत्ते संप्रवक्ष्यामि यथावृत्तमिदं पुरा।
जमदग्निः किल शरान् पुरा चिक्षेप भार्गवः ॥३॥
तान् क्षिप्तान् रेणुका तस्य भानोर्जाज्वल्य तेजसः।
आनीयासीददात्तस्य सा च शीघ्रमनिन्दिता ॥४॥
अव्यक्तेन सुशब्देन ज्यातिलस्य शरस्य च।
प्रहृष्टः सम्प्रचिक्षेप सा च प्रत्याजहार तम् ॥५॥
नारद कहते हैं—इस विषय में पूर्वकाल में जो घटना घटित हो चुकी है, वह तुमसे कहता हूँ। भार्गव जगदग्नि ऋषि बाण छोड़ रहे थे और उनकी पत्नी अनिन्दिता रेणुका सूर्य के जाज्वल्य तेज में भी उन तीरों को शीघ्र उनके पास लाती जा रही थीं। तदनन्तर (तीर पाकर) वे पुनः धनुष की ज्या खींचकर बाण छोड़ते और रेणुका पुनः वे तीर लाकर उन्हें देती जा रहीं थीं॥३-५॥
ततो मध्याह्नमारूढे ज्येष्ठामूले दिवाकरे।
सायकान्यान् द्विजः क्षिप्त्वा रेणुकामिदमब्रवीत् ॥६॥
गच्छानय विशालाक्षि शरानेतान्यनुश्च्युतान्।
यावदेतान्युनः सुभ्रू क्षिपामीति मुनिर्वदन् ॥७॥
गच्छन्ती सातुरा छायां वार्क्षीमाश्रित्य भामिनी।
तस्थौ सूर्यांशुसन्तप्तशिरःपादाम्बुजद्वया ॥८॥
२४६ श्रीसाम्बपुराणम्
स्थित्वा तत्र मुहूर्त्तं सा भर्तुः शापभयाच्छुभा।
गत्वादाय शरान् भूयस्तस्मै दद्याद् यशस्विनी ॥९॥
तत्पश्चात् एक समय ज्येष्ठ मास के मध्याह्न काल में ब्राह्मण जमदग्नि तीर छोड़ते हुये रेणुका से बोले—हे विशालाक्षि! धनुष से छोड़े इन तीरों को लाओ, जिससे मैं उन्हें पुनः छोड़ सकूँ। इस प्रकार दौड़ते-दौड़ते रेणुका का सूर्यकिरण से मस्तक तथा चरणद्वय सन्तप्त हो गया और वे कातर अवस्था में वृक्ष के नीचे बैठ गयीं। कल्याणी रेणुका स्वामी के शाप के भय से मुहूर्तमात्र में ही वहाँ से उठीं और पुनः तीर ला-लाकर स्वामी को देने लगीं॥६-९॥
स तामृषिश्च प्रस्विन्नां धिया वेदितवेदनाम्।
जगौ वचनमारुष्टः किञ्चिरेणागता ह्यसि ॥१०॥
ऋषि ने ध्यान से उन्हें पसीने से लथपथ देखकर उनकी वेदना के प्रति आकृष्ट होकर कहा—क्यों विलम्ब हुआ? ॥१०॥
रेणुकावाक्यमाहेदं चण्डांशुकरापीडिता।
शिरःपादमप्रतप्तं मे सूर्यतेजोभिरुद्धतैः ॥११॥
वृक्षच्छायागता तस्मात् चिरमेतन्मया कृतम्।
श्रुत्वैवं जमदग्निस्तु क्रुद्धः सूर्याय तापिने ॥१२॥
रेणुका ने उत्तर दिया—'मैं प्रचण्ड सूर्यकिरणों से पीड़ित हो गयी। सूर्य के तेज से मेरा मस्तक तथा पैर प्रतप्त हो जाने के कारण वृक्ष की छाया में मैं बैठ गयी, अतएव विलम्ब हो गया'। यह सुनकर जमदग्नि तापदायक सूर्य के प्रति क्रोधित हो उठे॥११-१२॥
स विस्फूर्ज्य धनुर्धीमान् गृहीत्वा सायकान् बहून्।
अतिष्ठत् सूर्यमभितो यतो याति ततो सुखम् ॥१३॥
