भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

(छत्र-पादुकयोर्दानफलम्)

साम्ब उवाच

इदमुक्तं त्वया ब्रह्म छत्रं सूर्येण निर्मितम्।
उपानहौ च यो दद्याच्छक्रलोकं स गच्छति ॥१॥
एतदाचक्ष्व भगवन् कथं सूर्यविनिर्मितम्।
छत्रपादुकयोर्दानमध्वतान्तर्हि जायते ॥२॥

साम्ब कहते हैं—आपने बतलाया है कि सूर्य ने छत्र तथा पादुका का निर्माण किया है तथा जो छत्र तथा पादुका दान करता है, वह इन्द्रलोक जाता है। हे भगवन्! अब यह कहिये कि किस प्रकार सूर्य-विनिर्मित छत्र तथा पादुका-दान के फल से द्विजत्व प्राप्त होता है॥१-२॥

नारद उवाच

एतत्ते संप्रवक्ष्यामि यथावृत्तमिदं पुरा।
जमदग्निः किल शरान् पुरा चिक्षेप भार्गवः ॥३॥
तान् क्षिप्तान् रेणुका तस्य भानोर्जाज्वल्य तेजसः।
आनीयासीददात्तस्य सा च शीघ्रमनिन्दिता ॥४॥
अव्यक्तेन सुशब्देन ज्यातिलस्य शरस्य च।
प्रहृष्टः सम्प्रचिक्षेप सा च प्रत्याजहार तम् ॥५॥

नारद कहते हैं—इस विषय में पूर्वकाल में जो घटना घटित हो चुकी है, वह तुमसे कहता हूँ। भार्गव जगदग्नि ऋषि बाण छोड़ रहे थे और उनकी पत्नी अनिन्दिता रेणुका सूर्य के जाज्वल्य तेज में भी उन तीरों को शीघ्र उनके पास लाती जा रही थीं। तदनन्तर (तीर पाकर) वे पुनः धनुष की ज्या खींचकर बाण छोड़ते और रेणुका पुनः वे तीर लाकर उन्हें देती जा रहीं थीं॥३-५॥

ततो मध्याह्नमारूढे ज्येष्ठामूले दिवाकरे।
सायकान्यान् द्विजः क्षिप्त्वा रेणुकामिदमब्रवीत् ॥६॥
गच्छानय विशालाक्षि शरानेतान्यनुश्च्युतान्।
यावदेतान्युनः सुभ्रू क्षिपामीति मुनिर्वदन् ॥७॥
गच्छन्ती सातुरा छायां वार्क्षीमाश्रित्य भामिनी।
तस्थौ सूर्यांशुसन्तप्तशिरःपादाम्बुजद्वया ॥८॥