भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 424 में से

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चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २४३

तथा अस्थि को जल में न फेंके। शून्य गृह में एकाकी न सोये। अग्नि-गुरु-देवता-ब्राह्मण, पति, धेनु, अध्ययन तथा भोजन—सबसे दाहिने हाथ से व्यवहार करे। तृण खा रही गाय को हठात् रोकना नहीं चाहिये। यदि वह अन्य की फसल खा रही हो, तब भी उस व्यक्ति को न बताये। आकाश में इन्द्रधनुष देखकर अन्य को नहीं दिखलाना चाहिये कि यह देखो इन्द्रधनुष है।

अधार्मिक देश में न रहे। व्याधिग्रस्त अवस्था में एकाकी यात्रा न करे। पर्वत पर दीर्घकाल-पर्यन्त नहीं रहना चाहिये। वृथा चेष्टा, अञ्जली से जल पीना, गोद में रखकर भोजनादि करना तथा कुतूहल का परित्याग करे। नृत्य-गीत-वाद्य-वीरों का बाहुशब्द तथा कुत्सित गायन अथवा क्रीड़ा आदि को विरक्त त्यागी स्थिति हो जाने पर भी न देखे। कांस्य पात्र में पैर न धोये। पैदल स्थिति में शब्दकारी अश्वादि के साथ न चले। उदीयमान सूर्य, श्मशान की धूम, झाड़ू की धूल (हवा) का त्याग करे। लेटे हुये न खाये। हथेली पर अथवा आसन पर रखकर न खाये। हाथ से (पानी काटकर अर्थात् तैरकर) नदी पार नहीं करना चाहिये।

वृक्ष पर न चढ़े। सन्देहप्रद नौका पर न बैठे। कूंयें में न उतरे। देवता-ब्राह्मण-गुरु-राजा-विद्यार्थी तथा मैथुनकारी के साथ न रहे। भोजनोपरान्त स्नान न करे। अस्वस्थावस्था में, गम्भीर रात में तथा अज्ञात जलाशय में स्नान नहीं करना चाहिये। अधिक वस्त्र पहन कर भी स्नान न करे। शत्रु, शत्रु के सहायक, अधार्मिक तथा चोर की सेवा करना छोड़ देना चाहिये।

सदा प्रिय सत्य बोले। अप्रिय सत्य तथा प्रिय झूठ कदापि नहीं बोलना चाहिये। अनर्थक शत्रुता तथा अनर्थक वाक्य का वर्जन करना चाहिये। समस्त मंगल आचरण करे। समस्त अंग, नख, नाभिदेश तथा पाणितल का मन्त्र के विना स्पर्श न करे। गोपन स्थान तथा समस्त रोमों का वर्जन करे। देवता, ब्राह्मण तथा गुरु की पूजा करनी चाहिये। अपनी रक्षा हेतु ईश्वर की सेवा करना उचित है। दूसरे के अधीन होकर कार्य करना छोड़ दे। सुखाभिलाषी अपने अधीन होकर कार्य करे। अन्तरात्मा को सन्तोष देने वाले विधान का पालन करके धार्मिक बने। धर्महीन अर्थ तथा काम का त्याग करना ही उचित है। वाणी, हाथ, पैर तथा नेत्र को बेकार न नचाये।

अन्य के साथ द्रोह का आचरण नहीं करना चाहिये। पुरोहित, आचार्य, मामा, अतिथि, आश्रित, वृद्ध, बालक, आतुर, वैद्य, ज्ञाति, सम्बन्धी, बान्धव, माता-पिता, भ्राता, विमाता, कन्या तथा भृत्य के साथ विवाद नहीं करना चाहिये। गौ, स्वर्ण, भूमि, अश्व, वस्त्रादि, अन्न, तिल तथा घृत को जाने बिना इन्हें ग्रहण न करे। दूसरे के खोदे जलाशय में स्नान नहीं करे। सप्त पिण्ड का दान किये बिना दूसरे के जलाशय में स्नान नहीं करना चाहिये। नदी, अपने-आप जो जलाशय बना है तथा प्रस्रवण में स्नान करना उचित है।

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