भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः२४७

का पुनः वर्षाकाल में वर्षण करते हैं। हे ब्राह्मण! उससे मनुष्य को सुख देने वाला अन्न उत्पन्न होता है और अन्न ही प्राण कहा जाता है। वेद में भी ऐसा पाठ है॥१३-१६॥

ततो लोकहितार्थाय रश्मिभिः परिवारितः।
सप्तद्वीपानिमान् ब्रह्मन् वर्षेणाभिव्रवर्षति ॥१७॥
ततस्तदोषधीनां च वीरुधां पत्रपुष्पजाम्।
सर्वं वर्षाभिनिर्वृत्तमन्नं सम्भवति द्विज ॥१८॥
भवन्ति जातकर्माणि व्रतोपनयनानि च।
गोदाननिवहाश्चैव तथा वर्णसमृद्धयः ॥१९॥
सत्राणि दानानि तथा संयोगाबीजसञ्चयाः।
अनन्ताः सम्प्रवर्त्तन्ते यथा त्वं वेत्सि भार्गव ॥२०॥

इसीलिये जनकल्याणार्थ सूर्यदेव अपनी रश्मि द्वारा जल खींचते हैं। हे ब्राह्मण! वे सप्त द्वीपों में वर्षा ऋतु में प्रबल जल-वर्षण करते हैं। इसके पश्चात् क्रमशः औषधि तथा लता-गुल्म का पत्र-पुष्प जन्म लेता है। हे द्विज! समस्त वर्षा-जल से अन्न उत्पन्न होता है। तदनन्तर क्रमशः इसके फल से जातकर्म, व्रत, उपनयन तथा गोदानादि कार्य होते हैं। फलस्वरूप सभी वर्ण समृद्ध हो जाते हैं। यज्ञ-दान-संयोग-बीजसंचय सभी अन्न से ही सम्भव होता है। हे भार्गव! इसे आप अच्छी तरह से जानते हैं॥१७-२०॥

रमणीयानि यावन्ति वर्तन्ते यानि कानिचित्।
तावन्त्यन्नात्सम्भवन्ति विदितं कीर्तयामि ते ॥२१॥
सर्वं हि वेत्सि विप्र त्वं यदेतत् कीर्तितं मया।
या चेत्त्वाहं भृगुश्रेष्ठ! किं त्वं सूर्याय रूष्यति ॥२२॥
एवं तदोच्यमानो वै भास्करेण महात्मना।
जमदग्निर्महातेजा कैङ्कर्यं प्रत्यपद्यत ॥२३॥

जो कुछ रमणीय है, वह सब अन्न से उत्पन्न होता है। इसे आप जानते हैं। हे ब्राह्मण! मैंने जो कुछ कहा है, वह सब आप जान लीजिये। हे भृगुश्रेष्ठ! मैं आपसे पूछता हूँ कि आप सूर्य से क्यों क्रोधित हैं? महात्मा भास्कर (ब्राह्मणरूपी) के यह कहने पर महातेजस्वी जमदग्नि भृत्यभाव से अवनत हो गये॥२१-२३॥

ततः स भगवान् देवो मुनिमग्निसमन्वितम्।
सूर्यो मधुरया वाचा तमिदं पुनरब्रवीत् ॥२४॥
चलं निमित्तं विप्रर्षे सदा सूर्यस्य गच्छतः।
कथं चलं वेत्स्यसि त्वं सदा यान्तं दिवाकरम् ॥२५॥