द्विजरूपं समास्थाय सूर्योऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत्।
किमर्थं रुषितोऽसि त्वं किं ते सूर्योऽपराध्यति ॥१४॥
आदत्ते रश्मिभिः सूर्यो जलं सर्वजगत्स्थितम्।
आदाय स जलं देवो वर्षाकाले प्रवर्षति ॥१५॥
ततोऽन्नं जायते विप्र मानुषाणां सुखावहम्।
अन्नं प्राण इति प्रोक्तं वेदे च परिपठ्यते ॥१६॥
बुद्धिमान् जमदग्नि ने धनुष खींचकर अनेक तीर लेकर सूर्य की ओर खड़े हो गये और सूर्य जिधर-जिधर घूम रहे थे, उस-उस ओर मुख करके चलने लगे। तत्पश्चात् सूर्यदेव ब्राह्मण का रूप धारण करके आये और कहा कि आपने क्यों कष्ट किया? सूर्य का क्या अपराध है? समस्त जगत् के जल को सूर्य अपनी किरणों से ग्रहण करके उस जल
पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः । २४७
का पुनः वर्षाकाल में वर्षण करते हैं। हे ब्राह्मण! उससे मनुष्य को सुख देने वाला अन्न उत्पन्न होता है और अन्न ही प्राण कहा जाता है। वेद में भी ऐसा पाठ है॥१३-१६॥
ततो लोकहितार्थाय रश्मिभिः परिवारितः।
सप्तद्वीपानिमान् ब्रह्मन् वर्षेणाभिव्रवर्षति ॥१७॥
ततस्तदोषधीनां च वीरुधां पत्रपुष्पजाम्।
सर्वं वर्षाभिनिर्वृत्तमन्नं सम्भवति द्विज ॥१८॥
भवन्ति जातकर्माणि व्रतोपनयनानि च।
गोदाननिवहाश्चैव तथा वर्णसमृद्धयः ॥१९॥
सत्राणि दानानि तथा संयोगाबीजसञ्चयाः।
अनन्ताः सम्प्रवर्त्तन्ते यथा त्वं वेत्सि भार्गव ॥२०॥
इसीलिये जनकल्याणार्थ सूर्यदेव अपनी रश्मि द्वारा जल खींचते हैं। हे ब्राह्मण! वे सप्त द्वीपों में वर्षा ऋतु में प्रबल जल-वर्षण करते हैं। इसके पश्चात् क्रमशः औषधि तथा लता-गुल्म का पत्र-पुष्प जन्म लेता है। हे द्विज! समस्त वर्षा-जल से अन्न उत्पन्न होता है। तदनन्तर क्रमशः इसके फल से जातकर्म, व्रत, उपनयन तथा गोदानादि कार्य होते हैं। फलस्वरूप सभी वर्ण समृद्ध हो जाते हैं। यज्ञ-दान-संयोग-बीजसंचय सभी अन्न से ही सम्भव होता है। हे भार्गव! इसे आप अच्छी तरह से जानते हैं॥१७-२०॥
रमणीयानि यावन्ति वर्तन्ते यानि कानिचित्।
तावन्त्यन्नात्सम्भवन्ति विदितं कीर्तयामि ते ॥२१॥
सर्वं हि वेत्सि विप्र त्वं यदेतत् कीर्तितं मया।
या चेत्त्वाहं भृगुश्रेष्ठ! किं त्वं सूर्याय रूष्यति ॥२२॥
एवं तदोच्यमानो वै भास्करेण महात्मना।
जमदग्निर्महातेजा कैङ्कर्यं प्रत्यपद्यत ॥२३॥
जो कुछ रमणीय है, वह सब अन्न से उत्पन्न होता है। इसे आप जानते हैं। हे ब्राह्मण! मैंने जो कुछ कहा है, वह सब आप जान लीजिये। हे भृगुश्रेष्ठ! मैं आपसे पूछता हूँ कि आप सूर्य से क्यों क्रोधित हैं? महात्मा भास्कर (ब्राह्मणरूपी) के यह कहने पर महातेजस्वी जमदग्नि भृत्यभाव से अवनत हो गये॥२१-२३॥
