भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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२४६ श्रीसाम्बपुराणम्

स्थित्वा तत्र मुहूर्त्तं सा भर्तुः शापभयाच्छुभा।
गत्वादाय शरान् भूयस्तस्मै दद्याद् यशस्विनी ॥९॥

तत्पश्चात् एक समय ज्येष्ठ मास के मध्याह्न काल में ब्राह्मण जमदग्नि तीर छोड़ते हुये रेणुका से बोले—हे विशालाक्षि! धनुष से छोड़े इन तीरों को लाओ, जिससे मैं उन्हें पुनः छोड़ सकूँ। इस प्रकार दौड़ते-दौड़ते रेणुका का सूर्यकिरण से मस्तक तथा चरणद्वय सन्तप्त हो गया और वे कातर अवस्था में वृक्ष के नीचे बैठ गयीं। कल्याणी रेणुका स्वामी के शाप के भय से मुहूर्तमात्र में ही वहाँ से उठीं और पुनः तीर ला-लाकर स्वामी को देने लगीं॥६-९॥

स तामृषिश्च प्रस्विन्नां धिया वेदितवेदनाम्।
जगौ वचनमारुष्टः किञ्चिरेणागता ह्यसि ॥१०॥

ऋषि ने ध्यान से उन्हें पसीने से लथपथ देखकर उनकी वेदना के प्रति आकृष्ट होकर कहा—क्यों विलम्ब हुआ? ॥१०॥

रेणुकावाक्यमाहेदं चण्डांशुकरापीडिता।
शिरःपादमप्रतप्तं मे सूर्यतेजोभिरुद्धतैः ॥११॥
वृक्षच्छायागता तस्मात् चिरमेतन्मया कृतम्।
श्रुत्वैवं जमदग्निस्तु क्रुद्धः सूर्याय तापिने ॥१२॥

रेणुका ने उत्तर दिया—'मैं प्रचण्ड सूर्यकिरणों से पीड़ित हो गयी। सूर्य के तेज से मेरा मस्तक तथा पैर प्रतप्त हो जाने के कारण वृक्ष की छाया में मैं बैठ गयी, अतएव विलम्ब हो गया'। यह सुनकर जमदग्नि तापदायक सूर्य के प्रति क्रोधित हो उठे॥११-१२॥

स विस्फूर्ज्य धनुर्धीमान् गृहीत्वा सायकान् बहून्।
अतिष्ठत् सूर्यमभितो यतो याति ततो सुखम् ॥१३॥
द्विजरूपं समास्थाय सूर्योऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत्।
किमर्थं रुषितोऽसि त्वं किं ते सूर्योऽपराध्यति ॥१४॥
आदत्ते रश्मिभिः सूर्यो जलं सर्वजगत्स्थितम्।
आदाय स जलं देवो वर्षाकाले प्रवर्षति ॥१५॥
ततोऽन्नं जायते विप्र मानुषाणां सुखावहम्।
अन्नं प्राण इति प्रोक्तं वेदे च परिपठ्यते ॥१६॥

बुद्धिमान् जमदग्नि ने धनुष खींचकर अनेक तीर लेकर सूर्य की ओर खड़े हो गये और सूर्य जिधर-जिधर घूम रहे थे, उस-उस ओर मुख करके चलने लगे। तत्पश्चात् सूर्यदेव ब्राह्मण का रूप धारण करके आये और कहा कि आपने क्यों कष्ट किया? सूर्य का क्या अपराध है? समस्त जगत् के जल को सूर्य अपनी किरणों से ग्रहण करके उस जल

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