भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २३७

तृण-छेदन नहीं करना चाहिये। नख को साफ रक्खे, सर्वदा जूठन ग्रहण न करे। संशयापन्न मन वाला न हो। सदा अच्छे केश धारण करे।

ब्राह्म मुहूर्त में उठकर धर्म के लिये सत् चिन्तन करे। तदनन्तर आचमन करके पूर्व तथा पश्चिम सन्ध्या (प्रातः तथा मध्याह्न सन्ध्या) वन्दन करे।

उदीयमान, अस्तगामी, जलस्थित, मध्याह्नकालीन सूर्य को न देखे। परस्त्री-गमन न करे। मध्याह्नकाल में केश-प्रसादन, दन्तधावन अथवा सूर्य के अतिरिक्त अन्य देवता का पूजन नहीं करे। मल-मूत्र न रोके तथा उन्हें न देखे। असच्चरित्र के साथ वार्ता न करे। ग्राम की कर्षण भूमि (खेती भूमि) में मलत्याग न करे। जल में विष्ठा अथवा मूत्र-त्याग न करे। भस्म अथवा अस्थि पर नग्न होकर न जाय। पूर्व की ओर मुख करके अन्नग्रहण न करे तथा कदन्न (कुत्सित या बासी अन्न) भोजन न करे। भोजन करके अग्नि स्पर्शोपरान्त समस्त प्राणों का स्पर्श करे। तुष, केश, भस्म, कपास, अस्थि का स्पर्श न करे। शरीर का मार्जन न करे तथा पसीना-युक्त अवस्था में न रहे।

शान्ति, होम आदि पवित्र कर्म कराये। सुप्त अथवा गमनकारी वृद्ध को न उठावे अर्थात् न बैठाये। भीगे तथा बिना धुले पात्र में भोजन न करे। अग्नि अथवा ब्राह्मण का जूठन-लङ्घन न करे। सूर्य तथा चन्द्र को एक साथ न देखे तथा नक्षत्र की ओर न ताके। वृद्ध को आते देखकर उठकर अभिवादन करके उसे आसन पर बैठाये। चलते समय वृद्ध के पीछे-पीछे चलना चाहिये। टूटे काँसे के पात्र में भोजन नहीं करना चाहिये। नग्न होकर स्नान न करे, नग्न होकर शयन भी न करे। जूठे हाथों से मस्तक का स्पर्श नहीं करना चाहिये। सर के बाल नहीं खींचना चाहिये। दोनों हाथों से माथा नहीं खुजलाना चाहिये। बार-बार डुबकी लगाकर स्नान न करे तथा दो बार स्नान न करे। माथा डुबोकर स्नान करने पर तैल से अंग का स्पर्श न कराये। घृत तथा मधु एक साथ विषतुल्य है। मूँग तथा तिल मिलाकर न खाये (एक साथ न खाये)। उच्छिष्ट अवस्था में अध्ययन तथा अध्यापन न करे। सड़ी गन्धयुक्त वायु में भी अध्ययन तथा अध्यापन नहीं करना चाहिये।

इस प्रसङ्ग में यम द्वारा एक गाथा कही गयी है—जो व्यक्ति उच्छिष्ट अवस्था में पाठ करता है अथवा स्वाध्याय करता है, उसकी आयु नष्ट होती है, उसके पुत्रादि नाक से बोलने वाले होते हैं।

सूर्य, वायु, अग्नि, चन्द्र, जल, गौ, ब्राह्मण तथा नक्षत्र की ओर मूत्रत्याग न करे। दिन तथा सन्ध्या काल में उत्तर की ओर मुख करके, रात्रि में दक्षिण की ओर मुख करके तृणाच्छादित भूमि में कमर ढ़ककर मल-मूत्र का त्याग करे।

आमिष भोजन तथा श्राद्ध का भोजन करके सन्ध्या नहीं करे। ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा सर्पों की अवज्ञा न करे। मिथ्या तथा सत्य द्वारा गुरु को अनुबद्ध करे। गुरु की निन्दा