ततः स भगवान् देवो मुनिमग्निसमन्वितम्।
सूर्यो मधुरया वाचा तमिदं पुनरब्रवीत् ॥२४॥
चलं निमित्तं विप्रर्षे सदा सूर्यस्य गच्छतः।
कथं चलं वेत्स्यसि त्वं सदा यान्तं दिवाकरम् ॥२५॥
२४८ श्रीसाम्बपुराणम्
तदनन्तर भगवान् सूर्यदेव अग्नितुल्य मुनि से मधुर वाक्य में फिर बोले—हे विप्रर्षि! सर्वदा गमनकारी सूर्य की कार्यवशात् चलमान अवस्था है। सदा गम्यमान सूर्य को आप कैसे जानते हैं॥२४-२५॥
एवं ब्रुवाणं देवं तं सूर्यं ब्राह्मणरूपिणम्।
विज्ञाय ज्ञानयुक्तात्मा इदं वचनमब्रवीत् ॥२६॥
स्थिरं रविं चलं वापि जानामि ज्ञानचक्षुषा।
अवश्यं विनयाध्यानं कार्यमद्य त्वयाऽनघ ॥२७॥
अपराह्ने निमेषं हि तिष्ठसि त्वं दिवाकर।
तत्र वेत्स्यामि सूर्यं त्वां नास्ति मेऽत्र विचारणा ॥२८॥
ब्राह्मणरूपी सूर्य के ऐसा कहने पर ज्ञानयुक्तात्मा ऋषि उनसे इस प्रकार कहने लगे—रवि को स्थिर अथवा चञ्चल मैं ज्ञाननेत्रों से देखता हूँ। हे निष्पाप! आज आपसे (सूर्य के) कार्य का वर्णन सुनकर मैं अपने क्रोध को रोक रहा हूँ। हे दिवाकर! अपराह्न काल में आप निमेष मात्र के लिये स्थिर हो जाते हैं। हे सूर्य! मैं तब आपको जान पाया हूँ। इस सम्बन्ध में मेरे मन में कोई सन्देह नहीं है॥२६-२८॥
श्रीसूर्य उवाच
असंशयं मां विप्रर्षे वेत्स्यसि धन्विनां वर।
उपकारिणं हि मां विद्धि भवतो गोचरं गतम् ॥२९॥
तं सर्वलोकरक्षायै प्रवृत्तं मां दुरासदम्।
दीप्तं रश्मिसहस्रेण ज्ञातवान् ज्ञानचक्षुषा ॥३०॥
श्री सूर्यदेव कहते हैं—हे धनुर्धारियों में श्रेष्ठ विप्रर्षि! आपने निःसंदेह मुझे जान लिया है। आपने मुझे उपकारी माना है, मैं आपकी दृष्टि के सम्मुख विषयीभूत (प्रत्यक्ष) हो गया। मैं समस्त लोकों की रक्षा में प्रवृत्त हूँ। सहस्र रश्मि से दीप्त हूँ। मुझ दुरासद को तुमने ज्ञाननेत्रों से जाना है॥२९-३०॥
ततः प्रहस्य भगवान् जमदग्निरुवाच ह।
भास्करं प्रीतया दृष्ट्या दृष्ट्वा लोकप्रतापनम् ॥३१॥
तदनन्तर सौभाग्य से लोकसमूह को ताप देने वाले सूर्य को देखकर प्रसन्न होकर भगवान् जमदग्नि हास्यपूर्ण मुद्रा में बोले॥३१॥
तापस्यास्यापगमने समाधिं तु विचिन्तय।
यथा सुखेन गमनं परमक्ष्यमयमेव च ॥३२॥
छत्रं द्विजातये दद्यात् स प्रेत्य तु सुखी भवेत्।
न च ते हन्ति मम क्रोधो नाभिकार्यः सुरोत्तमः ॥३३॥
मद्गोचरगतश्चापि सर्वलोकहितप्रदः।
पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २४९
