साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 249, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २३९
गीले कपड़ों में न रहे। वस्त्रों को उड़ाये (फहराये) नहीं। माला को मसलना, तोड़ना उचित नहीं है। उसे बाहर धारण न करे। रक्तमाला धारण न करे। कमल, नीलपद्म, अम्लान असन पुष्प की माला के अतिरिक्त शुभ्र माला धारण करे।
(यहाँ 'स्नातस्य वर्णमां दद्यात्' का अर्थ स्पष्ट नहीं है)। श्वास का विपर्यय न करे। अन्य का पहना वस्त्र न पहने तथा जीर्ण एवं मलिन वस्त्र का व्यवहार न करे। सम्भव होने पर भी अन्य की शय्या, द्रव्य तथा अन्य के देवता-विग्रह को ग्रहण न करे। कीट-केशादि युक्त तथा सत् निकाले द्रव्य का भक्षण करना उचित नहीं है। अन्य देवता को अर्पित पिदाल शाक, गूलर-प्रभृति तथा बकरा-भेंड़ा-गौ-मयूर का शुष्क तथा बासी मांस न खाये। खाली हाथ पर नमक ग्रहण न करे। (यहाँ 'श्वादव्यापदं स्पृष्ट्वा भूभ्रूणहेक्ष्यित तत अर्चलीढ़ाघ्रातं च' का अर्थ संदिग्ध तथा अस्पष्ट होने के कारण नहीं दिया जा रहा है)।
रात्रि में दधि एवं सत्तू न खाये। श्लोकीस (?) का भी वर्जन करे। बालक तथा अन्य के पुत्र का भी वर्जन करे। प्रातः शाक का भोजन करे। असमाहित होकर अन्य समय शाक न खाये। वाक् संयम करके एक पात्र में नग्नावस्था में बैठकर कोई शब्द न करे (? तात्पर्य समझ में नहीं आता)। अन्त में किसी अन्य का जल तथा अन्न अतिथियों देकर भक्षण न करे। एक पंक्ति में भोजन करने वालों के साथ दधि-मधु-सत्तू तथा पानीय का भोजन करे। पात्र में बची वस्तु किसी को न दे। दधि को शुभ्र भोजन के साथ मिलाकर ग्रहण करे।
आचम्य चैकहस्तेन परिश्राव्यं तथोदकम्।
अंगुष्ठे चरणस्याथ दक्षिणस्यावसेचनम्॥७॥
पाणिं मूर्ध्नि समाधाय स्पृष्ट्वाग्निं सुसमाहितः।
ज्ञातीनां श्रेष्ठतामेति प्रयोगकुशलो नरः॥८॥
एक हथेली पर जल लेकर आचमन करना चाहिये। तत्पश्चात् दाहिने पैर के अंगूठे पर जल छोड़े। तदनन्तर हाथ को मस्तक पर रखकर सावधान हो अग्नि का स्पर्श करे। इससे प्रयोगनिपुण व्यक्ति ज्ञातिगण में प्रधानता प्राप्त करता है॥७-८॥
आर्द्रपाणिना नाभिघ्राणपाणितलाभिन्न स्पृशंस्तिष्ठेत्। पतितकथां दर्शनं संसर्गश्च वर्जयेत्। परापवादमप्रियवचनं न ब्रूयात्। न कस्यचिन्मन्युमुत्पादयेत्। न दिवा मैथुनं गच्छेत्। कन्याबन्ध्यकीमज्ञातां गर्भिणीं व्यङ्गां वृद्धां प्रव्रजितां पतिव्रतीं वर्णोत्कृष्टां निकृष्टवर्णां पिङ्गलीं कुष्ठिनीं योगिनीं चित्रिणीं स्वकुलजां ज्ञातिसम्बन्धहीनामपस्मारिणीं च वर्जयेत्। अगम्यां न गच्छेत्। राजसखावैद्यबालवृद्धमृत्युशरणागतसम्बन्धि ब्राह्मणी तदन्येषां स्त्रियं वन्ध्यां च वर्जयेत्। निष्ठीव्य क्षुत्वा न शुचिर्भवेत्।