भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २४१

घोड़े की सवारी तथा रथचालन में सदा सावधान रहे। न्यायादि तर्कशास्त्र (युक्ति), शब्द (व्याकरणादि शब्दानुशासन), कला (नृत्यादि), गान्धर्वशास्त्र (गीतादि), पुराण, इतिहास (पुरावृत्त), आख्यान (गल्पादि) तथा माहात्म्य (महिमा से इनकी) चरित से अभिज्ञ रहे। इन्हें जाने।

सप्तमी को आदित्य का व्रत करे। गाय का स्पर्श पैर से न करे। गाय के बाँधने की रस्सी अथवा सिक्कड़ को भी न लाँघे। (यहाँ 'न्यासविश्वासहारिमधौमयमहतों' का अर्थ स्पष्ट नहीं है, अतएव अनुवाद नहीं किया गया)। गौ, ब्राह्मण तथा स्त्रीगण के प्रति बहादुरी नहीं दिखाये तथा अकृतज्ञ न हो। अकेले मिठाई न खाये। महिलाओं से तथा स्त्री के बान्धवों से (श्वसुरालय वालों से) जीविका ग्रहण न करे।

इस विषय में कहा गया है कि निन्दक के समान कोई बन्धु नहीं है। वह जिसकी निन्दा करता है, उसका पाप ग्रहण कर लेता है और अपना पुण्य उसे प्रदान कर देता है॥१०॥

कूटसाक्षी न भवेत्। शरणागतं न परित्यजेत्। दानं न कीर्त्तयेत्। बल्वजानां दानेन कांस्यदोहनेन परवत्सेन च गौर्न दोग्धव्या। पत्नीं रजस्वलां नाभिगच्छेत्। शुद्धस्नातां चतुर्थ्यां वा षोडशीं समविषमदिनेषु पुत्रैर्दुहितृकामो निर्विकारोऽधिशयीत। नाग्नाममेध्यं प्रक्षिपेत्।

न वर्षति धावेत्। न च वातेनापचत्। अनिष्ट्वा नवं सस्यं नाद्यात्। शुक्लवस्त्रधारी स्यात्। श्मश्रुकेशनखान्नादीर्घान् बिभृयात्। नोदके स्वरूपं पश्येत्। नापः परिचक्षीत, भार्यया सह नाश्नीयात्। न तामीक्षेत् सुखासीनामश्नन्तीं क्षुवन्तीं सृष्टमैथुनां जृम्भमाणां च परस्त्रियं च नग्नाम्। नाग्निं मुखेन धमेत्। न पादौ प्रतापयेत्। अधस्तान्नोपद्ध्यात्। नैनं लङ्घयेत्। न पादतः कुर्यात्। न भूमिं प्रविलिखेत्। ष्ठीवनामेध्यलिप्तरुधिरवसास्थीनि न जले क्षिपेत्। शून्यगृहे नैकः शयीत। न चाग्निगुरुदेवद्विजपतिधेन्वध्ययनभोजनेषु दक्षिणपाणिमुद्धरेत्। न वारयेद् गां चरन्तीं परसस्यमादयन्तीं परस्मै नाचक्षीत। दिवीन्द्रायुधं दृष्ट्वा न कस्यचिद्दर्शयेत्।

अधार्मिकदेशे न वसेत्। व्याधिबहुलो नैको वीथीं प्रपद्येत्। पर्वते न चिरं वसेत्। वृथा चेष्टामञ्जलिना जलपानमुत्सङ्गेन भक्ष्याभक्षणं, कुतूहलं त्यजेत्। नृत्यगीतवादित्रास्फोटनाक्ष्वेलनानि च विरक्तोऽपि नेक्षेत। कांस्यभाजनेन न पादं प्रक्षालयेत्, पादेन च वन्दितश्वादिभिर्न व्रजेत्। बालातपप्रेतधूमसंमार्जनीरजांसि परिहरेत्। न द्यूतं क्रीडेत्। न स्वयमुपानहौ हरेत्। शयनस्थो नाश्नीयात्। न पाणिस्थाने चासनेन बाहुभ्यां नदीं प्रतरेत्। न वृक्षमारोहेत्। न सन्दिग्धां नावमारोहेत्। न कूपमवतरेत्। न देवद्विजगुरुराजस्नातकाचार्य्यमैथुनवासः, न च भुक्त्वा स्नायात्, नातुरो न महानिशि, नाविज्ञाते जलाशये, न वासोभिरजस्रम्। वैरीतत्सहायाधार्मिकतस्करसेवापरिहर्तव्या।