ततः सूर्यो ददौ तस्मै छत्रोपानहमाशु वै ॥३४॥
उवाच स मुनिश्रेष्ठमिदं वचनमुत्तमम्।
महर्षे शिरसस्त्राणं छत्रं मद्रश्मिवारणम् ॥३५॥
प्रतिगृह्णीहि पद्भ्यान्तु धारणार्थं च पादुके।
अद्य प्रभृति चैवाऽस्मिंल्लोके सम्प्रचरिष्यति ॥३६॥
हे सुरोत्तम! इस ताप के चले जाने पर आप समाधि में चिन्तन करें, जिससे सुख से गमन हो सके तथा वह अक्षय हो। ब्राह्मण को छत्रदान करने से (व्यक्ति) परलोक में सुखी होता है। आपके प्रति मेरा कोई क्रोध नहीं है। मेरी दृष्टि के सम्मुख प्रकट होकर भी आप समस्त लोक का हित करने वाले हैं। तदनन्तर जमदग्नि को सूर्यदेव ने शीघ्रता से छाता तथा पादुका प्रदान किया और उन्होंने (सूर्यदेव ने) मुनिश्रेष्ठ से कहा—महर्षि! मेरे ताप से छुटकारा पाने के लिये मस्तक का रक्षण करने वाला यह छत्र (छाता) तथा दोनों पैरों में धारण करने हेतु यह पादुकायुगल धारण कीजिये। आज से यह जगत् में प्रचारित होगा।।३२-३६।।
पुण्यकेष्वपि सर्गेषु परमक्षय्यमेव च।
छत्रं द्विजाय यो दद्यात् स प्रेत्य सुखमेधते ॥३७॥
शक्रलोके च वसति ह्यप्सरोभिः समावृतः ॥३८॥
उपानहौ च यो दद्यात् श्लक्ष्णे स्नेहसमन्विते।
गोलोके स मुदायुक्तो वसति प्रेत्य मानवः ॥३९॥
पुण्य कार्य में यह परम अक्षय (पुण्य कार्य) है। जो ब्राह्मण को छत्रदान करेगा, उसे परलोक में सुख-वृद्धि होगी तथा इन्द्रलोक में अप्सराओं से परिवृत होकर वह निवास करेगा। सुन्दर नरम पादुका जो दान करेगा, वह परलोक में अर्थात् गोलोक में सानन्द निवास करेगा।।३७-३९।।
एवमुक्त्वा तु भगवान् भास्करो लोकपावनः।
शान्तयित्वा द्विजश्रेष्ठं तत्रैवान्तरधीयत ॥४०॥
मयापि ते यदुश्रेष्ठ कथितं पुण्यवर्धनम्।
छत्रपादुकयोर्दानं यथा सूर्येण भाषितम् ॥४१॥
इति श्रीसाम्बपुराणे छत्रपादुकादानफलवर्णनं नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
यह कहकर भगवान लोकपावन भास्कर ब्राह्मण जगदग्नि को सान्त्वना देकर वहीं अन्तर्धान हो गये। हे यदुश्रेष्ठ! इस प्रकार सूर्य ने जैसा कहा था, मैंने भी तुमसे उस पुण्यवर्धक छत्र तथा पादुकादान का वर्णन किया।।४०-४१।।
श्री साम्बपुराणान्तर्गत छत्र-पादुकादानफल नामक पैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त
षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(सप्तमीकल्पः)
साम्ब उवाच
भगवन् श्रोतुमिच्छामि सप्तम्यास्तु विधिक्रमम्।
सर्वास्तामानुपूर्व्येण कथयस्व महामुने॥१॥
साम्ब कहते हैं—भगवन्! सप्तमी सूर्यपूजन की विधि सुनने की इच्छा हो रही है। हे महामुनि! उसका आनुपूर्वीक वर्णन करिये॥१॥
