साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४४ श्रीसाम्बपुराणम्
क्रुद्ध, दुष्ट जन, आतुर, दास, गणिका, विद्वान् के निन्दक, चोर, सूत्रधार, गायक तथा निन्दित का अन्न ग्रहण न करे। निन्दक, अभिशप्त, शठ, पुंश्चली (वेश्यादि), बन्दी तथा चिकित्सक का अन्न ग्रहण न करे। पूगान्त्र (सुपारी-मिश्रित अन्न), शूद्र का जूठा, शुष्क-बासी-सड़ा, मिट्टी में पड़ा (हिचकी के समय मिट्टी में गिरा) अन्नादि ग्रहण नहीं करना चाहिये।
आयु चाहने वाला व्यक्ति शत्रु का तथा स्वर्णकार का अन्न त्याग दे। जो अध्ययन नहीं करते, उनका साथ न करे। तृप्ति, अतिशय सुख, पुत्रादि, चक्षु, उन्नति, आयु, गृह, रूप, चन्द्र, सूर्य, सालोक्य, अभिलषित वस्तु, भार्या, नित्य ऐश्वर्य तथा ब्रह्मलोक-प्राप्ति की कामना से सूर्य को छत्र तथा पादुका देनी चाहिये। उत्तम सम्बन्ध, धन-सम्पत्ति, वंश की उन्नति-कामना, शय्या, गृह, कुशबन्ध, पुष्प, जल, मणि तथा दधि, मत्स्य, दुग्ध, मांस, शाक का दान करे। देवता, अतिथि, गुरु-सेवक की अर्चना द्वारा उद्धार की कामना से निरन्तर आत्मा के सम्बन्ध में चेष्टारत रहना चाहिये।
हे साम्ब! तुमसे यह पुण्यलक्षण आचार की वर्णना सम्यक् रूप से कहा, जो आयु, धन-सम्पत्ति, फल तथा उन्नति का कारण है तथा ब्रह्मा द्वारा निर्मित है।।११।।
आचारयुक्तः पुरुषः प्रेत्य चेह च मोदते।
आचाराद्वर्द्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम् ॥१२॥
दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः।
दुष्टभोगी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥१३॥
आचारपरायण व्यक्ति परलोक तथा इहलोक में सुख प्राप्त करते हैं। आचार द्वारा आयु की वृद्धि होती है और आचार अलक्षण का विनाश करता है। दुराचारी पुरुष इस जगत् में निन्दित होता है। वह दुष्ट भोगों तथा व्याधि का सर्वदा भोग करके अल्पायु हो जाता है।।१२-१३।।
तस्माद् भवेत् सदाचारः समुदा श्रीरवेर्नरः।
देवस्य प्रियतामेति लक्ष्मीं विन्दति निश्चलाम् ॥१४॥
इति श्री साम्बपुराणे आचारलक्षणं नाम चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
अतएव लोक आनन्द से सूर्य के सदाचार से सम्पन्न हों। इससे सूर्यदेव की अचल सम्पदा तथा प्रीति मिलती है।।१४।।
श्री साम्बपुराणान्तर्गत सदाचार कथन नामक चौवालीसवाँ अध्याय समाप्त।