भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 252

२४२ | श्रीसाम्बपुराणम्

सतीप्रियं सत्यं ब्रूयात्। सत्यमप्रियं प्रियमनृतं च न ब्रूयात्। शुष्कवैरवचनं वर्जयेत्। सर्वं मङ्गलाचरणयुक्तः स्यात्। सर्वगात्राणि नखानि नाभिपाणितलेन न स्पृशेदमन्त्रतः। रहस्यानि रोमाणि वर्जयेत्। देवद्विजोत्तमगुरून् सेवेयेत्, ईश्वरं च रक्षार्थम्। परवशकर्म जहात्। आत्मवशं कुर्वीत सुखार्थी। अन्तरालपरितोषकृद्धार्मिकः स्यात्। अर्थकामौ धर्मविवर्जितौ त्याज्यौ। वाक्पाणिपादनेत्रचपलो न भवेत्। परद्रोही च ऋत्विक्पुरोहिताचार्यमातुलातिथिशाश्रितवृद्धबालातुरवैद्यज्ञातिसंबन्धिबांधव-मातृपितृभार्यादुहितृभिर्विवादं न समाचरेत्। गोहिरण्यभूम्यश्ववासोऽन्नतिलघृता-न्यविद्वान्न प्रतिगृह्णीयात्। परकीयनिखातेषु न स्नायात्। वापीं च सप्तपिण्डानुद्धृत्य। नदीदेवखातप्रस्रवणेषु स्नानं कुर्यात्।

कृद्धमन्दातुरप्रेष्यगणिकाविद्वज्जुगुप्सितं स्तेनतक्षकवार्धुषिकगायककदर्य-दीक्षितम्। निन्द्यबद्धाभिशस्तशठपुंश्चलीबन्दिचिकित्सकम्, पूगान्त्रशूद्रोच्छिष्टशुष्क-पर्युषितावक्षतुं नाद्यात्। द्विषतश्चायुष्कामः सुवर्णकारान्नं परिहरेत्। अनध्यायिनं वर्जयेत्। तृप्त्यतिशयसुखप्रजा चक्षुर्भूत्यायुरग्रवेश्मरूपचन्द्रसूर्यसालोक्येष्टभार्याशा-श्रुतसर्वैश्वर्यब्रह्मलोकावाप्तिकामः सूर्यनिमित्तछत्रोपानहौ च दद्यात्। उत्तमोत्तमसम्बन्ध्या-वित्तकुलोन्नतिकामः शयनगृहकुशबन्ध्यपुष्पोदकमणिदधिमत्स्यपयोमांसशाका निरग्निर्नुदेत्। देवतातिथिगुरुभूत्यार्चनोद्धरणे कामः अध्यात्मज्ञाननिरतः स्यात्।

इति ते कीर्तितः सम्यगाचारः पुण्यलक्षणः।
आयुर्लक्ष्मीयशोभूतिकारणं ब्रह्मनिर्मितम् ॥१९॥

कूटसाक्षी (जो मिथ्या प्रतारणामूलक गवाही देता है) न बने। शरण में आये का त्याग न करे। दान करके उसका बखान नहीं करना चाहिये। राहु का दान करे। काँसा के पात्र में गोदोहन न करे। अन्य गाय के बछड़े को लगाकर गाय का दोहन नहीं करे। ऋतुमती पत्नी के साथ मैथुन न करे। शुद्ध स्नाता पत्नी के साथ चतुर्थ दिन या सोलहवें दिन समान अथवा विषम दिन पुत्र अथवा कन्या की कामना से निर्विकार होकर शयन करे। नग्न स्त्री पर अमेध्य वस्तु का क्षेपण नहीं करना चाहिये।

बरसात में न दौड़े। हाथ हिलाकर हवा करके अन्न न पकाये। अनिष्टकारी पुरातन शस्य न खाये। शुभ्र वस्त्र पहने। दाढ़ी, बाल तथा नख को न बढ़ाये। जल में अपनी आकृति न देखे। जल को (पशु के समान) जीभ से न चाटे। स्त्री के साथ एक साथ भोजन न करे। सुखासीना, भोजनकारिणी, भूखी, स्पृष्ट मैथुना तथा जंभाई लेती स्त्री को एवं नग्न परस्त्री को न देखे।

सीधे मुख की हवा से अग्नि को न जलाये (बाँस की नली से फूँक मारे)। अग्नि से ऊपर पैर न सेंके। देह के नीचे की ओर अग्नि का ताप ग्रहण नहीं करना चाहिये। अग्नि को लाँघना उचित नहीं है। भूमि पर नहीं लिखे। थूक, अमेध्यलिप्त वस्तु, रक्त, वसा