नारद उवाच
शृणु साम्ब महाबाहो सप्तमीनां विधिं परम्।
तमहं कीर्तयिष्यामि भक्त्या यत् परिपृच्छ्यते॥२॥
तुभ्यं यदुकुलश्रेष्ठ यथा ख्यातं विवस्वता।
शुक्लपक्षे रविदिने प्रवृत्ते चोत्तरायणे॥३॥
पुन्नामधेयनक्षत्रे गृह्णीयात् सप्तमीव्रतम्।
ऋषिभिर्ज्ञानसम्पन्नैः सर्वकामफलप्रदा॥४॥
सप्तम्यः सप्त कथितास्तासां नामानि मे शृणु।
अर्कसम्पुटकैरेका द्वितीया मरिचैस्तथा॥५॥
तृतीया निम्बपत्रैस्तु चतुर्थी फलसप्तमी।
पञ्चम्यनादिनी स्यात्तु षष्ठी विजयसप्तमी।
सप्तमी कामिका नाम विधिमासां निबोध मे॥६॥
देवर्षि नारद कहते हैं—हे महाबाहु साम्ब! सप्तमी तिथि की श्रेष्ठ विधि को सुनो। तुमने भक्तिपूर्वक जो पूछा है, उसका वर्णन तुमसे करता हूँ। हे यदुकुलश्रेष्ठ! सूर्यदेव ने जैसा कहा था, वह तुमसे मैं कहता हूँ। उत्तरायण होने पर शुक्ल पक्ष के रविवार की पुष्य नक्षत्र वाली सप्तमी को ग्रहण करो (अर्थात् उस दिन पूजन करो)।
ज्ञानयुक्त ऋषिगण ने सात प्रकार की सप्तमी की बात कही है। उसका नाम मुझसे सुनो। अर्कसम्पुट द्वारा प्रथम, मरिच द्वारा द्वितीय, नीम के पत्ते द्वारा तृतीय, चतुर्थ है—फलसप्तमी (फल द्वारा), पञ्चम है—अनादिनी सप्तमी। षष्ठ है—विजयसप्तमी तथा सप्तम है—कामिका सप्तमी। अब इनका विधान मुझसे श्रवण करो॥२-६॥
पञ्चम्यामेव पुरुषः कुर्यान्नियसिमात्मनः ।
षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २५१
सर्वासु ब्रह्मचारी स्याच्छौचयुक्तो जितेन्द्रियः ।
सूर्यार्चनपरो दान्तो जपहोमसमन्वितः ॥७॥
पञ्चम्यामेव पुरुषः कुर्यान्नियसिमात्मनः ।
षष्ठ्यां न मैथुनं गच्छेन्मधुमांसानि वर्जयेत् ॥८॥
सभी सप्तमियों में ब्रह्मचारी होकर, शौचयुक्त होकर, जितेन्द्रिय रहकर सूर्य के अर्चनपरायण होकर यम, बहिरिन्द्रिय संयत (दान्त) होकर जप तथा होमपरायण हो जाय। पञ्चम सप्तमी को आत्मसंयम करे। षष्ठ सप्तमी को मैथुन-मधु तथा मांस का वर्जन करना चाहिये॥७-८॥
अर्कसम्पुटमेकैकं प्रथमायां विधानवित् ।
अन्यदत्तमभुञ्जानः सप्तम्यां भक्षयेन्नरः ॥९॥
एकैकवृद्धानि पुनर्मरिचानि च भक्षयेत् ।
तथैव निम्बपत्राणि परमं व्रतमास्थितः ॥१०॥
विधान का ज्ञाता व्यक्ति अर्कसम्पुट के एक-एक में (?) प्रथमतः दूसरे के द्वारा दिया भक्षण न करके (?) सप्तमी को भक्षण करे। इसका तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि अर्कसम्पुट सप्तमी को अन्य वस्तु का भक्षण न करे। द्वितीय में एक-एक की वृद्धि करके अब (अर्कसम्पुट के अनन्तर) मरिच का भक्षण करे। तृतीय में व्रत-पालनार्थ निम्ब पत्र का भक्षण करे॥९-१०॥
