साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३८ | श्रीसाम्बपुराणम्
कदापि न करे। जहाँ गुरुनिन्दा हो रही हो, वहाँ दोनों कान बन्द कर ले अथवा वहाँ से दूर चला जाय। मूत्र-त्यागोपरान्त पैर धोकर जल द्वारा हाथों की भी मार्जना करनी चाहिये। अत्यन्त प्रातः, मध्याह्न में तथा सन्ध्या काल में शूद्रादि के साथ न जाय। गौ, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वृद्ध, भार से दबे, गर्भिणी तथा दुर्बल के लिये मार्ग से बगल होकर उन्हें मार्ग देना चाहिये। बिना धुले वस्त्र न पहने। पैरों से किसी पर आक्रमण न करे। अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा तथा अमावस्या को ब्रह्मचारी रहना चाहिये। वृथा मांस (जिसे देवताओं को अर्पित न किया हो), भ्रष्ट मांस (जीवादि पड़े, कीटाणु पड़े, जीवों द्वारा मारे गये तथा अग्नि पर सेंका गया मांस) कभी न खाये। आक्रोश, निन्दा, चुगली, नृशंसता का त्याग करे। किसी के दिल को चोट न पहुँचाये। हीन लोगों से उत्कृष्ट वस्तु भी ग्रहण न करे। अन्य का गोपन दोष लोगों के समक्ष प्रकट न करे। हीन अंग वाले (अंधे, लंगड़े, अंगरहित) तथा अतिरिक्त अंग जिनका है, उनसे घृणा न करे। जो रूपवान, धनवान, ज्ञाति, झूठे तथा निन्दित एवं विगर्हित हैं, उनसे घृणा न करे। नास्तिक, वेदनिन्दक, द्वेष, दम्भ, अभिमान तथा कठोरता का परित्याग कर देना चाहिये।
अन्य को दण्ड देने की इच्छा न करे। क्रुद्ध होने पर भी आघात न करे। तब भी भार्या, पुत्र, दास-दासी, शिष्य तथा भाईयों पर शासन तो करना ही चाहिये (अनुशासन हेतु)। कभी भी ब्राह्मण की निन्दा न करे। तिथि नक्षत्र गणना कार्य न करे। मल-मूत्र त्याग करके अथवा सड़क से वापस आकर पैर धोना चाहिये। तिल, आधा पका जौ, खिचड़ी, मांस, तण्डुलादि मिश्रित यवागू अथवा पायस अपने लिये तैयार न करे (अर्थात् केवल अकेले न खाये, बाँट कर खाये)।
जो नित्य अग्नि का होम करते हैं, उनको नित्य भिक्षा दे। वाक् संयम करके (मौनी रहकर) पूर्वमुख होकर प्रशस्त दतुअन चबाये। सूर्योदय के पश्चात् सोना नहीं चाहिये। प्रातः उठकर पिता तथा आचार्य को प्रणाम करे। दाँत साफ किये बिना देवपूजा तथा गमनागमन न करे।
गुरु-वृद्ध तथा धार्मिक की ओर एवं सब ओर न देखकर केवल उत्तर पश्चिम की ओर शिर रखकर न सोये अर्थात् गुरु, वृद्ध, धार्मिक की ओर पैर न करे तथा उत्तर एवं पश्चिम की ओर सिर करके न सोये। सर नीचा करके अथवा शिखा ऊपर रखकर, टूटी जीर्ण शय्या पर, पैरों से खींच कर बिना साफ किये आसन पर न बैठे। सूर्य की पूजा-कथा, भक्तिकार्य (सेवाकार्य) कराये। यह सब धर्म यम से प्राप्त होता है (अर्थात् धर्मराज फल देते हैं)।
नित्य ब्राह्मण-भोजन कराये; विशेषतः जो भगवान् की कथा कहते हैं, उनको भोजन कराये। अस्पृश्य द्रव्य को छोड़कर सब कुछ खा सकते हैं। रात्रि में स्नान करना उचित नहीं है। स्नान करके शरीर-मार्जन न करे, स्नानोपरान्त तैलादि न लगाये। स्नान करके