भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 250

२४० श्रीसाम्बपुराणम्

वृद्धो गतिरवशत्रो मित्राणि शुकसारिकाः।
पारावताः पुण्यकृताः गेहे स्युस्तैलपायिकाः ॥१९॥

गीली हथेली से पाणितल (हथेली के तल) के अतिरिक्त नाभि तथा नासिका का स्पर्श न करे (अर्थात् हथेली के तल से स्पर्श न करे)। पतितों से वार्त्ता, उनको देखना तथा उनसे संसर्ग रखना छोड़ दे। अन्य की निन्दा न करे तथा अप्रिय वचन न बोले। किसी में क्रोध उत्पन्न नहीं करना चाहिये (क्रोधित न करे)। दिन में मैथुनासक्त न हो। कन्या, पालिता, अज्ञाता, गर्भिणी, अंगहीना, वृद्धा, प्रब्रजिता (संन्यासिनी), व्रतचारिणी, अपनी अपेक्षा उच्च वर्ण वाली, हीन वर्ण वाली, पिङ्गला, कुष्ट रोगग्रस्त, योगिनी, चित्रिणी, अपने वंश में उत्पन्न, जाति-सम्बन्धरहित, अपस्मार रोग से ग्रस्त का वर्जन करे। अगम्या गमन न करे। राजा के सखा, वैद्य, बालक, वृद्ध, मरणोन्मुख—इनकी सम्बन्धन्वित तथा ब्राह्मणी एवं अन्य की स्त्री का भी वर्जन करे। वमन करने तथा नख काटने से पवित्रता नहीं होती। वृद्ध, अवसन्न, मित्र, शुक, सारिका, कबूतर, तैलपक्षी—ये सब घर के लिये मंगलकारी होते हैं॥१९॥

सन्ध्यायां स्वाध्यायं भोजनं न च कुर्यात्। न नक्तं पित्राणि, न प्रसाधनं न च पण्यक्रिया कदाचित्कार्या। दैवे पित्र्ये स्वनक्षत्रे च शिरःस्नातो भवेत्। न पृष्ठपदयो- रग्निं दद्यात्। प्रेतस्य सन्ध्यायां नोच्चरेत् प्रयत्नतः स्यात्। इच्छामपि कुर्वता दारा रक्ष्याः। न दिवास्वापः आयुषे पूरे निशायाश्च। अवृतो यज्ञं न गच्छेदन्यत्र दर्शनात्। नैको रात्रौ व्रजेत्। अनागतायां पश्चिमसन्ध्यायां गृहमधिवसेत्। मातृपितृवचनं हितमहितं चय्यमेव विचार्य। धनुर्वेदहस्तिहयपृष्ठरथचर्य्यासु प्रयत्नः कार्य्यः। युक्तिशब्दकला- गान्धर्वशास्त्रपुराणेतिहासाख्यानमाहात्म्यचरिताभिज्ञेन भवितव्यम्। आदित्यव्रतं सप्तम्यां चरेत्। न गां पादेन स्पृशेत्। गोरज्जुं न लङ्घयेत्। न्यासविश्वासहारिमधम्र्म्यमहतोगो- ब्राह्मणस्त्रीषु न शूरः स्यात्, अकृतज्ञश्च। एको मिष्टं नाश्नीयात्। स्त्रीभ्यः स्त्रीबन्धुभ्यश्च वृत्तिं नाशयेत्। अत्र गाथाः—

आक्रोशकसमालोके सुहृदन्यो न विद्यते।
यस्तु दुष्कृतमादाय सुकृतेनाभिशंसति ॥२०॥

सन्ध्या समय में वेदाध्ययन-अध्यापन तथा भोजन न करे। रात में पितृकार्य, प्रसाधन, वाणिज्य आदि कभी न करे। दैवकार्य, पितृकार्य में तथा अपने नक्षत्र में डुबकी लगाकर स्नान करे। पीठ घुमाकर अथवा पैर से अग्नि ग्रहण न करे। सन्ध्याकाल में (भूत) 'प्रेत' शब्द का उच्चारण नहीं करना चाहिये। इच्छापूर्वक सर्वदा स्त्री की रक्षा करना उचित है। दिन में सोना उचित नहीं है। पूर्ण परमायु के लिये रात्रि के प्रथम भाग में भी नहीं सोना चाहिये। देखने के अतिरिक्त अवृत स्थिति में यज्ञस्थल में नहीं जाना चाहिये। रात्रि में एकाकी कहीं न जाय। रात्रि समाप्त न होने पर घर में ही रहना उचित है। माता-पिता का वाक्य हित हो अथवा अहितपूर्ण, उसे विचार कर करे। धनुर्वेद शिक्षा, हाथी तथा