फलाख्यायां फलेनैव आमे नात्र विधीयते ।
अनादिन्यामोदनेन रहितमप्यनाश्नीयात् ॥११॥
फलाख्य चतुर्थ सप्तमी में फल-भक्षण द्वारा व्रत करे। इसमें बिना पकाये द्रव्य ग्रहण का विधान है। अनादिनी सप्तमी में अन्नरहित होने पर भी यहाँ भक्षण करे (क्या भक्षण करे? स्पष्ट नहीं है)॥११॥
अहोरात्रं वायुभक्षः कुर्याद्विजयसप्तमीम् ।
अथैकैकां सप्तमीं तु प्रतिपक्षे विचक्षणः ॥१२॥
दिन-रात वायु भक्षण द्वारा विजयसप्तमी व्रतानुष्ठान होता है। विचक्षण व्यक्ति प्रत्येक पक्ष में इस प्रकार का व्रत करे॥१२॥
कृत्वा विधानकुशलस्तुतः कुर्वीत कामिकाम् ।
आसां लिखित्वा नामानि पत्रकेषु पृथक्-पृथक् ॥१३॥
तानि सर्वाणि पत्राणि प्रक्षिपेन्नवके घटे ।
तदर्थं यो न जानाति बालो वान्योऽपि वा नरः ॥१४॥
तेनैवोद्धारयेदेकं तत्कुर्यादविचारयन् ।
तेनैव विधिना कुर्यात् पक्षे पक्षे विचक्षणः ॥१५॥
२५२ श्रीसाम्बपुराणम्
विधानकुशल व्यक्ति ऐसा करके कामिका सप्तमी व्रत करे। इन सप्तमियों का नाम पृथक्-पृथक् पत्ते पर लिखकर एक नये घट में छोड़े। इसका अर्थ जो नहीं जानता, वह बालक अथवा अन्य नर है। उसमें से एक-एक को निकाले। इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिये। विचक्षण व्यक्ति इस प्रकार के विधान से प्रत्येक पक्ष में अनुष्ठान करे।।१३-१५।।
सप्तैव यावत् संप्राप्ता विज्ञेया सा तु कामिका।
इत्येता सप्त सप्तम्यः स्वयं प्रोक्ता विवस्वता ॥१६॥
जब सातो प्राप्त हो जाती हैं, तब उसे ही कामिका सप्तमी कहते हैं। इन सातों का वर्णन स्वयं सूर्यदेव ने किया है।।१६।।
कुर्वीत यो नरः साम्ब सर्वपापैः प्रमुच्यते।
अर्कसम्पुटकैर्वित्तं मरिचैः प्रियसङ्गमम् ॥१७॥
हे साम्ब! जो व्यक्ति इन सातो सप्तमी के व्रत का अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। अर्कसम्पुट सप्तमी व्रत से वित्तलाभ होता है तथा मरिच सप्तमी व्रत के अनुष्ठान से प्रियजनों का मिलन होता है।।१७।।
निम्बपत्रे रोगानाशं फलैः पुत्रान्यथेप्सितम्।
धनधान्यमनादिन्यां विजये विजयं तथा ॥१८॥
निम्ब सप्तमी में नीम के पत्तों से रोग का नाश होता है। फल वाली सप्तमी में अभीष्ट पुत्र की प्राप्ति होती है। अनादिनी सप्तमी व्रत द्वारा धन-धान्य का लाभ होता है। विजया सप्तमी व्रत विजय दिलाती है।।१८।।
सर्वान् कामान् कामिकायां प्राप्नुयान्नात्र संशयः।
नरो वा यदि वा नारी यः कुर्यात् सप्तमीव्रतम् ॥१९॥
नर अथवा नारी में से जो कोई भी सप्तमी व्रत करे, उन्हें कामिका सप्तमी व्रत से समस्त कामनाओं की पूर्ति का लाभ मिलता है। यह निःसंदिग्ध है।।१९।।
ये करिष्यन्ति नितरां तेषां लोको विभावसोः।
न तेषां त्रिषु लोकेषु किञ्चिदस्तीह दुर्लभम् ॥२०॥
जो निरन्तर सप्तमी व्रत करते हैं, उन्हें सूर्यलोक प्राप्त होता है। उनके लिये त्रिलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता।।२०।।
ये भक्ता लोकनाथस्य व्रतिनः संयतेन्द्रियाः।
तत्फलं ते प्राप्नुवन्ति क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥२१॥
षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २५३
जो भक्त संयतेन्द्रिय होकर लोकपालक सूर्य का व्रत करते हैं, वे प्रचुर दक्षिणायुक्त यज्ञों का फल प्राप्त करते हैं।।२१।।
व्रतैरेवंविधैस्त्वन्यैस्तपोभिस्तु सुदुष्करैः।
कर्मभिः शमनैर्वापि दानहोमजपैरपि ॥२२॥
यत्फलं समवाप्नोति चरित्वा सप्तमीव्रतम्।
सूर्यलोकेषु नियतं वासो नैवात्र संशयः॥२३॥
इस प्रकार से अन्यान्य व्रत, सुदुष्कर तप, कर्मों का शमन, दान, होम तथा जप से जो फल प्राप्त होता है, वही फल सप्तमी व्रतानुष्ठान से भी प्राप्त हो जाता है। वह निःसंदिग्ध रूप से सूर्यलोक में वास करता है।।२२-२३।।
ब्रह्मेन्द्ररुद्रलोकेषु तस्याप्रतिहता गतिः।
नान्धः कुष्ठी न च क्लीबो व्यङ्गो नापि च निर्धनः ॥२४॥
कुले तस्य भवेत् कश्चिद्यश्चरेत् सप्तमीव्रतम्।
नारीहस्त्यश्वयानानां विविधानां च वाससाम् ॥२५॥
ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक तथा रुद्रलोक में उसकी अप्रतिहत गति हो जाती है। उसके वंश में कोई भी अन्धा, कुष्ठी, क्लीब, अंगहीन अथवा निर्धन व्यक्ति जन्म नहीं लेता (जो सप्तमी व्रतानुष्ठान करता है, उसके वंश की बात कही गयी है)। सप्तमी व्रतकारी को नारी, हाथी, अश्वादि यान, विविध वस्त्र भोगार्थ प्राप्त होते हैं।।२४-२५।।
ध्रुवं स भाजनं साम्ब यश्चरेत् सप्तमीव्रतम्।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी धनमाप्नुयात् ॥२६॥
भार्यार्थी रूपसम्पन्नां लभेद् भार्यां कुलोद्भवाम्।
पुत्रार्थी श्रुतसम्पन्नांल्लभेत् पुत्रांश्चिरायुषः ॥२७॥
विद्यार्थी को विद्या एवं धनार्थी को धन मिलता है। भार्यार्थी को भार्या जो रूपसम्पन्न एवं सद्वंश में उत्पन्न है, प्राप्त होती है। पुत्रार्थी दीर्घायु पुत्रों को प्राप्त करता है।।२६-२७।।
भोगार्थी लभते भोगान् व्रतेनानेन यादव।
मोहात् प्रमादाल्लोभाद्वा व्रतभङ्गं समाचरेत् ॥२८॥
त्रिरात्रं न तु भुञ्जीत कुर्याद्वा केशमुण्डनम्।
प्रायश्चित्तमिदं कृत्वा पुनरेव व्रती भवेत् ॥२९॥
हे यादव! इस व्रत से भोगार्थी समस्त भोगों को प्राप्त करते हैं। यदि मोह से, प्रमाद से अथवा लोभ से व्रतभंग हो जाय, तब दिन-रात भोजन न करे अथवा बाल का मुण्डन कराये। ऐसे प्रायश्चित्त को करके पुनः व्रतानुष्ठान करना चाहिये।।२८-२९।।
२५४ श्रीसाम्बपुराणम्
सप्तैव यावत् संप्राप्ताः सप्तम्यः सप्तसद्गुणाः । अभ्यर्च्य सूर्यं सप्तम्यां माल्यधूपादिभिर्नरः ॥३०॥ भोजयित्वा द्विजान् भक्त्या प्राप्नुयात् स्वर्गमक्षयम् । सप्तम्यां विप्रमुख्येभ्यो वस्तु यद्यत् प्रयच्छति ॥३१॥ तत्तदक्षयमाप्नोति सूर्यलोकं स गच्छति । इति ते कीर्तितः साम्ब सप्तम्या विधिरुत्तमः ॥३२॥
सात गुणान्वित सात सप्तमी व्रत जब अनुष्ठित हो जाता है, उस सप्तम सप्तमी को माला-धूप आदि से सूर्य की अर्चना करके भक्ति से ब्राह्मणों को भोजन कराने से अक्षय स्वर्ग मिलता है। सप्तमी को श्रेष्ठ ब्राह्मणों को जो-जो वस्तु दान में दिया जाता है, वह अक्षय हो जाता है (दान अक्षय हो जाता है)। वह व्यक्ति सूर्यलोक प्राप्त करता है। हे साम्ब! इस प्रकार तुमसे उत्तम तिथि सप्तमी का वर्णन किया॥३०-३२॥
भूय एवाभिधानस्य शृणुष्वैकाग्रमानसः । यः कुर्याद् गोमयाहारः शुक्ला द्वादशीसप्तमी ॥३३॥ अथवा यवकाहारः शीर्णपत्राशनोऽथवा । क्षीराशी चैकभक्तोऽथ भिक्षाहारोऽथवा पुनः ॥३४॥ जलाहारोऽपि वा विद्वान् पूजयित्वा दिवाकरम् । पुष्पोपहारैर्विविधैः नैवेद्यैः सुमनोहरैः ॥३५॥ नानाप्रकारैर्गन्धैश्च धूपैर्गुग्गुलचन्दनैः । कृसरैः पायसान्नाद्यैर्विविधैश्च विभूषणैः ॥३६॥ अर्चयित्वा द्विजाञ्छ्रेष्ठान् हिरण्यान्नादिभिर्नरः । स यत्फलमवाप्नोति तच्छृणुष्व समाहितः ॥३७॥
और भी कहता हूँ, एकाग्र होकर सुनो। जो गोमय का भक्षण करके शुक्ल पक्ष की द्वादशी को सप्तमी व्रत का अनुष्ठान करते हैं (?) अथवा यवक आहार, शुष्क पत्ते का आहार अथवा दुग्ध पीकर रहते हैं, अथवा मात्र एक बार भोजन अथवा भिक्षा का आहार करते हैं, अथवा केवल जल पीकर जो विद्वान् पुष्पोपहार, विविध मनोहर नैवेद्य, खिचड़ी, पायस, अन्नादि तथा विविध आभूषणों से सूर्य की पूजा करते हैं, श्रेष्ठ ब्राह्मणों की अन्नादि से अर्चना करते हैं, वे जो फल प्राप्त करते हैं, उसे समाहित होकर सुनो॥३३-३७॥
काञ्चनेन विमानेन मनो मारुतरंहसा । वैडूर्यमणिरत्नेन किङ्किणीजालमालिना ॥३८॥ कुण्डलाङ्गदभूषाढ्यैर्गीयमानोऽप्सरोगणैः । विचित्रमालाभरणैः स याति सूर्यलोकताम् ॥३९॥
मनोहर वायु की गति से स्वर्णमय विमान में वैदूर्य मणि रत्न, किङ्किणी जाल,